दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 31.01.16

 

दलितों के घर उजाड़ने, आग लगाने का आरोप – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/pilibhit/pilibhit-crime-news/dalit-home-overrun-accused-of-setting-fire-hindi-news/

करनाल में दलित महिला की हत्या की जांच सीबीआई के हवाले – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/feature/samachar/national/karnal-murder-case-handed-over-to-cbi-hindi-news/

बिहार में दलित उत्पीड़न की लगातार बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंताजनक: कुणाल आर्याव्रत

http://www.liveaaryaavart.com/2016/01/sc-st-position-bad-in-bihar-kunal.html

एएमयू के वास्ते, अंबेडकर के रास्ते – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/aligarh/aligarh-hindi-news/amu-s-sake-ambedkar-way-hindi-news/

दलित संवादः दलित चेतना की बंगीय भूमि – जनसत्ता

http://www.jansatta.com/sunday-column/jansatta-article-jansatta-opinion-jansatta-sunday-column/65224/

 

अमर उजाला

दलितों के घर उजाड़ने, आग लगाने का आरोप

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गजरौला थाना क्षेत्र के गांव सिरसा सरदाह के ग्रामीणों ने लेखपाल, पुलिस और प्रधान के पति पर उनके आवास जेसीबी से गिराने और उनमें आग लगाने का आरोप लगाया है। ग्रामीणों ने एसडीएम से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की है।

गांव सिरसा सरदाह निवासी दलित जंगबहादुर सहित तमाम ग्रामीणों ने शनिवार को कलेक्ट्रेट पहुंचकर एसडीएम कार्यालय में शिकायत की। जंगबहादुर का आरोप है कि वह अपने दो बेटों के साथ गांव में छप्परदार कच्चे घर में 20 वर्षों से रह रहे हैं। 29 जनवरी को लेखपाल पुलिस टीम के साथ पहुंचा और जेसीबी से उनका मकान गिराकर आग लगा दी। गांव की गीता देवी का आरोप है कि उनके पति विकलांग हैं। कुछ दिनों पहले उन्होने सरकार से आवास मिला था जिसका निर्माण चल रहा है। लिंटर पड़ने की तैयारी थी, लेकिन प्रधान के पति, लेखपाल और पुलिस ने जेसीबी से मकान गिरा दिया। विरोध किया तो इन लोगों ने गालियां दी और जेल भेजने की धमकी दी। इस बाबत जानकारी करने पर तहसीलदार सदर इंद्राकांत द्विवेदी ने बताया कि दोनों आवास तालाब पाटकर बनाए गए थे। कई बार प्रयास करने पर भी खाली न करने पर जेसीबी से मकान गिरवाए गए हैं। आग लगाने का आरोप गलत है। दोनों के खिलाफ जल्द एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी।

अमर उजाला

करनाल में दलित महिला की हत्या की जांच सीबीआई के हवाले

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सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए हरियाणा के करनाल में एक दलित महिला की हत्या के मामले की जांच सीबीआई के हवाले करने का आदेश दिया है। इस महिला की नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म भी किया गया था। हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की याचिका खारिज कर दी थी।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला दरकिनार

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और प्रफुल्ल सी. पंत की पीठ ने वर्ष 2012 की इस घटना की सीबीआई जांच करने का आदेश देते हुए कहा है कि ट्रायल शुरू होने का यह मतलब कतई नहीं है कि मामले की नए सिरे से जांच का काम दूसरी एजेंसी को नहीं सौंपा जा सकता।

पीठ ने कहा कि फिर से जांच के आदेश देने या नए सिरे से जांच कराने का आदेश देने का अधिकार संविधानिक अदालत के पास निहित है। ट्रायल का शुरू हो जाना और कुछ गवाहों के बयान दर्ज होने का यह मतलब नहीं है कि संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ये अधिकार इसलिए ही होते हैं कि मामले की जांच निष्पक्ष और सही तरीके से हो।

आर्याव्रत

बिहार में दलित उत्पीड़न की लगातार बढ़ती घटनायें अत्यंत चिंताजनक: कुणाल

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पटना 30 जनवरी 2016, माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि नीतीश सरकार बिहार में महादलितों के उत्थान के लिए पुरस्कार हासिल करने की जुगत में लगी है, लेकिन हाल के दिनों में दलित उत्पीड़न की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है. कहीं दलितों के उपर तेजाब से हमल हो रहे हैं, कहीं भूख से उनकी मौतें हो रही हैं और सरकार तमाशबीन बैठी हुयी है. यह अत्यंत शर्मनाक है.

