दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 25.02.16

 

UP: दलित की ऊंगली काट कर साथ ले गए दबंग, केस दर्ज – प्रदेश 18

http://hindi.pradesh18.com/news/uttar-pradesh/up-musclemen-chopped-off-dalit-mans-finger-booked-1372840.html

सिर पर चप्पल नहीं रखी तो दबंगों ने दलितों को पीटा, 4 गंभीर – बीइंग दलित

http://www.beingdalit.com/2016/02/dalits-in-mp-beaten-as-they-refused-to-put-slippers-on-head.html

जख्म पर आए थे मरहम लगाने, नमक छिड़ककर चले गए – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/minister-visit-in-hospital-675364

मारपीट से उपसरपंच के खिलाफ आक्रोश, धरना देकर चेताया – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/CHH-OTH-MAT-latest-kurud-news-024004-3683382-NOR.html

इक्कीसवीं सदी में भी दलित – विष्फोट .कॉम

http://visfot.com/index.php/comentry/11736-dalit-story-o-p-sonik.html

 

प्रदेश 18

UP: दलित की ऊंगली काट कर साथ ले गए दबंग, केस दर्ज

http://hindi.pradesh18.com/news/uttar-pradesh/up-musclemen-chopped-off-dalit-mans-finger-booked-1372840.html

उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के बादलपुर थाना क्षेत्र में दबंगो द्वारा दलित युवक के ऊंगली काटने के मामले में पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. वहीं पीड़ित युवक का दादरी के अस्पताल में इलाज चल रहा है.

UP: दलित की ऊंगली काट कर साथ ले गए दबंग, केस दर्ज

जानकारी के मुताबिक धूम-मनिकपुर गांव के रहने वाले टीटू ने आरोप लगाया है कि रविवार की रात घर का सामान लेकर भैंसा बुग्गी से लौट रहा था. जैसे ही वह गांव में दाखिल हुआ उसे रास्ते से हटने के लिए कहा गया. नहीं हटने पर तीन युवक भड़क गए और टीटू को बुग्गी से उतार कर जमकर पिटाई की.

इसी दौरान हमलावरों ने उसकी बाएं हाथ की ऊंगली काट दी और उसे लेकर भाग निकले. आस-पास के लोगों की मदद से टीटू को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. एसओ बादलपुर मनोज यादव ने बताया कि रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है. जल्द ही आरोपी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे.

बीइंग दलित

सिर पर चप्पल नहीं रखी तो दबंगों ने दलितों को पीटा, 4 गंभीर

http://www.beingdalit.com/2016/02/dalits-in-mp-beaten-as-they-refused-to-put-slippers-on-head.html

वक़्त बदल गया है लेकिन हालात नहीं बदले, कुछ दलितों ने पुरानी रूढ़ियों को तोड़ने की हिम्मत क्या दिखाई अस्पताल जाने की नौबत आ गई। मामला मध्य प्रदेश के दमोह जिले के तेजगढ़ थाने के मनका गांव का है। यहां के दलितों का मात्र इतना कसूर था कि वे दबंगो के घर के सामने से सिर पर चप्पल रखने की बजाय पहनकर ही निकल गए। घटनाक्रम में दलित समाज के 8 से अधिक लोग घायल हुए हैं। जिनमें चार की हालत गंभीर बनी हुई है।

जानकारी के अनुसार अहिरवार समाज के लोग संत रविदास जयंती मना रहे थे। इसी उपलक्ष्य में उन्होंने शाम को भोज का आयोजन किया था। तभी गांव के दबंग महेंद्र, गौतम व राजेंद्र यादव वहां पहुंचे और सभी के साथ गाली गलौज कर मारपीट कर दी। घटना में रामदीन, हल्ली बाई, रचना, सूरजबाई,मिट्ठू, शिव, संतोष, लक्ष्मीरानी आदि को गंभीर चोटें आ गईं। इन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

पीडि़तों ने बताया कि उन्होंने सुबह प्रभात फेरी का आयोजन किया था जिसे बैंड बाजे के साथ निकाला गया। इस पर आरोपियों ने उनके साथ ये कहकर मारपीट की, कि वे उनके घर के सामने से चप्पल जूते पहनकर निकले हैं। मामले में इमलिया चौकी पुलिस द्वारा कार्रावाई ना करने की बात भी सामने आ रही है। जिसकी शिकायत कलेक्टर से की गई है। पीडि़त पूरी सब्जी लेकर आज कलेक्ट्रेट पहुंचे थे।

