दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 27.01.16

 

जेएनयू के दलित छात्र ने दी खुदकुशी की धमकी – जनसत्ता

http://www.jansatta.com/rajya/jnu-dalit-student-threatens-suicide-in-a-letter-sent-to-vice-chancellor/64349/

दक्षिण के समाज में दलित – लाइव हिन्दुस्तान

http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-dalit-in-south-india-socicety-514186.html

ओडिशा में किसान दे रहे जान, सरकार मानने को तैयार नहीं – एन डी टीवी

http://khabar.ndtv.com/news/india/farmers-suicide-in-orissa-1270444

 

जनसत्ता

जेएनयू के दलित छात्र ने दी खुदकुशी की धमकी

http://www.jansatta.com/rajya/jnu-dalit-student-threatens-suicide-in-a-letter-sent-to-vice-chancellor/64349/

हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की खुदकुशी को लेकर राष्ट्रव्यापी आक्रोश के बीच जेएनयू के एक दलित छात्र ने कुलपति को दो पत्र लिखकर धमकी दी है कि अगर उसके शोध मानदेय को अगले साल तक नहीं बढ़ाया गया तो वह जान दे देगा। जेएनयू ने इसकी पुष्टि की और कहा कि उसकी सीनियर रिसर्च फेलोशिप को बढ़ाना रोका गया है क्योंकि उसे वित्त अधिकारी से मंजूरी नहीं मिली है। दूसरी तरफ कुलपति एसके सोपोरी ने कहा कि मामले को जल्द हल कर लिया जाएगा। उन्होंने विश्वविद्यालय के मुख्य सुरक्षा अधिकारी से कहा है कि वे इस छात्र पर नजर रखें।

छात्र ने पत्र में आरोप लगाया कि विभाग ने उसके साथ भेदभाव किया है और विभाग उसकी पीएचडी रोकने का प्रयास कर रहा है। इस दलित शोधार्थी ने कहा है कि एक हफ्ते के भीतर उसकी फेलोशिप बहाल की जाए, नहीं तो खुदकुशी कर लेगा। एक अन्य पत्र में उसने कहा था कि वह कुछ दिनों के लिए विश्वविद्यालय से अनुपस्थित रहा क्योंकि उसके परिवार में मौत हो गई थी। अब वह फिर से अध्ययन कर रहा है इसलिए चाहता है कि फेलोशिप बनी रहे। अधिकारी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संगठन प्रभाग से जुड़े इस शोधार्थी को ब्रुसेल्स जाने के लिए 66,000 रुपए का अग्रिम भुगतान हो गया था। उन्होंने कहा कि इस छात्र को फेलोशिप को जारी रखने के लिए इस राशि को लौटाना था। लेकिन उसने नहीं लौटाए। शोधार्थी ने दिसंबर, 2013 से जुलाई, 2015 के बीच जेएनयू छात्र के रूप में अपना पंजीकरण खत्म करवा लिया था।

लाइव हिन्दुस्तान

दक्षिण के समाज में दलित

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बाहर से चेन्नई, हैदराबाद या बेंगलुरु जैसे महानगरों में कोई जातिवादी भेदभाव या अस्पृश्यता नहीं दिखती, लेकिन अगर आप इन शहरों से चंद किलोमीटर दूर जाएं, तो हालात वैसे ही नहीं मिलते। उदाहरण के लिए, चेन्नई से कोई 600 किलोमीटर दक्षिण तिरुनेवेली में स्कूली बच्चे अपनी जाति का बोध कराने वाले चिह्न अपने बाजुओं पर पहनते हैं। लाल, पीले, हरे या केसरिया रंग के इन पहचान चिह्नों को कोई भी उनकी बाहों पर, गले में या फिर माथे पर देख सकता है। ये रंग उनकी जातियों पर निर्भर होते हैं। जैसे, कलाई पर बंधी हरे रंग की पट्टी या फिर हरे-लाल रंग व काले-सफेद रंग की पट्टी दलित होने के संकेत देती है। अलग-अलग रंग या उनका मिश्र रूप दरअसल दलितों के भीतर के भिन्न समुदायों के सूचक हैं। शक्तिशाली सत्ताधारी पिछड़ी जाति थेवर के बच्चे लाल और पीले रंग की पट्टियां बांधते हैं। केसरिया रंग की पट्टियां यादव व दूसरी अति पिछड़ी जातियों के बच्चों के बाजुओं पर सजती हैं।

