दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 06.12.15

 

वोट नहीं देने पर दबंगों ने दलित परिवार को पीटा, महिला को भी नहीं बख्शा – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/UP-attack-on-dalit-family-for-not-giving-vote-5187045-PHO.html

दलितों को तोहफा अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी बंद करने का फैसला ! – प्रेस नोट

http://www.pressnote.in/national-news_295898.html

दलित वर्ग के साथ अभद्र व्यवहार पर दिया ज्ञापन – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/MP-OTH-MAT-latest-nasrullaganj-news-032540-3149577-NOR.html

सामूहिक भोज से दलित छात्रों को हटाने पर कार्रवाई शुरू – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/HIM-SHI-OMC-MAT-latest-shimla-news-020502-3153590-NOR.html

दलित साहित्य का स्वरूप – जनसत्ता

http://www.jansatta.com/sunday-column/broken-man-dr-bhimrao-ambedkar-dalit-dalit-india-litrature/53043/

Please Watch:

Dr B R Ambedkar’s MahaPariNirvan Day 6th Dec 2013

https://www.youtube.com/watch?v=XbyZhCD8D9Q

An Urgent Appeal:

Please register your contribution to PMARC for

Strengthening Democracy, Peace & Social Justice!

Only our collective effort can make it possible to carry forward our interventions.

 It is a challenge before each one of us as equal stakeholder of PMARC.

दैनिक भास्कर

वोट नहीं देने पर दबंगों ने दलित परिवार को पीटा, महिला को भी नहीं बख्शा

http://www.bhaskar.com/news/UP-attack-on-dalit-family-for-not-giving-vote-5187045-PHO.html

झांसी. क्षेत्र पंचायत चुनाव हारने पर एक दबंग ने वोट नहीं देने वाले दलित परिवार पर हमला बोल दिया। शुक्रवार रात महिला सहित तीन लोगों को बुरी तरह पीटकर घायल कर दिया। घायलों को डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।

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 क्या है मामला?

ललितपुर में दलितों पर अत्याचार की लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं। जाखलौन के गांव बम्हौरी कला में दबंग प्रत्याशी क्षेत्र पंचायत चुनाव में हार गया। उसे शक था कि टुंडे अहिरवार परिवार ने उसे वोट नहीं दिया। इसी रंजिश में उसने देर रात अपने साथियों के साथ दलित परिवार पर हमला बोल दिया। लाठी डंडों से टुंडे अहिरवार और उसे घर के अन्य सदस्यों को पीट डाला। दंबंगों के जाने के बाद लोगों ने घायलों को हॉस्पिटल में भर्ती कराया। जाखलौन पुलिस भी मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने बताया कि दलित परिवार के कुछ लोगों को चोटें आई हैं। इलाज कराया जा रहा है। जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी।

 ललितपुर में आए कई मामले

बुंदलेखंड में हुए पंचायत चुनाव में दलितों के साथ अत्याचार के कई मामले सामने आ चुके हैं। इनमें ललितपुर सबसे आगे है। एक दिन पहले ही यहां एक दलित का घर जला दिया गया था। झांसी में भी कई मामले सामने आ चुके हैं। गांव बरल में दलित के घर बम फेंकने जैसा मामला सामने आ चुका है। इसके साथ ही महोबा, जालौन में भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

प्रेस नोट

दलितों को तोहफा अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी बंद करने का फैसला !

http://www.pressnote.in/national-news_295898.html

राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्रसिंह राठौड़ ने विगत दिनों हुई मंत्रीमंडल की बैठक के बाद खबरनवीसों को बताया था कि राज्य सरकार ने डॉ भीमराव अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी को बंद करके इसके स्थान पर जयपुर में ‘अम्बेडकर पीठ – सेंटर फॉर एक्सीलेंस’ का गठन करने का निर्णय लिया है .राठौड़ ने इस फैसले का औचित्य बताते हुए कहा कि वर्ष 2012 -13 में अशोक गहलोत के शासन काल में अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी स्थापित की थी, मगर पूर्ववर्ती सरकार ने किसी भी प्रकार की वित्तीय व्यवस्था नहीं की ,ना शैक्षणिक अनुभाग खोले ,ना फैकल्टी नियुक्त की ,ना भूमि आवंटित की गई और ना ही प्रवेश सम्बन्धी कार्यवाही की गयी . सिर्फ कागजों में ही विश्वविध्यालय खोल दिया गया और कुलपति की भी नियुक्ति कर दी गई .इसलिये इस कागजी विश्वविध्यालय को बंद करके अम्बेडकर पीठ स्थापित करने का राज्य मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है .

