दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 04.02.16

 

‘न्यूयॉर्क में दलित, दिल्ली में ‘ब्राह्मण’ – बी बी सी

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/02/160204_hiding_dalit_identity_cj?ocid=socialflow_facebook%3FSThisFB

आईआईएमसी में दलित और गैर दलित के बीच बंटे छात्र – कैच न्यूज़

http://hindi.catchnews.com/india/iimc-dalit-students-speak-about-humiliation-on-the-campus-1454492858.html

दलित को सवर्णों ने नहीं रखने दी मंदिर में लग्न की पाती, चार पर केस दर्ज – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/MP-OTH-MAT-latest-dhar-news-021005-3541618-NOR.html

दलित भेदभाव की जड़ें – जनसत्ता

http://www.jansatta.com/politics/rohit-vemula-dalit-student-suicide-jansatta-varticle-jansatta-opinion-jansatta-story/66274/

“व्यापमं ने दलित छात्रों से अवैध रूप से वसूले 150 करोड़” – सकलेचा, दुबे – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-mppeb-dalit-students-illegally-collected-150-million-sklecha-dubey-652723

 

बी बी सी

‘न्यूयॉर्क में दलित, दिल्ली में ‘ब्राह्मण’

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/02/160204_hiding_dalit_identity_cj?ocid=socialflow_facebook%3FSThisFB

दिल्ली में मैंने दस साल बिताए. उन दस सालों में मैंने कॉलेज पूरा किया, एडवरटाइजिंग में नौकरी की और कई पत्रिकाओं और अख़बारों में काम किया. उस वक़्त मैं बस राजस्थान की एक लड़की थी.

मेरे पिताजी एक्साइज़ ऑफ़िस में थे, मैं बढ़िया इंग्लिश में बात करती थी और अपने ऑफ़िस की बाक़ी लड़कियों की तरह दिखती और चलती थी.

याशिका दत्त

मैं उन बाक़ी लड़कियां में से एक थी, जो दिखने में ऊंची जाति और ‘अच्छे घर’ से लगती थीं.

दिल्ली में उन दस सालों में मैंने बहुत कुछ देखा, सुना और किया. मैंने हर दूसरी रात मूलचंद पर परांठे खाए, हर महीने के अंतिम रविवार को सरोजिनी नगर की ख़ाक छानी और लगभग हर सप्ताहांत में हौज़ ख़ास गांव जाने के लिए ऑटो वालों से लड़ते हुए बिताया.

मैंने दिल्ली में बस एक चीज़ नहीं की. मैंने किसी को यह नहीं बताया कि मैं दलित हूँ.

मैंने किसी को यह बताना चाहा भी नहीं. क्या फ़ायदा होता? कुछ क़रीबी दोस्तों के अलावा, बाक़ी सब आपस में बातें करते, “तुम्हें पता है याशिका एससी है? यार, लगती तो बिलकुल नहीं है.”

कुछ लोग ऑफ़िस में बोलते, “भाई, इन लोगों का क्या है? ये तो सरकार के दामाद हैं… इन्हें बस एग्ज़ाम में बैठना होता है, पास तो अपने आप ही हो जाते हैं, मेहनत तो बस आप-हम जैसे लोगों को करनी पड़ती है, क्यों?”

इस तरह, मैं उनमें में से एक न होकर ‘इन लोग’ हो जाती. लगभग हर कोई मेरी क़ाबिलियत पर चर्चा कर रहा होता. मेरे चार साल में तीन प्रमोशन, देर तक ऑफ़िस में रह कर काम ख़त्म करना और मेरी कहानियां, जो सोशल मीडिया पर हज़ारों लाइक्स और शेयर्स पाती हैं, शायद किसी को नज़र नहीं आतीं. फ़िर भी जब वो उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते तो शायद कहते, “अच्छा! कोलंबिया जर्नलिस़्म स्कूल से है और दलित है!”

मैंने सुना था कि जिस नोट में मैंने पहली बार अपने दलित होने की बात की थी, उसके सोशल मीडिया पर शेयर होने के बाद एक पत्रकार ने कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया दी थी.

ऐसा लगता है कि दोनों बातें एक साथ होना नामुमकिन है और दलित घर में पैदा होते ही इंसान की क़ाबिलियत मर जाती है. मानो एक दलित लड़की का दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक में पढ़ना कोई अजूबा था.