तमिलनाडु के कुछ दक्षिणी जिलों में दलित कुल जनसंख्या का 30 प्रतिशत से भी अधिक हैं। उनमें से कुछ तो जमीन मालिक भी हैं और वे अपनी पहचान गर्व के साथ बताते हैं। साल 2011 में परमकुडी शहर में थेवरों और दलितों के बीच भारी संघर्ष हुआ था। तब पुलिस फार्यंरग में पांच लोग मारे गए थे और वे सभी दलित थे। पूरे तमिलनाडु में दलित आबादी करीब 20 फीसदी है। यह आंकड़ा लगभग उत्तर प्रदेश जितना ही है, लेकिन अब तक उन्हें तमिलनाडु की सत्ता में उचित भागीदारी नहीं मिली है। सूबे में दलितों का एक बहुत छोटा-सा वर्ग अपनी प्रतिभा के बलबूते पहचान गढ़ना चाहता है और अपनी तरक्की की सीढ़ियां तय करने में जुटा है। लेकिन, दलितों की विशाल आबादी अब भी साफ-सफाई के काम करने को मजबूर है।

इन विरोधाभासों के बीच पूरे राज्य के स्कूल-कॉलेज परिसरों में जातिवादी हिंसा की घटनाएं घटती रही हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी ने तो इस तथ्य को सिर्फ उजागर किया है। दलित नेता रवि कुमार के मुताबिक, आरक्षण व इंजीनिर्यंरग कॉलेजों के प्रसार ने, जिनमें से ज्यादातर निजी क्षेत्र के ही हैं, दलित छात्रों के लिए अवसरों के दरवाजे खोले हैं। लेकिन अब भी विशुद्ध विज्ञान व कला विभागों में दलित छात्र-छात्राओं के लिए समस्याएं हैं, जिनमें ये पीएचडी करना चाहते हैं। कमजोर आर्थिक स्थिति और पूरी तरह स्कॉलरशिप व सरकारी अनुदानों पर निर्भरता उनकी राह की बाधाएं बनी हुई हैं। उन्हें पीएचडी के लिए सही गाइड नहीं मिलते। और जाति उजागर होने पर अक्सर उन्हें पूर्वाग्रहों व उत्पीड़न का शिकार बनना पड़ता है। इस दबाव और पूर्वाग्रहों को झेलने में असमर्थ दलित छात्र अपनी जान लेने जैसे कठोरतम कदम उठा लेते हैं। और इस तरह के कदम आईआईटी और एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ने वाले दलित छात्र भी उठाते रहे हैं।

तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य कर्नाटक में दलितों की आबादी कुल जनसंख्या का 23 फीसदी है, जबकि उनके मुकाबले प्रभावशाली पिछड़ी जातियां लिंगायत 17 प्रतिशत और वोक्कालिगा 15 प्रतिशत ही हैं। कर्नाटक में संख्याबल भले ही दलितों का अधिक हो, मगर सूबे की सियासत में लिंगायत व वोक्कालिगा जातियों का ही दबदबा रहा है। यह आम तौर पर देखा गया है कि वोक्कालिगा व लिंगायत अपनी जाति के मुख्यमंत्री उम्मीदवारों वाली पार्टियों को हो वोट डालते हैं। इसीलिए पार्टियां भी इन दोनों में से ही किसी एक के सदस्य को अपना मुख्यमंत्री प्रत्याशी चुनती रही हैं। इसी तरह, सीमांध्र में भी दलित समूहों को लगता है कि आंध्र और तेलंगाना में राज्य के बंटवारे से दो सवर्ण जातियों रेड्डी व कम्मा का सियासी दबदबा स्थापित हो जाएगा। सीमांध्र में अनुसूचित जातियों की आबादी ताजा जनगणना में 16 प्रतिशत से बढ़कर 18.5 फीसदी हो गई है। चूंकि इनमें काफी पढ़े-लिखे दलित नौजवान हैं, इसलिए दलित समुदायों को उम्मीद है कि यही शिक्षा उनकी तकदीर बदलेगी।
तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों की राजनीति में पिछड़ों की राजनीति का दबदबा रहा है। जब कभी चुनाव आता है, इनसे जुड़ी पार्टियां अपने राजनीतिक  समीकरणों को दुरुस्त करने की कोशिश में जुट जाती हैं। वे विजयी समीकरण बनाने के लिए विभिन्न दलित समूहों को अपने गठबंधन में शामिल करती हैं।