राज्य सरकार के इस फैसले पर प्रतिक्रिया करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा है कि राज्य सरकार गलतबयानी करके लोगों को गुमराह कर रही है .उनकी सरकार ने डॉ अम्बेडकर के नाम पर यह विश्वविध्यालय स्थापित किया था और जरुरी संसाधन भी उपलब्ध करवाए थे .अगर कहीं कोई कमी भी रह गई थी तो इस सरकार को भी दो साल का वक़्त मिला,जिसमे वित्तीय,शैक्षणिक ,फैकल्टी लगाने जैसी निरंतर प्रक्रियाओं की पालना करवाई जा सकती थी और यूनिवर्सिटी को मज़बूत बनाया जा सकता था ,मगर यह सरकार चाहती ही नहीं है कि संविधान निर्माता अम्बेडकर के नाम पर कोई विश्वविध्यालय काम करे ,इसलिये डॉ अम्बेडकर युनिवर्सिटी को बंद कर उसकी जगह एक सेंटर खोला जा रहा है .

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य सरकार के फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की तथा कहा कि एक ओर तो सरकार अम्बेडकर के नाम पर शुभकामनायें दे रही है ,दूसरी ओर उनके नाम को ही मिटाने की कोशिस कर रही है ,इससे सरकार का दलित विरोधी रवैया सामने आ गया है .

गहलोत के बोलने के बाद राज्य के दलित संगठनों की भी नींद खुली तथा देर से ही सही मगर राज्य भर में राजस्थान सरकार के इस निर्णय की चौतरफा आलोचना शुरू हो गयी .हालाँकि आश्चर्यजनक रूप से अभी भी दलित बहुजनों की राजनीती करने वाले दल एवं संगठन अभी भी मौन है .बसपा हो अथवा भाजपा का अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ ,दोनों ही समान रूप से चुप है .ख़ामोशी तो कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग ने भी अख्तियार की हुयी है ,उसकी ओर से कोई बयान तक इस विषय पर नहीं आना जनचर्चा का विषय है .

हालाँकि कुछ दलित और मानव अधिकार संगठनों ने इस मुद्दे पर सरकार की मंशा पर सवाल उठाये है ,मगर देखा जाये तो अम्बेडकर यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए सबसे दमदार आवाज़ पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य के जनप्रिय नेता अशोक गहलोत की रही ,उन्होंने ही सबसे पहले वसुंधरा सरकार के अम्बेडकर यूनिवर्सिटी बंद करने के निर्णय पर तुरंत प्रतिक्रिया दी तथा कहा कि वसुंधरा सरकार अम्बेडकर के नाम पर खडी की गयी विरासत के साथ खिलवाड़ कर रही है.

राजस्थान सरकार के डॉ भीमराव अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी बंद करने के फैसले को अदूरदर्शी और तानाशाहीपूर्ण बताते हुये कई दलित संगठनों ने सरकार को चेताया है कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करे और अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी को बंद नहीं करें वर्ना राज्य व्यापी आन्दोलन चलाया जायेगा .इसकी प्रथम कड़ी में विभिन्न जिलों में इसे लेकर ज्ञापन भी दिये गये है .यह भी योजना बनाई गयी है कि 6 दिसम्बर को अम्बेडकर के 59वें महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर राज्य भर में होने वाले समारोहों में राज्य शासन के इस अम्बेडकर विरोधी निर्णय का विरोध किया जायेगा .