अगर मैं दिल्ली के उन दस सालों में पूछने वालों को यह नहीं बोलती कि मैं ब्राह्मण हूं, तो लाजपत नगर में किराये का वो मकान जिसमें मैं सात साल रही, उसमें मुझे कोई छह महीने भी नहीं रहने देता.

मैं छह महीने भी तब रह पाती जब दलित लड़की को घर देने के लिए कोई तैयार होता.

वैसे मेरे मकान मालिक ने कभी पूछा भी नहीं, क्योंकि इसकी ज़रुरत ही नहीं पड़ी. मैं दिखने में ‘दूसरी जाति’ की जो लगती थी. उन्होंने खुद ही अंदाज़ा लगा लिया (शायद मेरे रंग, मेरी अच्छी नौकरी और मेरी दबंगई को देखकर) कि मैं दलित तो हो ही नहीं सकती.

सारे दलित मानो इंसान न होकर जानवरों की एक नई प्रजाति हो गए, सब एक जैसे दिखते हैं या फिर जैसे दूसरी जाति की तरह दिखना, दलित दिखने से बेहतर है.

मगर हमारे समाज के लिए वही बेहतर है. अगर नहीं होता तो मुझे हर वक़्त इस बात का एहसास न होता कि मैं कितनी भाग्यशाली हूं, जो सफाई देकर अपनी जाति छुपा सकती हूं.

मैं हर तरह के दोस्त बना सकती हूं, जिन्हें दलित से भेदभाव नहीं, वो भी, और जो हमें देखने भर के बाद नहाना पसंद करते हैं, वो भी. मुझे मिलने पर हर कोई मुझे मेरे दम पर आंकेगा, मेरी जाति के दम पर नहीं.

पर क्या मैं अपना नोट दिल्ली में रहकर काम करते हुए लिख पाती? क्या मैं इतनी बेबाक होकर यह कह पाती कि मैं दलित हूँ? शायद नहीं. दिल्ली में जो राज़ मैंने इतने साल अपने पास छुपाये रखा, उसको अचानक खोल देना मेरे लिए मुश्क़िल होता, शायद नामुमकिन भी.

यहां न्यूयॉर्क में उस भेद का कोई मोल नहीं रहा. कम से कम, मेरी रोज़ाना ज़िन्दगी में तो नहीं.

यहां क़रीब दो साल से न मुझसे किसी ने मेरी जाति पूछी न मुझे झूठ बोलने पर मजबूर किया. इसलिए तो उस झूठ की ज़रुरत भी अपने आप ख़त्म हो गई.

जाति छुपाना मेरे लिए अब उतनी बड़ी बात नहीं रही, जितनी दिल्ली में थी. अब खुल कर ‘बाहर आना’ मेरी लिए आसान है और रोहित वेमुला की मौत के बाद ज़रूरी हो गया.

क़ाश वो शहर जिससे मुझे बचपन में ही प्यार हो गया था, जहां मैंने सब कुछ सीखा और जिसने मुझे इतना कुछ दिया, वो मुझे ‘मैं’ होने की आज़ादी भी दे पाता.

कैच न्यूज़

आईआईएमसी में दलित और गैर दलित के बीच बंटे छात्र

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देश के सबसे नामी पत्रकारिता शिक्षण संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में इन दिनों दलितों से भेदभाव का मुद्दा गरमाया हुआ है.

यह मामला हैदराबाद युनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद शुरू हुआ.

आईआईएमसी के एक दलित-आदिवासी छात्र समूह ने आरोप लगाया है कि संस्थान के ही कुछ वर्तमान छात्र फेसबुक पर दलित छात्रों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं. उनके खिलाफ एक तरह का अभियान चला रहे हैं.

18 जनवरी को हिंदी पत्रकारिता के छात्र उत्कर्ष सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी जिस पर संस्थान के दलित-आदिवासी छात्रों ने आपत्ति जताई है.

इस मामले में उत्कर्ष सिंह ने कहा है कि उन्होंने अपने फेसबुक पर लिखी टिप्पणी में सुधार कर लिया है. इस मामले में अगर किसी व्यक्ति को ठेस पहुंची हैं तो वह खेद व्यक्त करते हैं. उत्कर्ष ने बताया कि दो फरवरी को संस्थान के ओएसडी के सामने उन्होंने लिखित में माफी मांग ली है.

