दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 22.04.16

 

दलित पर तेजाब फेंका, मौत – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/baghpat/thrown-acid-on-dalit-death

दलित युवक की गोली मारकर हत्या – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/national-dalit-youth-shot-dead-723765

अकाली नेताओं ने दलित पर जुर्माना लगा 51 हजार रुपए गुरुद्वारे के गोलक में डलवाए – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/PUN-AMR-OMC-akali-leaders-dalit-fined-5305735-NOR.html

अपहृत किशोरी के पिता ने जहर खाकर जान दी – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/banda/abducted-teenager-s-father-died-by-consuming-poison

आग लगने से 27 झोपड़ियां जलीं – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/chandauli/27-huts-burn-in-fire

बठिंडा के आईजी और एसएसपी मुक्तसर 3 मई को दिल्ली तलब – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/PUN-AMR-OMC-ssp-bathinda-and-muktsar-ig-5305747-NOR.html

बठिंडा के आईजी और एसएसपी मुक्तसर 3 मई को दिल्ली तलब – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/PUN-AMR-OMC-ssp-bathinda-and-muktsar-ig-5305747-NOR.html

सच्चे हिन्दू-रक्षक थे डॉ. आंबेडकर! – नया इंडिया

http://www.nayaindia.com/todays-article/dr-ambedkar-were-hindu-guard-522638.html

 

अमर उजाला

दलित पर तेजाब फेंका, मौत

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बागपत के बड़ौत के कंडेरा गांव में दलित व्यक्ति की तेजाब से उड़ेल कर हत्या कर दी। इस घटना से परिवार में कोहराम मच गया। उसके बेटे ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ तहरीर दी।

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गांव निवासी कृष्ण पाल (50) पुत्र सिलारा बुधवार की सुबह मशीन पर चारा काट रहा था। इसी दौरान अज्ञात व्यक्ति ने उसके ऊपर तेजाब डाल दिया। इससे वह चिल्लाने लगा तो उसके परिवार के लोग उधर दौड़े और उन्होंने कपड़ा डालकर उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक वह 80 प्रतिशत तेजाब से जल चुका था।

परिवार के लोग उसे दिल्ली ले गए, वहां उसने बुधवार की रात में दम तोड़ दिया। इस संबंध में उसके बेटे सचिन ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ तहरीर दी है कि उसके पिता को रंजिश तेजाब से जलाकर मारा गया है। कृष्णपाल की मौत से उसकी पत्नी सुनीता और परिजनों में कोहराम मचा है। बृहस्पतिवार को उसका शव दिल्ली से गांव पहुंचा और परिजनों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया है।

इस संबंध में रमाला थाना प्रभारी सतीश चंद्र ने कहा हाल ही में उसने साहूकार से कर्ज लेकर अपनी बेटी की शादी की थी। अब साहूकार उस पर पैसे लौटने का दबाव बना रहा था। कर्ज में डूबे होने के कारण उसने आत्महत्या की है, लेकिन उसके परिजन इसे दूसरा रूप देने में जुटे हैं।

नई दुनिया

दलित युवक की गोली मारकर हत्या

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सहारनपुर। उप्र के सहारनपुर जिले में गुरुवार रात ठाकुरों और दलितों के बीच संघर्ष हो गया। गाली-गलौज और मारपीट से शुरू हुआ संघर्ष इतना बढ़ा की ठाकुरों ने गोली मारकर दलित युवक की हत्या कर दी। मौके पर पहुंची पुलिस के सामने भी देर रात तक हंगामा चलता रहा। सांसद राघव लखन पाल शर्मा व एसएसपी आरपीएस यादव भी मौके पर पहुंचे।

घटना से गुस्साए ग्रामीणों ने जाम भी लगा दिया था। फतेहपुर गांव में रात साढ़े दस बजे ठाकुरों और दलितों के बीच विवाद हुआ था। बताया जा रहा है कि दलित युवक नरेंद्र (22)शौच के लिए पंचायत भवन के पास गया था। जहां दूसरे पक्ष से उसकी गाली-गलौज और मारपीट हो गई। इसी बीच ठाकुर पक्ष से जॉनी ने दलित नरेंद्र को गोली मार दी। बीच-बचाव में आए नरेंद्र के पिता-मां व चाचा भी जख्मी हो गए।