अब देखना यह है कि अम्बेडकर के नाम पर बड़ी बड़ी बातें कर रही भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार अपना फैसला बदलती है या अपनी आदत के मुताबिक वह यह फैसला भी अपरिवर्तनीय ही बनाये रखेगी ,भले ही उस पर दलित विरोधी होने का कितना ही आरोप क्यों ना लगा दिया जाये .

दैनिक भास्कर

दलित वर्ग के साथ अभद्र व्यवहार पर दिया ज्ञापन

http://www.bhaskar.com/news/MP-OTH-MAT-latest-nasrullaganj-news-032540-3149577-NOR.html

नसरुल्लागंज | अलीराजपुर के राज्य प्रशासनिक अधिकारियों ने दलित वर्ग के कर्मचारियों के साथ किए गए अभद्र व्यवहार पर शुक्रवार को अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ ने एक ज्ञापन महामहिम राज्यपाल के नाम एसडीएम एचएस चौधरी को दिया। ज्ञापन में बताया गया कि अलीराजपुर के राज्य प्रशासनिक अधिकारी टीएन सिंह व शैलेंद्र सिंह ने कलेक्टोरेट में पदस्थ केरू किराड़ नेटवर्क इंजीनियर के साथ अभद्र व्यवहार कर मारपीट की। ज्ञापन सौंपने वालों में संघ के अध्यक्ष कमल कीर, रामद्वार कीर, महेंद्र रजक, जगदीश वर्मा, जसवंत सिंह, दलित चेतना मंच के प्रदेश सचिव रेवाराम, ओमप्रकाश कटारे सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। 

 दैनिक भास्कर

सामूहिक भोज से दलित छात्रों को हटाने पर कार्रवाई शुरू

http://www.bhaskar.com/news/HIM-SHI-OMC-MAT-latest-shimla-news-020502-3153590-NOR.html

कोटलाभोजनके दौरान दलित बच्चों को उठाने की खबर पढ़कर पुलिस ने गांव जाकर छानबीन की और ग्रामीणों के ब्यान कलमबद्ध किए हैं। पुलिस ने इस मसले को लेकर गांव के तीन लोगों के बयान दर्ज किए हैं जबकि जिन बच्चों को सामूहिक भोज करते समय उठाया गया था उन बच्चों के ब्यान नहीं लिए गए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि उन बच्चों से बयान लेने के लिए पुलिस ने फिर गांव आने की बात कही है। फिलहाल गांव के दलित समुदाय से ताल्लुख रखने वाले उत्तम चंद, धनी राम और शोभाराम के बयान पुलिस ने कलमबद्ध किए हैं। बताया जा रहा है कि इस मसले को लेकर जिला प्रशासन पुलिस से रिपोर्ट शिमला तलब की है। लिहाजा, अब गांव के उन लोगों पर कानून का शिकंजा कसता नजर रहा है। जिन्होंने दलित वर्ग के छात्रों को सामूहिक भोज करने से रोका था। 

बंजार थाना के प्रभारी की अध्यक्षता में कोटला पहुंची टीम ने इस मामले की तहकीकात शुरू कर दी है। उधर, पुलिस ने इस तहकीकात को गुप्त रखा है और इस मसले को लेकर कोई भी प्रशासनिक अधिकारी कुछ कहने को तैयार नहीं है। धनी राम की माने तो गांव के उन लोगों पर पुलिस का शिकंजा कसता देख अब वे लोग हम पर दवाब बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे हम पर समझौता करने का दवाब बनाने की कोशिश कर रहे है। 

टीम के साथ कोटला गांव गए बंजार थाना के प्रभारी जितेंद्र कुमार ने बताया कि गांव में पनपे जातीय विवाद की तफ्तीश करने के लिए वह अपनी टीम के साथ गांव गए थे और लोगों से पूछताछ की है, लेकिन उसमें कोई खास बड़ी बात सामने नहीं आई है। 

ये बयान दिया पुलिस को 

कोटलागांव के धनी राम ने बताया कि राज्यपाल के जाने के बाद जब सवर्ण और दलित वर्ग के बच्चे सामूहिक भोज के लिए एक साथ बैठे थे तो उस दौरान गांव के स्वर्ण जाति के कुछ लोगों ने हमारे 5-7 लड़कों को वहां से बाहर निकाल दिया। उसके बाद फिर से भोजन करने के लिए दो पांत बनाई गई। जिसमें दलित वर्ग के लोगों और बच्चों को अलग से बैठाया गया। उनका कहना है कि ऐसे में उन लोगाें पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने बच्चों को इस तरह जलील किया है।