उन्होंने कहा कि अररिया जिले के नरपतगंज प्रखंड के बहादुरपुर गांव में जिस तरह दलित समुदाय के 10 लोगों पर दबंगों ने तेजाब फेंककर उन्हें जान से मारने की कोशिश की, वह दिखलाता है कि राज्य में दबंगों का मनोबल लगातार बढ़ता जा रहा है और राज्य सरकार ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. हत्यारों-दबंगों पर कठोर कार्रवाई नहीं किए जाने की वजह से ही उनका मनोबल लगातार बढ़ता जा रहा है. वहीं वैशाली के लालगंज प्रखंड के शमसपुरा गांव में एक महादलित चैती देवी की भूख से मौत की भी खबर सामने आ रही है.

उन्होंने कहा कि अररिया की घटना की जानकारी मिलने के उपरांत आज भाकपा-माले की राज्य कमिटी के सदस्य काॅ. पंकज सिंह ने पूर्णिया अस्पताल का दौरा करके घायल आनंदी ऋषिदेव व अन्य घायलों से मुलाकात की. आनंदी ऋषिदेव सहित 2 लोगों की हालत बेहद चिंताजनक है. घायलों में 2 बच्चे भी शामिल हैं. इनका अपराध बस इतना था कि जिस जमीन पर वे बसे हैं, उस जमीन से होकर रास्ता बनाये जाने का विरोध किया था. वैशाली में माले व अखिल भारतीय किसान महासभा की संयुक्त टीम ने शमसपुरा गांव का दौरा करके घटना की विस्तार से जानकारी ली. इस टीम में किसान महासभा के बिहार राज्य अध्यक्ष काॅ. विशेश्वर प्रसाद यादव, किसान महासभा के वैशाली जिला अध्यक्ष काॅ. अरविंद कुमार चैधरी, उपाध्यक्ष सीताराम भगत, पार्टी के प्रखंड सचिव काॅ. ललन श्रीवास्तव और अधिवक्ता विजेन्द्र प्रसाद यादव शामिल थे.

जांच टीम ने कहा है कि महादलित महिला चैती देवी की भूख मौत से हुई है. 500 की आबादी वाले इस महादलित टोले में आधे परिवार के पास राशन कार्ड हैं ही नहीं. जिन लोगों के पास राशन कार्ड है, उनमें आधे से अधिक में परिवार के सभी सदस्यों का नाम राशन कार्ड में नहीं है. जनवितरण प्रणाली पूरी तरह से ध्वस्त है. तीन-चार महीने में एक बार जनवितरण दुकान से महादलितों को कुछ दे दिया जाता है. हालत यह है कि गांव के अधिकांश लोग भूख व कुपोषण के शिकार हैं. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का खाद्य आपूर्ति विभाग, जनवितरण प्रणाली आदि तमाम सिस्टम या तो पूरी तरह से असफल हैं या उनमें घोर भ्रष्टाचार है.

अमर उजाला

एएमयू के वास्ते, अंबेडकर के रास्ते

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एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप को पूरी तरह नकारती रही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अब एएमयू में दलितों के लिए आरक्षण लागू कराने के लिए संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की राह पर चल पड़ी है। यही कारण रहा कि अलीगढ़ के डीएवी कॉलेज में शनिवार को शुरू हुए अभाविप ब्रज प्रांत के 56वें अधिवेशन में अंबेडकर का जमकर गुणगान किया गया।

ऐसा होना स्वाभाविक दिखाई नहीं देता, कारण स्पष्ट है कि हैदराबाद में छात्र रोहित वेमुला की मौत के मामले में अभाविप पर ही आरोप लगाए जा रहे हैं, हालांकि परिषद के नेता रोहित को दलित बताने वालों पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं। उधर, पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने भी तारीफ में कसीदे कढे़। कहा, संविधान निर्माता बाबा साहब सर्वसमाज के नेता थे, वर्ग विशेष से जोड़कर उन्हें नहीं देखना चाहिए।

अभाविप के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आंबेकर का पिछले वर्ष एएमयू में किया गया गोपनीय दौरा ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित होने के बाद चर्चाओं में आ गया। यह चर्चा भी आम हो गई थी कि अभाविप के प्रस्तावों पर ही केंद्र सरकार ने विचार करते हुए एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप को पूरी तरह नकार दिया। बताया जाता है कि इन्हीं प्रस्तावों में एएमयू में ओबीसी, एससी और एसटी के छात्रों के लिए आरक्षण लागू करने की मांग भी की गई थी।