दैनिक भास्कर

अकाली नेताओं ने दलित पर जुर्माना लगा 51 हजार रुपए गुरुद्वारे के गोलक में डलवाए

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मानसा। गांव बुर्ज ढिल्लवां के अकाली नेताओं ने पोस्टरों पर काला तेल फेंकने का आरोप लगा कर दलित व्यक्ति पर गांव के गुरद्वारा साहिब में 51 हजार का जुर्माना लगाया है। यह आरोप पीड़ित के भाई ने लगाया है। गांव में जनरेटर व ट्रांसफार्मर ठीक करने की दुकान चलाने वाला लक्ष्मण सिंह पिछले कुछ दिनों से अपनी दुकान बंद कर मौड़ मंडी में भाई रुप सिंह के साथ रह रहा है।

लक्ष्मण के भाई रुप सिंह का कहना है इलाके के कुछ स्थानीय अकाली नेता निजी रंजिश के चलते उसके भाई पर आरोप लगा रहे हैं कि अकाली नेताओं के पोस्टरों पर काला तेल फेंकने के काम में उसके भाई का हाथ है।

उसके भाई की ट्रांसफार्मर ठीक करने की दुकान है जिससे अकाली नेताओं को शक है कि पोस्टरों पर डाला गया काला तेल उसके भाई की दुकान पर हो सकता है। घटना के अगले दिन अकाली नेता ने अपने साथियों के साथ उसके भाई को जातिसूचक अपशब्द कहे और उसके साथ हाथापाई की।

बिना केस पिछले 17 दिनों से बुलाया जा रहा था थाने

पिछले 17 दिनों से उसके भाई को बिना किसी केस दर्ज किए पुलिस स्टेशन में बुलाकर शाम को घर भेज दिया जाता था। अकाली नेता समझौते के लिए उनसे एक लाख रुपए और जमीन देने का दबाव डाल रहे थे। अकाली नेताओं के दबाव डालने पर 51 हजार रुपए गुरद्वारा साहिब की गोलक में डालने का फैसला हुआ। गांव के सरपंच बीरा सिंह ने कहा लक्ष्मण सिंह के साथ हुई घटना निंदनीय है, पर इसमें पंचायत व पंचायत सदस्यों की कोई भूमिका नहीं है।
^एससीएसटी कमीशन के चेयरमैन राजेश बाघा पुलिस प्रशासन से इस ममाले में जानकारी मांगी है और कहा है कि ऐसा कोई कानून नहीं है आप किसी भी व्यक्ति पर जुर्माना नहीं लगा सकते।

एसएचओ सदर मानसा हरपाल सिंह ने गुरु घर में जुर्माना लगाने की बात से अनभिज्ञता प्रकट करते हुए कहा लक्ष्मण सिंह सबूत पेश अपने साथ हुई घटना की शिकायत दर्ज करवाएगा तो कानून के अनुसार बनती करवाई की जाएगी।

गांव के गुरुद्वारा साहब के ग्रंथी राजा सिंह ने बताया कि जिस समय दोनों व्यक्ति आए, तब वह पाठ कर रहे थे तथा उन्होंने देखा कि लक्ष्मण व रुप सिंह माथा टेकने के बाद गोलक मे पैसे डालकर चले गए।

अमर उजाला

अपहृत किशोरी के पिता ने जहर खाकर जान दी

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बांदा/बदौसा। बेटी के अपहरण मामले में पुलिस की बेरुखी से क्षुब्ध दलित ने आत्महत्या कर ली। लापता किशोरी को बरामद करना तो दरकिनार पुलिस ने रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की। उत्तेजित परिजनों और ग्रामीणों ने मंडल मुख्यालय कचहरी के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर शव रखकर जाम लगाकर हंगामा किया। डेढ़ घंटे बाद सिटी मजिस्ट्रेट और क्षेत्राधिकारी ने देर तक समझा-बुझाकर जाम खत्म कराया।

फतेहगंज थाना क्षेत्र के बघेलाबारी गांव निवासी शिवचरण (45) पुत्र रामबहोरी श्रीवास ने गुरुवार को तड़के घर में जहर खा लिया। परिजन फतेहगंज से उसे कर्वी ले जा रहे थे। तभी रास्ते में उसकी मौत हो गई। परिजनों और ग्रामीणों ने कुछ देर बघेलाबारी तिराहे पर जाम लगाया फिर शव लेकर बांदा आ गए।