हालांकि, छोटी दलित पार्टियों का मानना है कि राष्ट्रीय दलों के साथ उनके हित ज्यादा सधते हैं। वे आरोप लगाती हैं कि क्षत्रपों और पिछड़ी जातियों के वर्चस्व वाली क्षेत्रीय पार्टियां व गठबंधन उनके हितों को निगल जाते हैं। तमिलनाडु में ये आरोप कुछ हद सही दिखते हैं। वैसे दलित पार्टियां कांग्रेस व भाजपा के समर्थन को लेकर भी बंटी हुई हैं। कर्नाटक के दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। यूपीए के शासनकाल में कांग्रेस ने एक दलित को गृह मंत्री बनाया था और इसके पूर्व इस समुदाय के एक व्यक्ति को उसने राष्ट्रपति के पद तक पहुंचाया है। इसलिए दलित मानते हैं कि बीते बरसों में कांग्रेस ने दलित नेतृत्व की सत्ता में भागीदारी तो कराई है, लेकिन इसके साथ ही उनका आरोप है कि पांच दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म न करा पाने की भी जिम्मेदार है।

यह कोई पहली बार नहीं है कि भेदभाव व उत्पीड़न के शिकार एक दलित छात्र ने आत्महत्या की है। खास यह है कि पहली बार सियासी पार्टियों और मीडिया ने इसका संज्ञान लिया है। इसकी दो वजहें हैं- एक, हैदराबाद यूनिवर्सिटी प्रशासन और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री का रोहित वेमुला मामले में गलत रवैया और दूसरी, विपक्ष द्वारा इस मसले को आक्रामक तरीके से उठाया जाना। मोदी सरकार के शासनकाल में दलित छात्रों व सरकारी अधिकारियों के बीच पहली बड़ी झड़प चेन्नई में हुई थी, जब पिछले साल के मध्य में आईआईटी मद्रास के छात्रों ने अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल की गतिविधियों को बंद किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया था। ‘अंबेडकर-पेरियार’ समूह के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत मिली थी कि यह संगठन आईआईटी मद्रास में प्रधानमंत्री मोदी व हिंदुओं के खिलाफ ‘नफरत’ फैलाने का काम कर रहा है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसकी जांच कराई थी और इसके बाद स्टडी सर्किल की गतिविधियां बंद कर दी गई थीं। और अब रोहित वेमुला के अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के बीच टकराव का मामला सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोहित वेमुला की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन हैदराबाद यूनिवर्सिटी प्रशासन व छात्रों के बीच का संघर्ष थमता नहीं दिख रहा। रोहित वेमुला की मौत से जुड़े पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ दलितों की दुर्दशा को उजागर किया है, बल्कि इसने हमारे  सामाजिक पूर्वाग्रहों और गहरे जातिवादी-धार्मिक दोषों को भी जगजाहिर किया है।

एन डी टीवी

ओडिशा में किसान दे रहे जान, सरकार मानने को तैयार नहीं

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बरगड़ (ओडिशा): ओडिशा के बरगड़ ज़िले के बिरही पाली गांव में रहने वाले अजीत बरिहा ने चार महीने पहले अपने पिता से 12वीं की परीक्षा में शामिल होने के लिए कुछ रुपयों की मांग की। लेकिन तब उन्नीस साल के अजीत को पता नहीं था कि ये मांग उसके पिता तरिणी बरिहा के लिए जानलेवा साबित होगी।

‘मुझे अब सोचकर काफी बुरा लगता है। मैंने पढ़ाई के लिए पैसे मांगे… नहीं थे उनके पास… मैंने ज़िद की… उन्होंने कहा कि पूरी फसल बर्बाद हो गई… कैसे पैसे दूंगा तुझे। वो तनाव में थे फिर उन्होंने दवाई (कीटनाशक) पीकर जान दे दी।’

तरिणी ने पिछले साल नवंबर में खुदकुशी की। वो एक आदिवासी था। भूमिहीन खेतीहर मज़दूर। प्रताप किशोर नाम के किसान ने उसे दो हेक्टेयर ज़मीन खेती के लिए दी थी। प्रताप किशोर का कहना है कि यहां किसानों के हाल बड़े खराब हैं। उनकी फसल बर्बाद हो रही है और वो अपनी जान दे रहे हैं।