अब चूंकि अलीगढ़ में ही अभाविप का प्रांतीय अधिवेशन चल रहा है इसलिए एएमयू पूरी तरह निशाने पर है। अधिवेशन में शामिल हुए सुनील आंबेकर ने एएमयू में आरक्षण लागू करने की वकालत करते हुए डॉ. अंबेडकर की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि अंबेडकर को बाबा इसलिए कहा जाता है कि वह सबके थे।

समानता लाने के लिए ही बाबा साहब ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की। जानकार बताते हैं कि अभाविप के किसी प्रांतीय अधिवेशन में डॉ. अंबेडकर की इस तरफ तारीफ पहली बार है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि हैदराबाद में छात्र की आत्महत्या के मामले में अभाविप पर ही आरोप लगाते हुए इस संगठन को दलित विरोधी बताया जा रहा है।

एएमयू में भी लागू हो आरक्षणः आंबेकर

अलीगढ़ (ब्यूरो)। एबीवीपी के रार्ष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील आंबेकर ने कहा है कि अमुवि के अल्पसंख्यक स्वरूप का मामला हो या फिर हैदराबाद विवि में हुई छात्र की मौत का मामला। इन मामलों को लेकर घिनौनी राजनीति की जा रही है। उन्होंने कहा कि एएमयू कोई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान नहीं है। वहां एससी, एसटी आदि के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू होनी चाहिए। इसकी मांग भी प्रधानमंत्री से की गई है कि वर्ष 2016 के सत्र में वहां यह व्यवस्था लागू की जाए।

उन्होने कहा कि इसे लेकर आंदोलन भी किया जाएगा। वह परिषद के सम्मेलन के दौरान यहां पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हैदराबाद विश्वविद्यालय में छात्र रोहित की मौत को लेकर भी गंदी राजनीति की जा रही है। ऐसे में संगठन ने सात दिन तक का इस घटना के सच कोे उजागर करने का जागरण अभियान छेड़ा है। सात दिन तक स्कूल, कॉलेजों में जाकर संगठन के कार्यकर्ता व पदाधिकारी यह बताएंगे कि आखिर वहां सही घटना क्या थी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जैसे नेता वहां जाकर गलत राजनीति कर रहे हैँ।

एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप के मसले पर उन्होंने कहा कि तुष्टिकरण के तहत एएमयू को अल्पसंख्यक स्वरूप देने की मांग की जा रही है। एएमयू कभी अल्पसंख्यक संस्था थी ही नहीं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि आज शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। इस पर रोक की जरुरत है। ऐसे में और ज्यादा सरकारी महाविद्यालयोें की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के विश्वविद्यालयों की हालत खराब है। इनके सुधार की जरुरत है। उन्होंने छात्राओं की सुरक्षा पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि छात्रों की समस्याओं को लेकर विद्यार्थी परिषद ने हमेशा लड़ाई लड़ी है और लड़ती रहेगी।

जनसत्ता

दलित संवादः दलित चेतना की बंगीय भूमि

http://www.jansatta.com/sunday-column/jansatta-article-jansatta-opinion-jansatta-sunday-column/65224/

बांग्ला दलित साहित्य में इतिहास मुखर नहीं है। ऐसा लग सकता है कि बांग्ला दलित रचनाकार इतिहास के प्रति बेपरवाह रह कर लिखते हैं। मगर सच है कि बोध के स्तर पर इतिहास वहां अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित है। इतिहास कई तरह से सहायता करता प्रतीत होता है। वह सबसे ज्यादा ‘सवर्ण छल’ को समझने की जमीन मुहैया कराता है।

भारतीय दलित साहित्य की अवधारणा बांग्ला दलित साहित्य को शामिल किए बगैर पूरी नहीं होती। दिक्कत यह है कि हिंदीभाषी जनता के बीच बांग्ला के दलित साहित्य की चर्चा अभी ठीक से शुरू नहीं हुई है। बंगाल में दलित आंदोलन और लेखन की एक सशक्त परंपरा लंबे समय से गतिमान है। इस परंपरा के नायकों में अविभाजित बंगाल के श्रीहरिचांद ठाकुर, श्रीगुरुचांद ठाकुर और विभाजित बंगाल के महाप्राण जोगेंद्रनाथ मंडल के नाम लिए जा सकते हैं। हरिचांद ठाकुर द्वारा प्रवर्तित और उनके पुत्र गुरुचांद द्वारा विकसित मतुआ धर्म ने बंगाल के दलितों को संगठित करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मतुआ धर्ममत में दलितों की उन्नति के तीन साधन बताए गए हैं- शिक्षा की प्राप्ति, संपत्ति का अर्जन और राजकार्य में हिस्सेदारी। आंबेडकर के उदय से पहले बांग्ला दलित चेतना का यह स्तर गौर करने लायक है। यों तो इस प्रांत के दलित समुदाय से जुड़े लेखक बहुत पहले से लिखते रहे हैं, लेकिन जिसे आज दलित साहित्य कहा जाता है उसकी शुरुआत यहां 1964 में हुई। सन 1987 में ‘बंगीय दलित लेखक परिषद’ के गठन के बाद दलित साहित्य आंदोलन सघन रूप से आगे बढ़ता है।