यहां लगभग एक सैकड़ा ग्रामीण व परिजनों ने स्वतंत्रता स्मारक अशोक लाट के पास राष्ट्रीय राजमार्ग पर शव रखकर जाम लगा दिया। मृतक की पत्नी ऊषा समेत तमाम महिलाएं भी शामिल थीं। देर तक प्रशासन या पुलिस का कोई अधिकारी नहीं आया। इस दौरान उत्तेजित ग्रामीण राहगीरों से बदसलूकी भी करते रहे। पुलिस विरोधी नारे लगातार लगते रहे। नरैनी सीओ और कोतवाल के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते रहे। पैदल चलने वालों को भी स्कूल, कचहरी, अस्पताल आदि आने-जाने नहीं दिया। तमाम वाहन देर तक फंसे रहने के बाद लौट गए और दूसरे रास्तों से आगे बढ़े। लगभग डेढ़ घंटा बाद आए सिटी मजिस्ट्रेट आरके श्रीवास्तव प्रभात कुमार ने मौके पर आकर परिजनों से बात की और उन्हें पूरा न्याय दिलाने का भरोसा दिलाया। इसी के बाद जाम खत्म हुआ। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

पत्नी ऊषा ने बताया कि नरैनी कोतवाली में घटना की रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। क्षेत्राधिकारी ने भी मदद नहीं की। उल्टा दोनों अधिकारी जबरापुर गांव निवासी आरोपी युवक से मिलकर मामला खत्म करने का दबाव बनाते रहे। इन्हीं सब बातों से क्षुब्ध होकर उसके पति (अपहृत पुत्री के पिता) शिवचरण ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। इस बारे में नरैनी कोतवाली प्रभारी ने बताया कि लड़की स्वेच्छा से गई है। वह बालिग है। उसने कर्वी में अदालत में अपने यही बयान कलमबंद कराए हैं। इसलिए कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है।

अमर उजाला

आग लगने से 27 झोपड़ियां जलीं

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स्थानीय थाना क्षेत्र के धरौली चौकी अंतर्गत किला घानापुर के दलित बस्ती में शार्ट सर्किट से 27 मड़ई जल कर खाक हो गई। यहीं नहीं चार मवेशी जल कर मर गए और लाखों की संपत्ति का नुकसान हुआ है। फायर ब्रिगेड ने चार घंटे के प्रयास से आग बुझाई। इससे बस्ती के लोग खुले आसमान के नीचे आ गए हैं। सूचना पाकर एसडीएम और सीओ ने मौका मुआयना किया और मुआवजा दिलाने का आश्वासन दिया।

दलित बस्ती से कुछ आगे पंप कैनाल है। दोपहर में पंप कैनाल के तारों के आपस में सटने से चिंगारी निकली जो गेहूं के खेत में गिरी। इससे गेहूं की खड़ी फसल जलने लगी जब तक लोग कुछ समझते आग खेतों से होते हुए दलित बस्ती तक पहुंच गए। बस्ती के एक मड़ई से होते हुए दूसरे मड़ई तक आग फैलती गई। इससे बस्ती में हाहाकार मच गया।बस्ती के लोग जान बचाकर भागने लगे।वहीं कुछ लोग किसी तरह लोग आग बुझाने की कोशिश करने लगे लेकिन हवा की वजह से आग फैलती ही गई। सूचना पाकर फायर ब्रिगेड की गाड़ी पहुंची और आग बुझाने लगी। वहीं किसानों ने पंप सेट चला कर पानी डाला गया। इस तरह चार घंटे के प्रयास के बाद आग बूझी। इस बीच 27 मड़हे जल गए और मड़ई में गृहस्थी का पूरा सामान जल कर खाक हो गया। इस घटना में प्रद्युम्न, मनोज,  झूरी, लोहा, अमरजीत, मूसे, श्यामनारायण, शमशेर, रविशंकर, प्रेमशंकर, सचाऊ, पंचदेव,  उदल, दासी, मथुरा, श्यामसुंदर, इंदल, कवि नरेंद्र, धीरेंद्र, धीरेंद्र, पिंटू,  घुनन व विजय की गृहस्थी का पूरा सामान जल गया और उनका पूरा परिवार खुले आसमान के नीचे आ गया। सूचना पाकर एसडीएम सदर, क्षेत्राधिकार सदर और कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंची और मौका मुआयना के बाद मुआवजा दिलाने का आश्वासन दिय गया। गांव के प्रधान ने पीड़ितों को यथा संभव सहायता की।