लेकिन आईआईएमसी में दलित छात्रों का समूह उत्कर्ष के निष्कासन की मांग कर रहा है. सामाजिक न्याय मंत्रालय, आईआईएमसी प्रशासन और एसटी-एसी आयोग के अध्यक्ष को पत्र लिखकर इन छात्रों ने मामले की जानकारी दी है. कैच के पास छात्रों के पत्र, उत्कर्ष की पोस्ट और उनके समर्थन में फेसबुक पर चलाए जा रहे अभियान की तस्वीरें मौजूद हैं.

आरोपी छात्र उत्कर्ष के अनुसार संस्थान के ही कुछ छात्र जानबूझकर इस मामले को तूल दे रहे हैं. यह विवाद कैंपस के अंदर का था जिसे बाहर लेकर जाने की जरूरत नहीं थी.

वहीं उत्कर्ष के फेसबुक पोस्ट पर आईआईएमसी के ईजे के छात्र प्रशांत कनोजिया ने कार्रवाई की मांग की है. दलित और आदिवासी छात्रों की तरफ से सामूहिक रूप से उन्होंने पहले माफी की मांग की थी लेकिन अब इनकी मांग है कि उत्कर्ष को निष्कासित किया जाय. उनके अनुसार संस्थान को तीन दिन पहले इस मामले की जानकारी दी गई थी. लेकिन संस्थान ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं है.

उन्होंने बताया कि आईआईएमसी में दलित-अादिवासियों के लिए अलग से कोई सेल नहीं है. प्रशांत के अनुसार उत्कर्ष के मामले में संस्थान के ओएसडी अनुराग मिश्रा ने कहा है कि पहले एससी-एसटी सेल का गठन किया जाएगा. उसके बाद इस मामले की जांच होगी. जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कार्रवाई होगी.

प्रशांत के अनुसार संस्थान के रवैये नाखुश होकर उन्होंने इस मामले को लेकर सामाजिक न्याय मंत्रालय, आदिवासी मामलों के मंत्रालय और एससी-एसटी आयोग के चेयरमैन को पत्र लिखा है. उनके अनुसार उत्कर्ष का खेद केवल दिखावा है कि और फेसबुक पर उसके समर्थन में पोस्ट लिखे जा रहे हैं.

प्रशांत के अलावा 16 अन्य छात्रों ने मंत्रालय और आईआईएमसी प्रशासन को लिखे पत्र में अपने हस्ताक्षर किए हैं. इस मामले में आईआईएमसी संस्थान के अधिकारियों ने कोई स्पष्ट जवाब देने की बजाय टालमटोल करते नजर आए. हिंदी पत्रकारिता के विभागाध्यक्ष हेमंत जोशी ने कहा कि इसका बेहतर जवाब ओएसडी ही दे सकते हैं. ओएसडी अनुराग मिश्रा से बात करने पर उन्होंने भी यह कहकर बात टाल दी कि इस मामले में बोलने के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं है.

संस्थान के आधिकारिक सूत्र ने बताया कि उत्कर्ष ने दो फरवरी को लिखित में खेद व्यक्त कर दिया है. इसके बाद यह मामला रफा-दफा हो गया. लेकिन तीन फरवरी को प्रशांत ने कई मंत्रालयों को फिर से पत्र लिखा है.

जाहिर है देश के शीर्षस्थ पत्रकारिता संस्थान में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.

दैनिक भास्कर

दलित को सवर्णों ने नहीं रखने दी मंदिर में लग्न की पाती, चार पर केस दर्ज

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लग्न की पाती रखने मंदिर पहुंचे एक दलित को सवर्णों ने रोक लिया और पाती नहीं रखने दी। मामला थाने पहुंचा। पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया है। घटना मंदसौर जिले की सीतामऊ तहसील के कम्माखेड़ी में मंगलवार रात 8 बजे हुई।