वर्चस्व और दासता को वैज्ञानिक दृष्टि से समझे बगैर वर्ण-जाति की कार्य-पद्धति का ठीक-ठीक विश्लेषण करना मुश्किल है। ऐसे विश्लेषण से जो समझ विकसित होती है वह रचनाकार को ‘याचना-भाव’ से मुक्त करती है। पिछली शताब्दी के पांचवें दशक से पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट आंदोलन का जो प्रसार हुआ उसने इस समझ के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। श्रमिकों की कक्षाएं लगनी शुरू हुर्इं। इन कक्षाओं में शोषण की प्रक्रिया और अर्थतंत्र की जानकारी दी जाती थी। श्रमिकों में दलित बहुसंख्यक थे। सवर्ण वर्चस्व का भौतिक आधार समझने के बाद मानसिक दासता के तंतुओं के टूटने-बिखरने का सिलसिला शुरू हुआ। इस बदलाव को तत्काल आंक पाना कठिन था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि दलित अब भी आर्थिक रूप से अधीनस्थ स्थिति में ही थे। उत्पादन के साधनों पर जब तक पारंपरिक कब्जा बना रहेगा तब तक चेतनागत परिवर्तनों की पूर्ण और अविकृत अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। दलित समुदाय में आए इस आभ्यंतरिक बदलाव को दलित रचनाओं में जगह मिली। बांग्ला दलित साहित्य का स्वर और स्वरूप इसीलिए शेष भारत के दलित साहित्य से भिन्न और विशिष्ट है। उसके अ-शिकायती लहजे का यही आधार भी है। वह इसीलिए पौराणिक-धार्मिक आख्यानों में ज्यादा नहीं उलझा। पौराणिक संदर्भों को इतिहास की वैज्ञानिक समझ के साथ देखने के कारण बांग्ला का दलित लेखन अस्मितावाद की अतीतोन्मुखी रुझान में उलझने से बच गया है। राष्ट्रवाद की अवधारणा के प्रति दलित साहित्य का आकर्षण कभी नहीं रहा। उग्र राष्ट्रवाद से तो उसका विकर्षण ही नजर आता है। उसके लिए जिंदगी की दुश्वारियां ही प्राथमिक रही हैं।

इन दुश्वारियों से निपटने में इतनी मुश्किलें रहीं कि उन्नीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवाद से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के वैश्वीकरण तक उसकी उदासीनता बनी हुई है। इधर के कुछ वर्षों में जिस दलित मध्यवर्ग का उभार हुआ है उसकी दिलचस्पी बेशक राष्ट्रवाद में है और उनमें से कुछ का झुकाव तो हिंदू राष्ट्रवाद में भी है, मगर दलित साहित्य ने अब तक इनके प्रति आलोचनात्मक रवैया बनाए रखा है। इस आलोचनात्मक रवैए की देन है पारंपरिक भारतीयता के बरक्स नई भारतीयता का निर्माण। नई भारतीयता के निर्माण की प्रक्रिया आंबेडकर के चिंतन और कार्यों से आरंभ हुई थी, जो बाद के दलित आंदोलन और लेखन से आकार पाती गई। यह भारतीयता बुद्ध की करुणा से संबद्ध, सिद्धों के सहजयान से प्रेरित, संतों की समाज-चिंता से जुड़ी और आंबेडकर की विश्वदृष्टि से निर्मित है। बांग्ला दलित साहित्य ने इस भारतीयता की रचना में उल्लेखनीय योगदान किया है। बौद्ध धम्म से उसका प्रगट और सघन जुड़ाव है। सिद्धों की बानी की अनुगूंजें उसकी शब्द रचना में साफ सुनी जा सकती हैं। संतों की फटकार भरी भाषा का उसने सार्थक उपयोग किया है। मार्क्सवाद में परिव्याप्त मानव मुक्ति की सार्वभौमिक चिंता से उसका नाता है। आंबेडकर की आंदोलनधर्मिता और चिंतनशीलता उसका आदर्श है। ‘आक्रोश’ दलित साहित्य के स्थायी लक्षणों में गिना जाता है।

