दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 24.01.16

 

बिजली कनेक्‍शन मांगने पर दलित की पिटाई, यूरिन पीने पर किया मजबूर – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/UP-LUCK-dalit-assaulted-over-installation-of-electric-line-5231272-PHO.html

“मोदी वापस जाओ’ का नारा लगाने वाले 3 छात्रों को होस्टल से निकाला – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-MAT-latest-dag-news-030009-3479500-NOR.html

दलित महिला को गालियां दीं, किशोरी की मारपीट, केस दर्ज – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/MP-OTH-MAT-latest-kailaras-news-033114-3481810-NOR.html

दलित बुजुर्ग को धमकाया, फाइनेंसर पर केस दर्ज – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/ludhiana/ludhiana-crime-news/dalit-old-man-scold-financer-case-hindi-news/

फिर दिखा दलितों का असहाय चेहरा – बी बी सी हिंदी

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160123_dalit_population_india_pm

 

दैनिक भास्कर

बिजली कनेक्‍शन मांगने पर दलित की पिटाई, यूरिन पीने पर किया मजबूर

http://www.bhaskar.com/news/UP-LUCK-dalit-assaulted-over-installation-of-electric-line-5231272-PHO.html

बरेली. कुंवरपुर बंजरिया गांव में एक दलित जाति के युवक को यूरिन पिलाने की कोशिश की गई। इसके बाद से इलाके में तनाव का माहौल है। पूरी घटना युवक के घर के सामने बिजली के पोल लगाने को लेकर हुई है। अब दलित कम्‍युनिटी के लोगों का कहना है कि अगर मामले में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, तो वे इसके विरोध में सड़क पर उतरेंगे।

प्रतीकात्‍मक फोटो।

– पीड़ित जालिम सागर ने बताया कि शुक्रवार को पॉवर डिपार्टमेंट के लोग उसके घर के सामने बिजली का पोल लगा रहे थे।

– इस बीच मौके पर राठौर कम्‍युनिटी के लोग पहुंचे।

– उन्‍होंने आपत्ति जताते हुए कहा कि एक दलित को इस तरह की सुविधा नहीं मिलनी चाहिए।

फिर क्‍या हुआ?

– जब जालिम ने इसका कारण पूछा तो आरोपियों ने जातिवादी टिप्पणियां करते हुए उसकी पिटाई कर दी।

– उन्‍होंने उसे जमीन पर गिरा दिया और उनकी यूरि‍न पीने को मजबूर कर दिया।

– इतने में अन्‍य गांववालों ने मौके पर पहुंचकर जालिम को बचाया।

– इसके बाद पीड़‍ित ने मामले में हाफिजगंज पुलिस स्‍टेशन पर एफआईआर दर्ज कराई है।

किसी की नहीं हुई गिरफ्तारी

– मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवाबगंज के सर्किल ऑफिसर नरेश कुमार ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है।
– पीड़ित की शिकायत के आधार पर मामले की सच्‍चाई का पता लगाया जा रहा है।

– फिलहाल किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

सड़कों पर होगा प्रोटेस्‍ट

– मामले की निंदा करते हुए बीएसपी के जोनल को-ऑडिनेटर ब्रह्मस्‍वरुप सागर ने कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

– उन्‍होंने कहा है कि यह एक गंभीर मसला है। पार्टी वकर्स को मौके पर भेजा है।

– अगर पुलिस आरोपियों को बचाने का प्रयास करेगी तो हम सड़कों पर उतरकर प्रोटेस्‍ट करेंगे।

दैनिक भास्कर

“मोदी वापस जाओ’ का नारा लगाने वाले 3 छात्रों को होस्टल से निकाला

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बीबीएयू के कन्वोकेशन में मोदी वापस जाओ का नारा लगाने वाले तीन दलित छात्रों को यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शुक्रवार देर रात निकाल दिया। तीनों की डिग्रियां भी रोक दी गई हैं। मोदी के खिलाफ नारे लगाने पर इन तीनों को रिहाई मंच ने शनिवार को सम्मानित किया है। मोदी का विरोध करने वाले ये छात्र दलित समुदाय के सामान्य आर्थिक वर्ग से हैं।

घटना के बाद बीबीएयू के वीसी आरसी सोबती ने कहा था, जिन लड़कों ने पीएम के खिलाफ नारे लगाए, वे दागी प्रकृति के हैं। उनके खिलाफ पहले से केस दर्ज हैं। ये छात्र यूनिवर्सिटी में दलित मूवमेंट चला रहे थे। उन्हें कन्वोकेशन के लिए नोड्यूस पर बुलाया गया था।

कार्यक्रम में मोदी वापस जाओ, मोदी मुर्दाबाद, इंकलाब जिंदाबाद, फुले अंबेडकर जिंदाबाद के नारे लगाने वाले इन दलित युवकों को अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है। उल्टे उन्हें गर्व हो रहा है। एलएलएम स्नातक अमरेंद्र कुमार आर्य (24) का कहना है हमें ऐसा लग रहा है मानो हम बेहद जिम्मेदार नागरिक हैं। ऐसे नागरिक जिनके पास अपना विरोध प्रकट करने का अधिकार है। मौका मिला तो हम फिर से ऐसा ही करेंगे। वहीं, निर्मल ने कहा कि मैंने अपना विरोध जताया था, जिसका मुझे हक है।