पुलिस ने बताया कम्माखेड़ी निवासी 61 वर्षीय बगदीराम सूर्यवंशी के बेटे गोपाल की शादी 14 फरवरी को है। इसके लिए साठखेड़ा में पंडित से लग्न की पाती लिखवाकर लाए थे। इसे वे कम्माखेड़ी के राम-जानकी मंदिर में रखने पहुंचे। मंदिर के बाहर गांव के चार लोगों ने उन्हें रोका और मंदिर में नहीं जाने दिया। उन्होंने बगदीराम को अपमानित भी किया। बगदीराम की शिकायत पर सीतामऊ पुलिस थाने में मनोहरदास बैरागी, विजय शर्मा, भारत चारण एवं कमलाशंकर शर्मा के खिलाफ मारपीट के अलावा एससी-एसटी एक्ट की धारा 3 (1) 10 के तहत केस दर्ज किया। पुलिस के मुताबिक आरोपी फरार हैं।

इसलिए जा रहे थे मंदिर 

रिवाज है कि पंडित से लग्न की पाती लिखवाने के बाद उसे शादी के अन्य कार्यक्रम तय होने तक मंदिर में रखा जाता है। सभी दिन एवं रस्में तय होने के बाद विधि-विधान से लग्न को घर लाया जाता है। बगदीराम इसी रस्म को पूरा करने के लिए मंदिर में पाती रखने जा रहे थे।

अजाक पुलिस करेगी जांच 

सीतामऊ पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर अजाक थाने को भेज दिया है। डीएसपी अजाक प्रदीप बख्शी का कहना है बुधवार को केस डायरी आई है। गुरुवार से मामले की जांच की जाएगी।

जनसत्ता

दलित भेदभाव की जड़ें

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रोहित वेमुला जैसी घटना से राष्ट्र को जितनी हानि होती है, उतनी शायद किसी से नहीं। इतनी बड़ी आबादी को दबा कर और अलग करके क्या किसी देश को विकसित और खुशहाल बनाया जा सकता है? दलित अपनी मुक्ति की लड़ाई खुद क्यों लड़ें, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भाषण देने वालों को ज्यादा लड़ना चाहिए।

जातीय भेदभाव और लिंग विभाजन राष्ट्रीय मुद्दे क्यों नहीं बनते? क्यों शोषित जातियां ही अपने भेदभाव के खिलाफ खड़ी हों, पूरा देश क्यों नहीं? क्या ये भेदभाव करने वाले दूसरे देश के हैं? लिंगभेद से कहीं बड़ा मुद्दा हमारे समाज में लिंग विभाजन का है, जिसे अभी तक पूरी मान्यता नहीं मिली है। अक्सर लिंगभेद पर चर्चा होती है, जबकि यह लिंग विभाजन का उत्पाद है। पुरुष बाहर का काम करें और औरतें घर का, ऐसी हमारे समाज की बनावट और सोच है। पुरुष बाहर की दुनिया से जूझते-जूझते मजबूत हो जाता है और आर्थिक ताकत भी उसी के हाथ होती है। यह अवसर महिलाओं को नहीं मिलता, इसलिए पुरुषों पर आश्रित रहना पड़ता है। घर का कर्ता भी पुरुष होता है।

जातीय भेदभाव और महिला उत्पीड़न की आवाज तभी तेज होती है जब कोई घटना घट जाए। रोहित वेमुला की आत्महत्या से देश में उबाल आ गया। जो विरोध कर रहे हैं, ज्यादातर दलित हैं और यह फिर से सिद्ध होता है कि वही अपनी लड़ाई लड़ें। अगर यह राष्ट्रीय मुद्दा बना होता तो क्या भारत हजारों वर्षों तक गुलाम रहा होता? लोग प्राय: अंगरेजों को हमें गुलाम बनाने का दोष देते हैं, लेकिन क्या यह संभव होता अगर हमारे लोगों ने उनका साथ न दिया होता। अंगरेज लाखों में नहीं, हजारों में थे, तो आखिर हुकूमत कैसे कर गए? जातीय विभाजन से राष्ट्रीयता का अभाव रहा, इसलिए लोग सुविधानुसार अपनी सेवाएं अर्पित करते थे। खासकर शोषित जातियों में अपने शासन-प्रशासन का बोध रहा ही न होगा, क्योंकि वे अपने तथाकथित सवर्ण समाज के मारे थे।