दैनिक भास्कर

बठिंडा के आईजी और एसएसपी मुक्तसर 3 मई को दिल्ली तलब

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अमृतसर।मुक्तसर में 2 दलित युवतियों से रेप के दो मामले अनुसूचित जाति आयोग के पास पहुंचे हैं। आरोप है, पुलिस ने मामला दर्ज किया, लेकिन आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर रही। वीरवार को पीड़ित परिवार आयोग के वाइस चेयरमैन डॉ. राज कुमार के पास इंसाफ के लिए पहुंचे।

डॉ. राज कुमार ने बठिंडा रेंज के आईजी और मुक्तसर के एसएसपी को एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ 3 मई को नई दिल्ली पेश होने के निर्देश दिए हैं। मुक्तसर के गांव कद्दूखेड़ा की पीड़िता ने बताया, 25 मार्च सुबह आठ बजे आरोपी जगदीप सिंह उर्फ़ जोजो अपने एक साथी के साथ कार में या और उसे जबरन गाड़ी में ले गया। सुनसान जगह पर आरोपी ने उसके साथ रेप किया।

सीएम बादल के गृह जिले में ऐसी घटनाएं शर्मनाक : वेरका

डॉ. वेरका ने कहा, मुक्तसर सीएम बादल का गृह जिला है और वहां दलितों पर अत्याचार शर्मनाक है। सुप्रीम कोर्ट आदेश हैं कि जिस जिले में एेसे मामले हों और कोई कार्रवाई न हो तो तत्काल एसएसपी और डीसी को हटा देना चाहिए। अगर आरोपियों को जल्द गिरफ्तार न किया गया तो अफसरों पर कार्रवाई होगी।

नया इंडिया

सच्चे हिन्दू-रक्षक थे डॉ. आंबेडकर!

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भारत में हिन्दू धर्म के तीन स्थाई बैरी रहे हैं – चर्च-ईसाइयत, इस्लाम और कम्युनिज्म। तीनों ही हिन्दुओं को धर्मांतरित करने और हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला उद्देश्य रखते हैं। उनकी कोशिशे आज भी जारी हैं। तभी यह नोट करना चाहिए कि डॉ. भीमराव आंबेडकर इन तीनों के कठोर आलोचक थे। सिद्धांत ही नहीं, व्यवहार में भी उन्होंने हिन्दू धर्म व समाज की रक्षा कई प्रकार से की। चाहे डॉ. आंबेडकर ने सन 1935 में ही घोषणा की थी कि वे हिन्दू पैदा हुए हैं, किन्तु हिन्दू मरेंगे नहीं। पर हिन्दू धर्म ‘छोड़ने’ का कार्य उन्होंने इक्कीस वर्ष बाद, लगभग मृत्यु के निकट किया। फिर, जब किया भी तो बौद्ध बने। इस से ईसाई मिशनरियों और इस्लामी तबलीगियों को बड़ी निराशा हुई, जो उन्हें अपने बाड़े में लाना चाहते थे। उन की निराशा और गहरी थी क्योंकि आंबेडकर ने लोगों को ईसाइयत और इस्लाम से सावधान रहने को भी कहा था। डॉ. आंबेडकर के शब्दों में, ‘बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है, और इसलिए मेरा धर्मांतरण भारतीय संस्कृति और इतिहास को क्षति न पहुँचाए, इस की मैंने सावधानी रखी है।’

इस में गंभीर चेतावनी थी कि कोई और धर्मांतरण भारतीय संस्कृति और इतिहास को चोट पहुँचाता! इस चेतावनी का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। बौद्ध-दीक्षा के दूसरे दिन, 15 फरवरी 1956 को अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर ने ईसाइयत, इस्लाम आदि के मूल विश्वासों का उदाहरण देकर समझाया कि वे दोनों ‘भेड़ चाल’ वाले हैं, जो ‘एक ईश्वर-पुत्र’, ‘अंतिम पैगंबर’ जैसे अंध-विश्वासों का दावा करते हैं। जहाँ ‘अंधे अनुयायियों’ का काम बस यह है कि उस पैगंबर के गीत गाता रहे। उन धर्मों में विवेक-चिंतन का स्थान नहीं, बल्कि भोग, लोभ और संपत्ति-प्रेम ही केंद्रीय प्रेरणा है। मनुष्य के आध्यात्मिक उत्थान की कोई चिंता नहीं है। वे सब सारतः ‘खाओ, पियो और मौज करो’ से अधिक कुछ नहीं कहते। जबकि बौद्ध धर्म विवेक आधारित है, इसलिए किसी के गले में ‘कुत्ते के पट्टे’ जैसी मजहबी पहचान नहीं बाँधता।

यह सब मर्मभूत बातें थीं, जिसे सार्वजनिक रूप से कहकर डॉ. आंबेडकर ने न केवल दलितों की, बल्कि हिन्दू धर्म-परंपरा की बड़ी सेवा की!