दैनिक भास्कर

दलित महिला को गालियां दीं, किशोरी की मारपीट, केस दर्ज

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बागचीनी थाना क्षेत्र स्थित चैना गांव निवासी गिरिजा जाटव (30) को पड़ोस रहने वाले मुकेश यादव ने बीती शाम रंजिशन गालियां देते हुए जान से मारने की धमकी दी है। पुलिस ने गिरिजा की रिपोर्ट पर मुकेश के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर लिया है। इसी प्रकार चिन्नोनी थाना क्षेत्रांतर्गत झुंडपुरा गांव में बंटी एवं उसकी प|ी ने मोहल्ले में रहने वाली रामहेत की 13 वर्षीय पुत्री रामा की मारपीट कर दी। बताया गया कि दोनों के बीच पारिवारिक विवाद चल रहा था। रामा के बयान के आधार पर चिन्नोनी पुलिस ने बंटी उसकी प|ी पूजा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 506बी, 294 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

अमर उजाला

दलित बुजुर्ग को धमकाया, फाइनेंसर पर केस दर्ज

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थाना सरहिंद पुलिस ने एक फाइनेंसर पर एक दलित बुजुर्ग को धमकाने और उसे खुदकुशी के लिए मजबूर करने का मामला दर्ज किया है। जानकारी के अनुसार पिछले दिनों सरहिंद के वार्ड नंबर आठ निवासी शेर सिंह ने फाइनेंसर करमजीत सिंह निवासी हमायूंपुर सरहिंद की धक्केशाही से तंग आकर जहर निगलकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी। उसे सिविल अस्पताल में भर्ती करवाना गया। फिलहाल वह स्वस्थ है।

शेर सिंह की पत्नी ने बताया कि उसके पति ने 2008 में फाइनेंसर करमजीत सिंह के पास अपना मकान गिरवी रखकर तीन लाख रुपये बेटी की शादी के लिए कर्ज लिया था। इसमें से दो लाख रुपये उन्होंने 4 माह में ही लौटा दिए थे, लेकिन फाइनेंसर ने यह कह कर उनको रसीद नहीं दी थी कि अभी उनके पास लॉकर की चाबी नहीं है। फाइनेंसर के पास मकान का बयाना लिखा होने के कारण उसने कोर्ट में शेर सिंह के खिलाफ केस दायर कर दिया।

उन्होंने लोगों की मदद से फाइनेंसर को ऐसा ना करने और बाकी पेमेंट भी ब्याज समेत चुकता करने का वादा किया।

इसी दौरान फाइनेंसर उनकी पहले दी हुई दो लाख रुपये की पेमेंट से मुकर गया। शेर सिंह द्वारा पहले दिए दो लाख रुपयों की रसीद न होने के चलते कोर्ट ने उनकी जमीन की रजिस्टरी करवाने का फैसला सुना दिया। इसकी रजिस्टरी वीरवार को होनी थी। 19 जनवरी को उसके पति दोबारा पैसे देने के लिए फाइनेंसर के पास गए, लेकिन उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया और 24 लाख रुपये की मांग कर डाली। परेशान होकर शेर सिंह ने जहर निगल लिया। थाना सरहिंद के एसएचओ गुरवंत सिंह ने बताया कि इस मामले की जांच सहायक थानेदार करतार सिंह कर रहे हैं और पुलिस ने फाइनेंसर करमजीत सिंह पर एससी एक्ट, धारा 323 और 506 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

बी बी सी हिंदी

फिर दिखा दलितों का असहाय चेहरा

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160123_dalit_population_india_pm

भारत की साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़, अनुसूचित जाति, जनजाति की तादाद कुल आबादी की लगभग 25 फ़ीसदी है.

इनमें से 16.60 प्रतिशत दलित और 8.60 प्रतिशत आदिवासी हैं. इन समुदायों को दूसरे नामों से भी पुकारा जाता है.

भारत की एक चौथाई आबादी का मतलब है लगभग 30 करोड़ लोग. यदि वे अपने आप में एक देश होते तो वह देश आबादी के लिहाज से चीन, भारत और अमरीका के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश होता.

लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था में उनकी मौजूदगी नहीं के बराबर है.

इसकी मुख्य वजहें अच्छी शिक्षा तक उनकी पहुंच का नहीं होना और उन्हें रोज़गार के मौके नहीं मिलना है. ऐसा लंबे समय से होता आया है.

इसे दुरुस्त करने के लिए संविधान में व्यवस्था की गई. शैक्षणिक संस्थानों में दाख़िले और सरकारी नौकरियों में उनके लिए आरक्षण का इंतज़ाम किया गया.

शहरों में रहने वाले मध्य वर्ग यानी ऊंची जाति के लोगों को लगता है कि आरक्षण से उनके ख़िलाफ़ भेदभाव किया जाता है. उनका मानना है कि उनकी ‘योग्यता’ की बलि नहीं चढ़ाई जानी चाहिए.

मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी शहर के किसी भी बड़े दफ़्तर में दलितों की जगह ग्रेड वन कर्मचारियों की ही है. इनमें वे भी शामिल हैं जो साफ़ सफ़ाई करते हैं.

इन संस्थानों को इस हक़ीक़त पर कोई शर्म भी नहीं है. इन बातों पर तो कोई सोचता तक नहीं है.

भारत की अर्थव्यवस्था और मीडिया में दलित और आदिवासी पूरी तरह हाशिए पर हैं.

मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि हैदराबाद में एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली है.

केंद्र सरकार के कथित दबाव के बाद पीएचडी छात्र रोहित वेमुला और दूसरे चार छात्रों को हॉस्टल से निकाल दिया गया.

इसके पहले वे लोग ‘मौत की सज़ा’ पर भारतीय जनता पार्टी की छात्र इकाई से भिड़ चुके थे.

इसका नतीजा यह हुआ कि एक केंद्रीय मंत्री ने शिक्षा मंत्री को चिट्ठी लिखकर इन छात्रों को राष्ट्र विरोधी और जातिवादी क़रार दिया. दलितों पर जातिवादी होने का आरोप लगाना अजीब है.

शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने विश्वविद्यालय को चार ख़त लिख कर इन छात्रों पर कार्रवाई करने को कहा. हैरत होगी यदि शिक्षा मंत्री अपने दूसरे कामकाज में भी ऐसी ही तत्परता दिखाती हों.

इस दबाव के बाद छात्रों का हॉस्टल में रहने का हक़ और अनुदान ख़त्म कर दिया गया.

आत्महत्या के पहले रोहित के लिखे नोट से गौरव झलकता है.

जिस तरह सुकरात ने मरने से पहले कहा था कि देवता एसक्लीपायस के साथ उनका हिसाब चुका दिया जाए, रोहित ने दोस्तों से अपने 40,000 रुपए के कर्ज़ को चुका देने का आग्रह किया.

उन्होंने यह भी कहा कि उनके इस कृत्य के लिए उनके दुश्मनों पर दोष न मढ़ा जाए.

लेकिन यह तो साफ़ है कि उन्होंने ख़ुदकुशी क्यों की थी.

अपमानित होने, असहायता महसूस करने और पैसे देने से इंकार किए जाने की वजहों से ही उन्हें आत्महत्या करनी पड़ी.

स्थिति इतनी साफ़ होने की वजह से ही यह ख़बर राष्ट्रीय बन गई. इसने एक और अनचाहा काम कर दिया.

अब तक बीफ़ और मौत की सज़ा पर तमाम बहसें निहायत ही सामान्य ढर्रे पर चल रही थीं.

ऐसा कर दिया गया था मानो यह विवाद हिंदू बहुसंख्यक और उदार मुसलमानों के बीच का हो.

हैदराबाद की इस घटना ने साफ़ कर दिया कि इन दोनों ही मुद्दों पर सभी हिंदू एकमत नहीं है, उनके विचार एक जैसे नहीं है.

यह निश्चित तौर पर ऊंची जातियों के कई सदस्यों का मत है, जिसे बाकी सभी लोगों पर ज़बरन थोपा जा रहा है.

ऊंची जातियों के हिंदुओं की तरह दलितों और आदिवासियों में बीफ़ खाना एकदम निषिद्ध नहीं है.

जहां तक मौत की सज़ा की बात है, लोकतांत्रिक समाज के बहुसंख्यक लोग इसके ख़िलाफ़ हैं. सिर्फ़ कुछ देशों में ही न्याय करने के लिए अपने ही नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं.

मुझे लगता है कि रोहित के ‘बलिदान’ का एक तीसरा नतीजा भी है.

वह यह है कि अब कॉर्पोरेट जगत और निजी क्षेत्र के लोग अपने ‘दफ़्तरों में चल रहे रंगभेद’ की ओर ध्यान दें.

जिन नौकरियों को बड़ी आसानी से ऊंची जातियों के लिए मान कर चला जाता है, वो दरअसल दूसरों को नहीं देने की वजह से ही इन्हें मिलती हैं.

यह कहना सरासर झूठ होगा कि भारत में शिक्षा और रोज़गार के मौके सबको बराबर मिलते हैं.

स्वेच्छा से सकरात्मक पहल (अफ़र्मेटिव एक्शन) करते हुए दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नौकरी में रखने से दफ़्तरों में ही विविधता आएगी.

कॉर्पोरेट जगत के मध्य वर्ग को एक बात बिल्कुल साफ़ कर दी जानी चाहिए.

यदि दुनिया के चौथे सबसे बड़े देश जितनी आबादी को जान-बूझकर पीछे रखा गया तो भारत सही अर्थों में विकास कर ही नहीं सकता.

उनके ऊपर उठने पर ही भारत अपने आप को ग़रीबी और बदहाली से निकाल पाएगा.

और अनेक भारतीय, चाहे उनकी विचारधारा और सोच कुछ भी क्यों न हो, यह चाहते हैं.

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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