आश्चर्य है कि इसके बावजूद जो हिंदू समाज के संचालक थे, उन्होंने जातिविहीन समाज बनाने का आह्वान नहीं किया, जो अंतत: किसी भी बाहरी हमले को नाकाम करता है और अब भी यह राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाया है। पढ़े-लिखे लोग कहते नहीं थकते कि जाति अतीत की बात हो गई, लेकिन जब शादी के लिए विज्ञापन देते हैं तो जाति के भीतर ही।

रोहित वेमुला की घटना के बाद हजारों भेदभाव के मामले उभरे हैं। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी भेदभाव बड़े पैमाने पर दिखने लगा। दिल्ली विश्वविद्यालय हो, आइआइटी या अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भेदभाव आम है। अपवाद को छोड़ कर शायद ही कोई संस्थान ऐसा है, जो जातीय उत्पीड़न न करे। ऐसे उत्पीड़न होते हैं, जिसका संबंध दूर-दराज तक तथ्यों से भी नहीं होता। एम्स के नर्सिंग कॉलेज की शिक्षिका शशि मावर का उत्पीड़न किया गया कि उनके कारण बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र ने आत्महत्या कर ली थी, जबकि वे बीएससी चतुर्थ वर्ष और एमएससी के छात्रों को पढ़ाती थीं। मृतक छात्र से उनका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन प्रधानाचार्य ने छात्रों को शशि मावर के खिलाफ भड़काया और इसी को आधार बना कर उन्हें दंडित किया। शशि मावर का शैक्षणिक कार्य अच्छा था और उनका चयन सामान्य श्रेणी से हुआ था, यह ईर्ष्या का एक बड़ा कारण था। अधिकतर अनुसूचित जाति/ जनजाति के शोधार्थियों ने उत्पीड़न की शिकायत की है। महिला हों तो शारीरिक शोषण का प्रयास होता है।

आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार की एक दलित शिक्षिका जब कक्षा में पढ़ाती हैं तो डीन आकर बैठ जाते हैं। ऐसे में विद्यार्थी उन्हें क्या सम्मान देंगे। इस दलित शिक्षिका के पढ़ाने के प्रति भी गंभीरता नहीं होगी। अगर दलित शिक्षिका के पढ़ाने के तौर-तरीके ठीक नहीं थे, तो उन्हें अलग से समझाना चाहिए था या छात्रों के ज्ञान के मूल्यांकन के आधार पर आकलन किया जाना चाहिए था। ये भेदभाव करने वाले क्या ईसाई, यहूदी, पारसी, चीनी, अमेरिकी या मुसलिम हैं? राजनीति में इस अहम सवाल को कभी संबोधित नहीं किया गया।

जो आरोप मार्क्सवादियों पर लगता है कि उन्होंने विदेशी मॉडल को ज्यों का त्यों भारत के परिप्रेक्ष्य में लागू किया, लगभग वही हम सब पर लगना चाहिए। जनतंत्र को हमने स्वीकार तो किया, जिसका आविर्भाव और विकास यूरोपीय देशों में हुआ था, लेकिन राज्य के कल्याणकारी चरित्र के बाहर नहीं जा सके। यूरोप में सरकारों की जिम्मेदारी रोटी, कपड़ा, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान आदि की थी। जब हमने जनतंत्र को अपनाया तो इन समस्याओं के अतिरिक्त सामाजिक भेदभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए था। हमने आंख मूंद कर नकल की। राजनीतिक दलों और नेताओं ने जाति तोड़ने की जिम्मेदारी नहीं ली और अंतत: सरकार भी इस मामले में तटस्थ रही। जिस समाज में जातिवाद नहीं था, वहां तो राज्य का चरित्र कल्याणकारी होना ही है, लेकिन हमारे समाज भिन्न हैं। जातीय भेदभाव खत्म करना राज्य के कल्याणकारी चरित्र के केंद्र में होना और सरकार को लगातार इसे संबोधित करना चाहिए था।