नई दुनिया

जख्म पर आए थे मरहम लगाने, नमक छिड़ककर चले गए

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तेजगढ़ थाना के मनका गांव में संत रविदास जयंती पर दलितों के साथ एक परिवार के लोगों ने मारपीट कर दी थी। जिसमें पांच लोग घायल हो गए थे। घायलों को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इन दलितों का आरोप था कि आरोपियों ने जयंती मनाने से रोका और न मानने पर मारपीट की। बुधवार को इस घटना की सच्चाई जानकर दलितों को मरहम लगाने राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त व मप्र राज्य सहकारी अनुसूचित जाति वित्त व विकास निगम के उपाध्यक्ष भुजबल सिंह अहिरवार जिला अस्पताल पहुंचे, लेकिन मरहम की जगह घायलों के जख्मों पर नमक छिड़क कर चले गए। उन्होंने मीडिया से चर्चा में साफ कह दिया कि आयोजन बड़ा था तो पुलिस को सूचना देनी थी और किसी के घर में सामने तेज बाजा बजाओगे तो उसे गुस्सा तो आएगा ही।

गौरतलब है कि मंगलवार को गांव के दलित एसपी व कलेक्टर से शिकायत करने पहुंचे थे। ये लोग अपने साथ जयंती के मौके पर भंडारे में बने खाने को भी साथ लाए थे। उनका आरोप था कि गांव के एक परिवार के लोगों ने उन्हें जयंती मनाने से रोका, गालियां दी और रात में भंडारे के दौरान आकर मारपीट की और खाना फेंक दिया। आरोप गंभीर थे, इसलिए अगली ही सुबह एसपी तिलक सिंह गांव पहुंच गए और चौपाल लगाकर वास्तविकता जानी। वहीं, जिला अस्पताल पहुंचे राज्यमंत्री श्री अहिरवार अलग ही बात कहते दिखे।

…तो गुस्सा आएगा ही

श्री अहिरवार से पूछा कि दलितों के साथ हुई घटना पर क्या कहेंगे। उन्होंने कहा संत रविदास जयंती को यदि इतने बड़े रूप में मनाना ही था तो पुलिस को आवेदन लेकर सहयोग लेना था। वैसे भी समूह में जब लोग एकत्रित होते हैं तो धारा 144 लागू हो जाती है। बड़ा आयोजन किया जिसमें सैकड़ों लोग जमा हुए और पुलिस को सूचना तक नहीं दी। दूसरी बात ये कि जोश में कार्यक्रम कर लिया अब किसी के घर में सामने जोर से बाजा बजाया जाएगा तो उसे गुस्सा आएगा ही। हो सकता है कि उस व्यक्ति के घर में कोई बीमार हो। ऐसे में लोगों को परेशानी तो होती ही है, गुस्सा भी आता है और फिर ऐसे झगड़े होते हैं। पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई को उन्होंने सही बताया और कहा कि पुलिस की कोई गलती नहीं है। उनके पहुंचने से पहले एसपी गांव पहुंच गए थे, आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया है।

केवल मारपीट की बात सही

एसपी श्री सिंह ने बताया कि वे गांव गए थे। दलित समाज के सभी लोगों को एक जगह एकत्रित किया और उनसे जानकारी ली। आयोजन के समय गांव का सरपंच भी मौजूद था। बातचीत में पता चला कि रैली के दौरान किसी तरह का विवाद नहीं हुआ। रात लगभग 10 बजे दलित समाज की धर्मशाला में भंडारे का आयोजन चल रहा था। वहां से खाना खाकर एक महिला अपनी बच्ची के साथ घर जा रही थी। रास्ते में आरोपी ने उस महिला को रोका और पूछा कहां से आ रही है। इसके बाद उसने बच्ची को चांटा मार दिया। महिला बच्ची को लेकर समाज के लोगों के पास शिकायत करने पहुंची तो आरोपी भी पीछे से पहुंच गया। यहां कुछ लोगों ने जब आरोपी से कारण पूछा तो उसने वहां भी एक-दो लोगों से मारपीट कर दी और घर लौट आया। बाद में तीनों आरोपी राजेंद्र यादव, गौतम यादव व महेंद्र यादव फिर धर्मशाला पहुंचे और लोगों से मारपीट कर दी। एसपी श्री सिंह ने बताया कि इस पूरे घटनाक्रम में जयंती के आयोजन को रोकने या खाने को कुचलने जैसी बात सामने नहीं आई है। ये जरूर है कि आरोपियों ने पथराव किया था और लोग भाग रहे थे। इसलिए कुछ खाना भगदड़ में फैल गया। आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायालय से जेल भेज दिया गया है।