वह कोई अपवाद भाषण नहीं था। पहले भी हिन्दू धर्म के शत्रुओं के सामने डॉ. आंबेडकर ने उस का बचाव किया था। हिन्दू समाज से मिले कटु अनुभवों के बावजूद उन्होंने इस सचाई को अनदेखा नहीं किया कि हिन्दू अपनी कुरीतियों को दूर करने के प्रति सचेष्ट रहे हैं। चाहे आंबेडकर को यह परखने का पर्याप्त अवसर न मिला कि वे कुरीतियाँ मूलतः हिन्दू धर्म की नहीं, बल्कि विदेशी शासनों के समय आए बाहरी दुर्गुण हैं। तभी इन्हें दूर करने हेतु स्वामी दयानन्द के धर्म-सुधार आंदोलन को हिन्दुओं का सहज समर्थन मिला।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद छुआ-छूत को दंडनीय बनाने तथा दलित-उत्थान के लिए विविध कदम उठाने में हिन्दू समाज ने पूरा सहयोग दिया। यह सब डॉ. आंबेडकर ने नोट भी किया था। उन के शब्दों में, ‘हिन्दुओं में सामाजिक बुराइयाँ हैं। किन्तु एक अच्छी बात है कि उन में उसे समझने वाले और उसे दूर करने में सक्रिय लोग भी हैं। जबकि मुस्लिम यह मानते ही नहीं कि उन में बुराइयाँ हैं और इसलिए उसे दूर करने के उपाय भी नहीं करते।’ इन बातों की गहराई समझी जानी चाहिए।

दलित-नेता होने से अधिक डॉ. आंबेडकर की सत्यनिष्ठा तथा संपूर्ण भारत के हित की विरासत अधिक मूल्यवान है। इस बिन्दु पर, मुस्लिम लीग द्वारा देश-विभाजन की माँग पर उन के विचारों का भी स्मरण जरूरी है। जब अंग्रेजों ने 1932 में ‘कम्युनल अवार्ड’ घोषित किया, तभी डॉ. आंबेडकर ने गंभीर खतरे से आगाह किया था। उस अवार्ड में पाँच प्रांतों – बंगाल, पंजाब, सिन्ध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत – की विधान सभाओं में मुस्लिमों को स्थाई कानूनी वर्चस्व भी दिया गया था। मुस्लिमों का अलग निर्वाचक-मंडल तथा उन की संख्या को अनुपात से अधिक ‘वेटेज’ देना इस से अलावा था। हिन्दुओं पर खतरा इस से और बढ़ता था कि मुस्लिम वर्चस्व मनमाना बढ़ाने को मुस्लिम लीग बेधड़क लगी हुई थी। (डॉ. आंबेडकर के शब्दों में, ‘मुसलमानों की माँगे हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़ती जाती हैं’)।

जबकि कांग्रेस का गाँधी-नेहरू नेतृत्व खुद को मुस्लिमों का भी प्रतिनिधि मान हिन्दू-हितों की बात से ही इन्कार करता था! इस तरह, हिन्दू राजनीतिक रूप से और अरक्षित थे, जिस का भान तब बहुत कम लोगों को था। जब दाँव बढ़ाते-बढ़ाते मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के अलग देश की माँग पेश कर दी, तब डॉ. आंबेडकर ने चेतावनी दी कि यदि विभाजन हुआ तो उन पाँच प्रांतों में हिन्दुओं की वही दुर्गति होगी जो नाजी जर्मनी में यहूदियों तथा तुर्कों के अधीन आर्मीनियाईयों की हुई। यानी, उन का नरसंहार! डॉ. आंबेडकर ने केवल चेतावनी नहीं दी, उस से हिन्दुओं को बचाने के उपाय भी बताए। दुर्भाग्यवश, गाँधी-नेहरू नेतृत्व ने उसी विचारधारात्मक जिद में इसे भी अनसुना कर दिया।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि यदि विभाजन हो, तो दोनों ओर से अल्पसंख्यक समुदायों का व्यवस्थित रूप से स्थानांतरण करना अनिवार्य है, नहीं तो विभाजन बाद भी सांप्रदायिकता की समस्या वहीं की वहीं रहेगी। अतः पाकिस्तानी क्षेत्र से हिन्दू-सिखों को भारत लाना और इधर से मुस्लिमों को पाकिस्तान ले जाना जरूरी है। यह प्रस्ताव काल्पनिक नहीं था। तब हाल ही में ग्रीस, तुर्की व बुल्गारिया में ऐसा जनसंख्या-स्थानांतरण, उन्हीं कारणों से हो चुका था। वस्तुतः जिन्ना ने भी डॉ. आंबेडकर के प्रस्ताव का समर्थन किया था।