जनसत्ता

दलित साहित्य का स्वरूप

http://www.jansatta.com/sunday-column/broken-man-dr-bhimrao-ambedkar-dalit-dalit-india-litrature/53043/

बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा प्रयुक्त ‘ब्रोकन मैन’ के पर्याय के तौर पर दलित शब्द प्रयुक्त होना शुरू हुआ। उनके परिनिर्वाण के दो वर्ष बाद 1958 में दलित के साथ साहित्य का सचेत प्रयोग किया गया। इस प्रकार ‘दलित साहित्य’ पदबंध अस्तित्व में आया। आंबेडकर ने सुप्त चेतना को झकझोर कर आत्मगौरव के बोध और स्वत्व के प्रकटीकरण की जो जमीन तैयार की थी उसने शीघ्र ही दलित साहित्य को आंदोलन का रूप दे दिया। जातिवादी समाज ने कभी सपने में भी न सोचा था कि यह समुदाय एक दिन इस तरह उठ खड़ा होगा और उसका अपना साहित्य रचा जाएगा। दलित साहित्य को ‘साहित्य’ के रूप में लंबे समय तक मान्यता न मिलने की मुख्य वजह यह सवर्ण सोच ही थी।

दलित रचनाकारों ने इस मान्यता की ज्यादा परवाह न करते हुए अपना काम किया। एक प्रांत विशेष में उभरे दलित साहित्य ने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी जगह बनाई। आज दलित साहित्य भारतीय साहित्य का मुख्य स्वर है। भारतीय साहित्य की समृद्धि में उसका योगदान ऐतिहासिक है ही, उसने भारतीयता की अवधारणा में भी बहुत कुछ जोड़ा है। सतत विकसनशील आंदोलन होने की वजह से अभी उसके योगदान का कामचलाऊ आकलन ही किया जा सकता है। वर्ष 1958 में महाराष्ट्र दलित साहित्य संघ ने प्रथम दलित साहित्य सम्मेलन किया था। इस सम्मेलन ने दलित साहित्य और दलित आंदोलन को जोड़ कर देखा और साहित्य सृजन की क्रांतिकारी भूमिका का रेखांकन किया। आंदोलनधर्मी साहित्य रचने के आह्वान के साथ सम्मेलन में कई प्रस्ताव पारित किए गए। प्रस्ताव संख्या पांच में कहा गया कि ‘मराठी में दलितों द्वारा और गैर-दलितों द्वारा दलितों पर लिखे गए साहित्य को दलित साहित्य नाम से स्वतंत्र मान्यता दी जाए और इसके सांस्कृतिक महत्त्व को समझते हुए विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संगठनों द्वारा इसे उचित स्थान दिया जाए।’ अब यह आंदोलन अपने छठे दशक में चल रहा है।

इतने लंबे समय तक भारत की किसी भी भाषा के आधुनिक काल में कोई साहित्य युग नहीं चला है। यह बात ध्यान देने की है कि अलग-अलग भाषाओं में थोड़ी भिन्नता के साथ लिखे जाने के बावजूद दलित साहित्य का स्वरूप प्रांतीय न होकर अखिल भारतीय रहा है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहा जाए कि दलित साहित्य जिस पदवी का अधिकारी है उसे स्वीकार करने में विद्वान, साहित्य-आलोचक और साहित्येतिहासकार सुचिंतित मौन साधे हुए हैं! भारतीय साहित्य के अधिकारी समीक्षक भी दलित साहित्य को परिशिष्ट से अधिक जगह देने को राजी नहीं! दलित साहित्य की चर्चा अक्सर आरोपों-प्रत्यारोपों में ही उलझा कर रखी जाती है। असल संदर्भों तक ध्यान जाने से रोकने का यह आजमाया हुआ नुस्खा है। जाति-संरचना को बनाए रखने वालों का हित भी इसी में है। दलित साहित्य के तीन अनिवार्य संदर्भ हैं- हिंसा, राजनीति और शक्ति (पॉवर)। हिंसा का एक सिरा धर्मशास्त्रों से जुड़ा है, तो दूसरा समकालीन शास्त्रेतर हिंसा से। स्मृतिग्रंथ दलितों पर हिंसा को धार्मिक वैधता देते हैं। कतिपय पौराणिक और पारंपरिक आख्यान इस हिंसा का व्यावहारिक नमूना पेश करते हैं। ये नमूने वर्ण-जाति आधारित हिंसा को स्वीकार्य बनाते और सामूहिक मानस में इसे ‘सहज गतिविधि’ के तौर पर स्थापित करते हैं।