दैनिक भास्कर

मारपीट से उपसरपंच के खिलाफ आक्रोश, धरना देकर चेताया

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मगरलोड|आदिवासी युवक से गाली गलौज मारपीट करने पर ग्राम मुड़केरा के उप सरपंच और उसके परिवार के खिलाफ ग्रामीणों में आक्रोश है। विरोध प्रदर्शन करते हिंदू समाज के लोगों ने बूढ़ादेव मंदिर में धरना दिया। विहिप महामंत्री रंजीत समेत कुरुद नगरी मगरलोड के लोग शामिल हुए। प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल के साथ एएसपी पिपरे, नगरी एसडी ओपी शर्मा, मगरलोड थाना प्रभारी एसडी बघेल उपस्थित रहे। ग्राम सिंगपुर, मुड़केरा सहित आसपास गांव के लोगों ने चेतावनी दी है कि दो दिन के अंदर आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया, तो उग्र आंदोलन करेंगे। मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्राम सिंगपुर में पुलिस बल तैनात किया गया है।

विष्फोट .कॉम

इक्कीसवीं सदी में भी दलित

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खबर है कि अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अत्याचार निवारण विधेयक 1989 में संशोधन करके, इसे गणतंत्र दिवस 26 जनवरी से लागू कर दिया गया है। अब यह अधिनियम अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक 2005 के नाम से जाना जाएगा। इस अधिनियम में उक्त वर्ग के प्रति होने वाली उत्पीड़न की घटनाओं का विस्तार से जिक्र किया गया है। मसलन् अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों के बाल काटने से मना करना, और मूंछों एवं सिर के बालों का मुंडन कराकर समाज में घुमाना, उक्त वर्ग के लोगों को जूतों की माला पहनाना, जादू टोने के नाम पर दलित आदिवासी महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांवों में घुमाना, खेतों में सिंचाई सुविधाओं के लिए उन्हें रोकना, वन अधिकारों से वंचित रखना, मानव और पशु नरकंकाल को निपटाने और उसे लाने-ले जाने के लिए मजबूर करना, कब्र खोदने के लिए बाध्य करना, सिर पर मैला ढ़ोने के लिए विवश करना आदि जैसे कृत्यों को अत्याचारों की श्रेणी में शामिल किया गया है। उक्त संशोधित कानून के तहत अपहरण जैसे 10 वर्ष से कम की सजा वाले मामलों को जघन्य अपराधों की श्रेणी में शामिल किया गया है। उक्त वर्गों के प्रति अत्याचार ले मामलों को विशेष अदालतों में आरोप पत्र दाखिल होने की तिथि से दो महीने के अन्दर निपटाना।

भारत में उक्त वर्ग के शोषण की मुक्ति के लिए बने कई कानूनों के बावजूद दलितों का शोषण करने वाले दबंग कानूनी दांव पेचों के दम पर सजा होने से बच जाते हैं। कई मामलों में ऐसा प्रतीत हुआ है। जिसमें अधिकांशतः पुलिस एवं संबंधित प्रशासन पीड़ित पक्ष के बजाए आरोपियों के पक्ष में खड़ा नजर आता है। मसलन् हरियाणा के मिर्चपुर कांड में दलित बाप बेटी को जलाने की घटना की जांच कर रहे आयोग ने रिपोर्ट में उल्लेख किया कि सैकड़ों उपद्रवी लोग दलितों के घरों को जलाते रहे और पुलिस मूक दर्शक बनी रही। रिपोर्ट में ड्यूटी मजिस्ट्रेट की लापरवाही का भी जिक्र किया गया है। रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले में दो बार हैदराबाद जा चुके राहुल गांधी को मिर्चपुर का काण्ड नजर नहीं आया। क्योंकि उनकी पार्टी के शासन काल में मिर्चपुर काण्ड घटित हुआ था। बिहार के जहानाबाद जिले में एक दिसम्बर 1997 को लक्ष्मणपुर बाथे गांव में दबंगों ने 58 दलितों के घरों में आग लगाकर उन्हें मार दिया था। जिनमें 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी शामिल थे। लक्ष्मणपुर बाथे काण्ड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वर्षों तक मुकदमा चला और सबूतों के अभाव में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।