पर कांग्रेस नेतृत्व ने सब अनसुना कर दिया। वे अपनी ‘उच्चता’ के अहंकार में डूबे रहे, जिस में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों के समान हितैषी होने का दावा करना उन्हें अधिक जरूरी लगा। इसलिए उन्होंने विभाजन बाद भी ‘परस्पर बंधक’ वाला घृणित सिद्धांत अपनाया, जिस के अनुसार भारतीय क्षेत्र में मुस्लिम और पाकिस्तानी क्षेत्र में हिन्दू अल्पसंख्यक एक दूसरे की रक्षा की गारंटी होंगे! यह न केवल अमानवीय, बल्कि नितांत अव्यवहारिक था। क्योंकि हिन्दुओं में वैसी कोई मजहबी-साम्राज्यवादी चाह ही नहीं, जिस से वे अपनी संख्या बढ़ाने, दूसरों को मिटाने या धर्मांतरित करने का मंसूबा रखते हों। नतीजा वही हुआ, जिस की चेतावनी आंबेडकर ने दी थी। पाकिस्तानी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हिन्दू-सिख मारे, भगाए या धर्मांतरित किए गए, जबकि भारत में मुसलमानों के साथ ऐसा कुछ न हुआ। उलटे, आज वे उसी ठसक में हैं, जैसे 1930 के समय थे। इस प्रकार, आंबेडकर की दूसरी भविष्यवाणी भी सही निकली कि बिना अल्पसंख्यक आबादी की अदला-बदली के सांप्रदायिक समस्या हल नहीं होगी।

उपर्युक्त सभी प्रसंग दिखाते हैं कि डॉ. आंबेडकर न केवल दूरदर्शी, व्यवहारिक राजनीतिज्ञ थे, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय, साम्राज्यवादी विचारधाराओं के बारे में अनेक नेताओं की तुलना में अधिक गहरी समझ रखते थे। इसीलिए, वे हिन्दू धर्म और समाज के बड़े रक्षक साबित हुए। जहाँ तक आलोचनाओं का प्रश्न है, तो ईसाई मिशनरियों तथा यूरोपीय विद्वानों द्वारा प्रचारित मिथ्या इतिहास के कारण डॉ. आंबेडकर ने ‘वर्ण-व्यवस्था’ पर अपनी धारणा बनाई थी। उन्हें जो दुर्व्यवहार झेलने पड़े, वे हिन्दू धर्म या शास्त्र-सम्मत नहीं थे। स्वयं डॉ. आंबेडकर ने 1955 में ही कहा था कि स्वतंत्र भारत के चार-पाँच वर्षों में ही निम्न जातियों की स्थिति में काफी सुधार हुआ। तब से साठ वर्ष और बीत चुके। कथित दलितों की तुलनात्मक स्थिति आज एक सबल, आत्मविश्वासपूर्ण समुदाय की है।

अतः पिछले सौ वर्षों में जो परिवर्तन हुए, उस की सही समीक्षा करनी चाहिए। डॉ. आंबेडकर ने जोर देकर कहा था कि भारत को धर्म, दर्शन, चिंतन में विदेशों से कुछ लेने की जरूरत नहीं। इसीलिए, हिन्दू धर्म के स्थाई बैरियों, धर्मांतरणकारी मतवादों के समक्ष डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू धर्म रक्षक की भूमिका निभाई। उन की इस विरासत को शत्रुओं ने अधिक समझा था। अच्छा हो, हम भी समझें और सनातन धर्म की सच्ची शिक्षा के अनुरूप व्यवहार करें।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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