बांग्ला दलित साहित्य भी आक्रोशपूरित है। लेकिन, यह आक्रोश शेष दलित साहित्य में प्राप्त आक्रोश से उल्लेखनीय भिन्नता लिए हुए है। जबकि अन्यत्र आक्रोश अपनी अभिव्यक्ति में सपाट हो जाता है, बांग्ला दलित साहित्य में वह व्यंजक ही बना रहता है। लक्ष्य पर सीधे प्रहार के बजाय वह व्यंग्य में घुल कर अपना काम करता है। जबकि प्राय: आक्रोश की प्रकृति एकमुखी होती है, बांग्ला दलित साहित्य में उसका अनेकमुखी विनियोजन दिखाई देता है। ऐसा आक्रोश चीख से नहीं, चिंतन से उद्भूत होता है। उसका टिकाऊपन भी इसीलिए अधिक रहता है। आक्रोश के शब्दांकन में नवाचारी प्रयोग भी रेखांकित किए जाने लायक है। बांग्ला दलित साहित्यकार दो (या दो से अधिक) स्थितियों को इस तरह आमने-सामने रखते हैं कि उनका अभीष्ट स्वयमेव व्यंजित हो जाता है। इस अभिव्यंजना में तल्ख व्यंग्य, अनदेखी विद्रूपताएं और संचित तथा सुचिंतित आक्रोश मौजूद होते हैं। बांग्ला दलित साहित्य मुख्यत: कविता केंद्रित है। इन कविताओं में वेदना-व्यथा का चित्रण कम और नकार-आक्रोश की मात्रा ज्यादा है। यह आक्रोश और नकार भाव दार्शनिकता का स्पर्श लिए हुए है। इस दार्शनिकता का स्वभाव आमतौर पर समझे जाने वाले दार्शनिक वृत्ति से अलग है। यह दलित दार्शनिकता है, जो ठसपन और अमूर्तन से मुक्त रह कर विकसित हुई है। यह क्रियाशील और सर्जनात्मक है। लक्ष्योन्मुखी और भविष्योन्मुखी है। बांग्ला दलित गद्य में वस्तुवर्णन खूब है। दलित जीवन की अभिव्यक्ति वस्तुनिरूपण के विस्तार में जाकर ही हो सकती है। कहानी और उपन्यास वर्तमान और इतिहास के ब्योरों से समृद्ध हैं। आत्मकथाओं में बांग्ला दलित जीवन के भरपूर ब्योरे हैं। इन सबके बावजूद स्थूल चित्रण बहुत कम मिलेंगे। कथातत्त्व की प्रबलता ब्योरों को अपने रंग में ढाल कर पेश करती है। यह प्रवृत्ति आत्मकथा में भी दिखाई देती है। उत्पीड़न के स्थूल चित्र शायद ही कहीं मिलें।

आत्मकथाएं इतिवृत्तात्मक होने से अधिक दलित जीवन का संश्लिष्ट यथार्थ प्रस्तुत करती हैं। मनोहर मौलि विश्वास और मनोरंजन व्यापारी की आत्मकथाओं से इस कथन की पुष्टि की जा सकती है। इन आत्मकथाओं में कथातत्त्व प्रबल है और यथातथ्य प्रस्तुति का आग्रह न्यूनतम है। परिवेश को समग्रता में देखने और उसे जीवंत बनाने में आत्मकथाकार का मन अधिक रमता है। वैयक्तिक कार्यों का लेखा-जोखा देने में बांग्ला का दलित लेखक संकोच करता प्रतीत होता है। बांग्ला दलित साहित्य में इतिहास मुखर नहीं है। ऐसा लग सकता है कि बांग्ला दलित रचनाकार इतिहास के प्रति बेपरवाह रह कर लिखते हैं। मगर सच है कि बोध के स्तर पर इतिहास वहां अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित है। इतिहास कई तरह से सहायता करता प्रतीत होता है। वह सबसे ज्यादा ‘सवर्ण छल’ को समझने की जमीन मुहैया कराता है। नागवंश से लेकर पाल वंश तक इतिहास के कई पड़ाव दलित समुदाय में आत्मविश्वास भरने का काम करते हैं। सुदूर अतीत जहां संबल प्रदान करता है वहीं निकट अतीत तनाव, बेचैनी और आक्रोश का सबब बनता है।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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