देश को आजाद कराने वाले शहीदों एवं महापुरूषों ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा कि आजाद भारत की व्यवस्था इतनी पंगू हो जाएगी है कि वह 58 दलितों के हत्यारों को सजा नहीं दिला पाएगी। हमारे देश में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी है और देश में सामाजिक न्याय की लम्बी चौड़ी घोषणाएं भी की जाती रही है। पर यह कैसा सामाजिक न्याय है।ं उ0 प्र0 के बदायूॅं जिले में दो सगी बहनों का बलात्कार करके दोनों बहनों के शवों को पेड़ पर टांग दिया जाता है। जांच में दोषियों को दंड दिलाने की बजाए उल्टे पीड़ित परिवार पर ही उंगलियां उठायी जाती हैं। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहे रोहित वेमुला जो विज्ञान लेखक बनना चाहता था, की आत्महत्या का मामला देश में ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया। ‘‘साउथ एशिया सॉलिडैरिटी ग्रुप‘‘, ‘‘कास्ट वाच यूके‘‘ और फेडरेशन ऑफ अम्बेडकर एवं बुद्धिस्ट आर्गनाइजेशंस‘‘ जैसे अनेक संगठनों ने लंदन में रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। दलित छात्र होने के कारण काफी दिनों तक उसकी आत्महत्या का मामला मीडिया में चर्चाओं में बना रहा।

देश विदेश में धरने-प्रदर्शन भी हुए लेकिन जिन लोगों की वजह से उक्त छात्र ने आत्महत्या की उन पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पायी। यह कैसा ‘‘स्किल इंडिया‘‘ है कि एक पीएचडी कर रहा दलित छात्र जातीय शोषण के कारण आत्महत्या करने को विवश होता है और शोषकों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर शासन-प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। जब मीडिया में उक्त मुद्दे को लेकर टी0 वी0 चैनलों पर चर्चाएं हुईं और राजनेताओं ने इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करने की मांग की तो प्रचारित किया जाने लगा कि घटना पर राजनीति हो रही है। अरे भई जब राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण उक्त छात्र आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो सकता है, तो आत्महत्या के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग के लिए राजनीति क्यों नहीं हो सकती।

अधिकांश टी0 वी0 चैनलों ने रोहित वेमुला सुसाइड के कुछ अंशों को दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की कि उसने जातीय शोषण की वजह से नहीं बल्कि व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण सुसाइड किया है। सुसाइड नोट के अन्त में रोहित वेमुला ने ‘‘जय भीम‘‘ लिखकर देश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे लाखों अम्बेडकर युवाओं को शिक्षा एवं संगठन के लिए संघर्ष करने का संदेश दिया है।