रोहित वेमुला से भी दर्दनाक घटनाएं हुई हैं, पर जितना मीडिया में कवरेज इसको मिला किसी और घटना को नहीं। गुस्सा, दर्द और आक्रोश जो दबे हुए थे, वे इस घटना के माध्यम से प्रकट हुए। निर्भया की घटना ने दुनिया को झकझोर दिया, लेकिन ऐसा नहीं है कि वैसे जघन्य अपराध पहले न होते रहे हों। महिलाओं पर हो रहे भेदभाव, उत्पीड़न आदि पर जो गुस्सा और दर्द दबा हुआ था वह उस समय प्रकट हो गया था। मीडिया की बड़ी भूमिका रोहित वेमुला की घटना को राष्ट्रव्यापी बनाने में रही। यह भी समय और परिस्थिति की ही देन थी कि मीडिया ने इतनी हवा इस घटना को दे दी। क्या इससे हम मानें कि मीडिया का रिश्ता दर्द का है। जितना मीडिया भेदभाव करती है, उतना कोई और कर ही नहीं सकता। किसी भी राष्ट्रीय अखबार में दलित के बारे में खबर तभी छपती है जब कोई घटना घटित हो जाए जैसे- हत्या, बलात्कार आदि। साल भर के अखबार उठा कर देखें, तो दलित द्वारा लिखा लेख पढ़ने को नहीं मिलेगा। रोहित वेमुला पर मैंने लिखना चाहा तो लगभग सभी अखबारों ने मना कर दिया। इतने भी हम गए-गुजरे नहीं हैं कि लिख नहीं सकते।

मीडिया सबसे ज्यादा जातिवादी है। यह तथ्यों के आधार पर कहा जा रहा है। तमाम अखबार और चैनल वार्षिक सम्मेलन करते हैं, जिसमें देश-विदेश से अतिथि और वक्ता बुलाए जाते हैं, लेकिन दलित को आमंत्रित नहीं किया जाता। दलित-आदिवासी की आबादी लगभग तीस करोड़ है। क्या पूरे देश से दो-चार भी नहीं होंगे, जो इनके वार्षिक सम्मेलन में विचार न रख सकें या मान लिया गया है कि इनके पास विचार होते ही नहीं। भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि जिन क्षेत्रों में दलितों और पिछड़ों की पारंगतता यानी उपलब्धि खास न हो, उन्हीं पर चर्चा और पुरस्कार आयोजित होते हैं, ताकि इन्हें बाहर रखा जा सके। चूंकि भारतीय समाज पेशे पर आधारित रहा है, इसलिए दलित-पिछड़े उन्हीं क्षेत्रों में माहिर हो सकते हैं, जो सदियों से करते आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की कई सालों से उस समय भरमार हो जाती है जब छब्बीस जनवरी को पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, घोषित होते हंै। दलितों-पिछड़ों को पुरस्कार नहीं मिलते, तो सोशल मीडिया के माध्यम से ही उनका गुस्सा फूटता है। सारे इंजीनियरिंग आदि विषय दूसरे देशों में क्यों विकसित हुए? इसलिए कि जो हाथ चमड़ा, बर्तन, लोहा, कपड़ा आदि में सने, उनको सम्मान दिया गया। ये हाथ फिर पे्ररित हुए, आगे और अच्छा करने का सोचा और धीरे-धीरे तमाम तकनीक और नई खोजें विकसित कर ली। उन्हीं ने आगे विषय, संस्थान और डिग्री का रूप धारण किया। उदाहरण के लिए हमारे यहां जिन्होंने चमड़े के क्षेत्र में काम किया, उन्हें सम्मानित करने के बजाय अछूत का दर्जा दिया गया तो वे कैसे प्रोत्साहित होकर आगे तकनीक विकसित या शोध करते?

तथाकथित राष्ट्रभक्तों से कहना है कि रोहित वेमुला जैसी घटना से राष्ट्र को जितनी हानि होती है, उतनी शायद किसी से नहीं। इतनी बड़ी आबादी को दबा कर और अलग करके क्या किसी देश को विकसित और खुशहाल बनाया जा सकता है? दलित अपनी मुक्ति की लड़ाई खुद क्यों लड़ें, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भाषण देने वालों को ज्यादा लड़ना चाहिए। दलित-पिछड़े हजारों वर्षों से अभाव की जिंदगी जीने के आदी हो गए हैं, तो आगे भी बर्दाश्त करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन क्या हमारा देश दौड़ में उन देशों के साथ भाग सकता है, जो विकसित हो गए हैं या उस लक्ष्य को प्राप्त कर रहे हैं। यह गारंटी है कि इतनी बड़ी आबादी को काट कर देश को विकसित नहीं किया जा सकता।