तरिणी के परिवार को अब तक केवल दस हज़ार रुपये की मदद मिली है, वो भी रेडक्रॉस की ओर से। सरकार ने तो सिर्फ दो हज़ार रुपये दिए वो भी तरिणी के अंतिम संस्कार के लिए।

विडम्बना है कि बरगढ़ ज़िले से हर साल सरकार ही करीब दस लाख टन धान खरीदती है और ये पूरे ओडिशा की धान खरीद का एक चौथाई है। लेकिन आज का कड़वा सच यह भी है कि इस जिले में पिछले एक साल में 26 किसानों ने खुदकुशी की है।

स्थानीय कांग्रेस नेता सत्य नारायण देवता कहते हैं, ‘ये लोग साहूकारों से कर्ज लेते हैं। इन्हें लगता है कि ये कर्ज़ फसल होने पर चुकाना है और जब फसल डूब जाती है तो ये लोग उस दबाव को झेल नहीं पाते।

तरिणी की तरह ही पिछले साल नवंबर महीने में कर्ज़ से दबे मकरध्वज वाक ने भी अपनी जान दे दी। वाक का घर बरगड़ के सोहैला ब्लॉक में है। वाक के पड़ोसी ने बताया, ‘उस दिन वह खेत में गए तो वापस नहीं आए। हम उन्हें ढूंढने गए तो खेत में बेहोश मिले। जब तक अस्पताल ले जाते उनकी जान जा चुकी थी। उन्होंने ज़हर पी लिया था।’

वाक के परिवार ने हमें अपनी बैंक पास बुक दिखाई, जिसमें उनके पास केवल 500 रुपये थे। उनकी बेटी पिंकी और पत्नी मिथिला नहीं जानते कि आगे उनका क्या होगा? ओडिशा में किसानों की आत्महत्या कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल बिगड़ते चले गए हैं। पिछले एक साल में ओडिशा में करीब डेढ़ सौ किसानों ने जान दी है। लेकिन नवीन पटनायक सरकार कहती है कि बरगड़ या पूरे राज्य में जिस किसान ने भी खुदकुशी की, उसका कर्ज या फसल बर्बादी से कुछ लेना देना नहीं है।

बरगड़ के ज़िलाधिकारी अंजन कुमार मानिक का कहना है, ‘हमने मीडिया में आई खुदकुशी की हर खबर की जांच कराई है। इनकी वजहें फसल बर्बाद होना या कर्ज़ नहीं है। किसी भी बैंक या कर्ज़ देने वाली संस्था ने किसानों पर कोई दबाव भी नहीं डाला है। ओडिशा में बाढ़, तूफान और सूखे की मार पड़ती रही है। इसलिए हमें पता है कि लोग इन समस्याओं से लड़ना और इनका सामाना करना सीख गए हैं। ये पहली बार नहीं है कि यहां सूखा पड़ा है।’

जब एनडीटीवी ने प्रशासन के इस बयान के बारे में यहां लोगों को बताया तो पता चला कि गांव के लोगों को ये सब सुनने की आदत पड़ गई है। उन्हें ऐसे सरकारी बयानों से हैरानी नहीं होती।

बरगड़ जिले के सौम्य रंजन कहते हैं, ‘अधिकारियों पर ऊपर से राजनीतिक दबाव रहता है। वो कभी स्वीकार नहीं करते कि लोग कर्ज़ की मार में दबकर अपनी जान दे रहे हैं। कभी उनकी जांच में कहा जाता है कि कि फलां किसान ने कीटनाशक को शराब समझकर पी लिया। कभी वह कहते हैं कि किसी किसान ने इसलिए जान दी क्योंकि पारिवारिक झगड़ा था या फिर घर में तनाव था, क्योंकि उसकी बेटी का किसी के साथ चक्कर था।’

भोजन के अधिकार के लिए लड़ रही ‘राइट टू फूड’ कैंप ने इस बारे में राज्य के 12 ज़िलों के तीस परिवारों की जांच की। संस्था से जुड़े प्रदीप प्रधान कहते हैं, ‘तीस में से पच्चीस परिवारों में मौत कर्ज और फसल बर्बादी से हुई है। हमारी जांच बताती है कि सरकारी अधिकारी फर्जी जांच रिपोर्ट देते हैं। हमने इस बारे में मानवाधिकार आयोग में भी रिपोर्ट की है।’

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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