देश में दलित उत्पीड़न की घटनाएं प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आए दिन होती रहती हैं। आज देश में आर्थिक विकास के लिए ‘‘स्टार्टअप‘‘ की बातें हो रही हैं, पर सामाजिक विकास के मामले में हमारा समाज खासतौर से दलितों के मामले में कितना स्टार्टअप है, यह रोहित वेमुला की आत्म हत्या ने साबित कर दिया है। जहॉं तक ‘‘मेक इन इंडिया‘‘ की बात है तो उक्त घटना को देखकर लगता है कि हमारे विषमतावादी समाज में मेक इन इंडिया के बजाय ‘‘दलित डेथ इन इंडिया‘‘ का अघोषित अभियान चला हुआ है। जब भी कभी देश में ऐसी कोई घटना होती है तो पूरी दुनिया में हमारी बदनामी होती है। विदेशियों को लगता होगा कि भारत में सामाजिक सुरक्षा का माहौल नहीं है। और जब सुरक्षा का माहौल नहीं है तो जाहिर सी बात है कि विदेशी कंपनियां भारत में अपना पैसा लगाने से पहले दस बार सोचेंगीं। पूर्व प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के शुरूआती संबोधन में कहा था कि ‘‘वे हर आंॅख से ऑंसू पौछेंगे।‘‘ अब यह खबर चर्चा में रही कि रोहित वेमुला की हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हुई आत्म हत्या की घटना को याद कर अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनउू के एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री की आंखों में आंसू आ गए। अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग को माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आंसुओं पर कितना विश्वास हुआ होगा यह तो दलित एवं आदिवासी वर्ग ही जाने।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में देश के युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था कि ‘‘चाहे जातीय उत्पीड़न का जहर हो, साम्प्रदायिकता का जहर हो, क्षेत्रवाद का जहर हो या किसी भी प्रकार के उूंचनीच की भावना का जहर हो, इनसे देश के विकास में बाधाएं उत्पन्न होती हैं। आजादी के बाद इन तमाम विषमताओं का जहर देश में कब तक चलेगा। ‘‘प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा था कि ‘‘जान दे दूॅंगा पर आरक्षण को खत्म नहीं होने दूॅंगा।‘‘ प्रधानमंत्री के उक्त आह्वानों के बावजूद समाज में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में जातीय उत्पीड़न का जहर इस कदर फैल चुका है कि अब आरक्षण खत्म तो क्या आरक्षण के जरिए शिक्षा प्राप्त करने वाले दलित युवा जातीय उत्पीड़न के कारण आत्महत्या करके खुद को ही खत्म करने लगे हैं। देश में दलितों-आदिवासियों को मिले आरक्षण को समाप्त करने के अप्रत्यक्ष प्रयास तो नब्बे के दशक में ही शुरू हो गए थे। जब आर्थिक उदारीकरण के नाम पर सरकारी संस्थानों के निजीकरण की प्रक्रिया ने गति पकड़ी थी। आज थोड़ा बहुत आरक्षण बचा भी है तो आरक्षित वर्ग को उसकी कीमत सामाजिक प्रताड़ना, यहॉं तक कि आत्म हत्या को मजबूर होकर चुकानी पड़ रही है।

भारतीय लोकतंत्र में यह कैसी विडम्बना है कि दलित आन्दोलन के नाम पर शेर की तरह दहाड़ते हुए सवर्णों को आर्यों का वंशज एवं विदेशी, मनुवादी बताने वाले अवसरवादी नेता आज हिन्दुत्वीय ताकतों के सामने दुम हिलाते नजर आ रहे हैं। हालॉंकि उनका यह कदम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा साबित हो रहा है। अब तक मनुवाद, ब्राह्मणवाद के खिलाफ और बहुजनवाद के पक्ष मे वर्षों तक अपनी कलम चलाने वाले तथाकथित कुछ दलित बुद्धिजीवी एवं दलित साहित्कार भी हिन्दुत्वीय ताकतों के कसीदे लिखने-पढ़ने लगे हैं। जिस समाज में ऐसे नेता, तथाकथित बुद्धिजीवी, साहित्यकार मौजूद हों, तो उस समाज के पतन के लिए किसी शत्रु की आवश्यकता नहीं पड़ती। चुनावों के दौराने केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान का अधिकांशत‘ यह नारा हुआ करता है कि ‘‘ मैं उस घर में दिया जलाने निकला हॅूं जिसमें सदियों से अंधेरा है।‘‘ सुनने एवं पढ़ने में उक्त नारा बहुत अच्छा लगता है। उक्त मंत्री महोदय ने अपने बेटे चिराग पासवान को राजनीति में स्थापित कर स्वयं के घर में उजाला तो कर लिया है। पर यह कहना मुश्किल है कि देश में उक्त नारे से कितने घरों में उजाला हुआ है। कहा जाता है कि इक्कीसवीं सदी दलितों की होगी। लेकिन हाल की घटनाओं को देखते हुए एैसे में कैसे होगी इक्कीसवीं सदी दलितों की।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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