अतीत से हमने कुछ नहीं सीखा है। सिकंदर ने 327 ईसा पूर्व में भारत पर हमला किया और आसानी से जीत हासिल कर ली। उसके बाद हमले-दर-हमले होते रहे और हम परास्त। यह नहीं कि हमारी बाजुओं में दम नहीं था या बुद्धि की कमी थी। कारण यह था कि हम जातियों में बंटे थे। अंगरेजों ने तो हमें दो भागों में बांटा, लेकिन हमने अपने आप को जाति के आधार पर हजारों टुकड़ों में बांट रखा है। जो राष्ट्रभक्त होने का दंभ भरते हैं, उन्हें दलितों से भी आगे आकर रोहित वेमुला जैसे मामले को उठाना चाहिए, लेकिन करते हैं दिखावा, क्योंकि लेना है वोट और प्राप्त करना है अपनी प्रसिद्धि, ज्ञान और धर्मादा क्षेत्र में प्रभुत्व।

नई दुनिया

“व्यापमं ने दलित छात्रों से अवैध रूप से वसूले 150 करोड़” – सकलेचा, दुबे

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-mppeb-dalit-students-illegally-collected-150-million-sklecha-dubey-652723

भोपाल। पूर्व विधायक पारस सकलेचा और आरटीआई कार्यकर्ता अजय दुबे ने आरोप लगाया है कि व्यापमं ने दलित वर्ग के छात्रों से अवैध रूप से 150 करोड़ रुपए की फीस वसूल ली। यह राशि 2004 से 2013 के बीच वसूली गई, जबकि इस वर्ग के छात्रों को फीस नहीं लगती।

उन्होंने व्यापमं घोटाले की जांच में सीबीआई की सुस्ती पर भी सवाल उठाए। सकलेचा और दुबे ने बुधवार को पत्रकार वार्ता में कहा कि दलित छात्रों से फीस वसूलने के मामले में दोषी अफसरों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जाएं।

सकलेचा ने आरोप लगाया कि निजी मेडिकल कालेजों की 1200 सीटों में आरक्षण का पालन नहीं किया गया। एससी-एसटी कोटे की 400 सीटें बेच दी गईं, 4-10 फीसदी बच्चों को ही आरक्षण का लाभ मिला। प्रतिभाशाली दलित छात्र जो मेरिट में आए उन्हें सामान्य वर्ग में शामिल नहीं किया गया।

पत्रकारवार्ता में मौजूद मप्र तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अरुण द्विवेदी ने कहा कि राज्य सरकार आईएएस रमेश थेटे एवं शशि कर्णावत (निलंबित) को प्रताड़ित कर रही है।

रंजना को आरोपी नहीं बनाया

सकलेचा ने बताया कि सीबीआई ने व्यापमं से जुड़े 212 प्रकरणों के बजाए 157 ही जांच में लिए हैं, जबकि अन्य में जांच न कर हाई प्रोफाइल आरोपियों को बचाया जा रहा है। व्यापमं की पूर्व अध्यक्ष रंजना चौधरी को पंकज त्रिवेदी ने 42 लाख रुपए नकद दिए, लेकिन सीबीआई ने रंजना के खिलाफ प्रकरण दर्ज नहीं किया।

इस तरह और भी आरोपी हैं जिन्हें बख्श दिया गया। व्यापमं के सुधार के लिए बनी कमेटी की अनुशंसाओं का पालन भी नहीं हुआ। सीबीआई ने चार दिन पहले व्यापमं में सुपरवाइजर रहे अफसरों के 8 ठिकानों पर छापे मारे, लेकिन उनकी पहचान उजागर नहीं की। आखिर सीबीआई दागियों के नाम क्यूं छिपा रही है।

नहीं पहुंची कर्णावत

पत्रकार वार्ता में निलंबित आईएएस शशि कर्णावत को भी पहुंचना था, लेकिन वे नहीं आईं। इस पर सकलेचा और दुबे ने कहा कि कर्णावत ने उन्हें समर्थन दिया है। वे दोनों एवं कर्मचारी संघ भी कर्णावत-थेटे को मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि कर्णावत उनके साथ मैहर उपचुनाव में चलें और दलित होने के कारण सरकार द्वारा उन पर जो अत्याचार किए जा रहे हैं उन्हें वहां की जनता को बताएं।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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