आंबेडकर की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा धर्माधारित हिंसा को उद्घाटित और विश्लेषित करने में खर्च हुआ। दलित साहित्य में धर्मशास्त्रीय हिंसा पर प्रभूत सामग्री संचित है। सिर्फ शंबूक प्रसंग पर भारतीय भाषाओं में दलित रचनाकारों द्वारा लिखी कविताओं, कहानियों को इकट््ठा किया जाए, तो एक वृहद् ग्रंथ बन जाएगा! उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के समाजसुधारकों और फुले-आंबेडकर जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों के सतत प्रयासों ने उम्मीद बंधाई थी कि आजाद भारत में हिंसा के दुश्चक्र पर विराम लगेगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह उम्मीद धूल-धूसरित हुई। स्वाधीनता के सात दशक बीत रहे हैं और दलितों पर हिंसक हमलों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है। दलित साहित्यकार इस हिंसा से रूबरू हैं। हिंसा के संदर्भों से दलित साहित्य भरा हुआ है। इस परंपरा-पोषित हिंसा को मदांध गज से उपमित करते हुए पहली पीढ़ी के हिंदी दलित कवि मलखान सिंह लिखते हैं- ‘मदांध हाथी लदमद भाग रहा है/ हमारे बदन/ गांव की कंकरीली/ गलियों में घिसटते हुए/ लहूलुहान हो रहे हैं/ हम रो रहे हैं/ गिड़गिड़ा रहे हैं/ जिंदा रहने की भीख मांग रहे हैं/ गांव तमाशा देख रहा है/ और हाथी/ अपने खंभे जैसे पैरों से/ हमारी पसलियां कुचल रहा है/ मवेशियों को रौंद रहा है/ झोपड़ियां जला रहा है/ गर्भवती स्त्रियों की नाभि पर/ बंदूक दाग रहा है/ और हमारे दुधमुंहे बच्चों को/ लाल लपलपाती लपटों में/ उछाल रहा है।’ इस बीच हिंसा के नए रूपों का उभार हुआ है।

जो समुदाय बहुजन संकल्पना का हिस्सा माने जाते हैं वे भी दलितों पर नृशंस हमले कर रहे हैं। इन हमलों की धर्मशास्त्रीय व्याख्या मुश्किल है। ये नए हमलावर ब्राह्मण सर्वोच्चता को नहीं स्वीकार करते। वेद-स्मृति में कतई आस्था नहीं रखते। उदाहरण के लिए तमिलनाडु को देखा जा सकता है। जो जाति-समुदाय कभी पेरियार के ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के भागीदार थे और अब भी उस विचार के समर्थक हैं, वे दलितों पर हमले कर रहे हैं। नवंबर 2012 में धर्मपुरी जिले में उन्होंने एक साथ तीन दलित बस्तियों पर हमला करके मकान सहित सारी जमा-पूंजी तहस-नहस की। हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और ओड़ीशा आदि प्रांतों से दलितों पर इसी तरह की हिंसा की खबरें अक्सर मिलती रहती हैं। हिंसा का एक अन्य रूप उदारीकरण से प्रकट हुआ है। बहुराष्ट्रीय निगम दलितों के हाथों का हुनर छीन कर जीविका पर हमला कर रहे हैं। सार्वजनिक/ सरकारी उपक्रम निजीकरण के हवाले किए जा रहे हैं। इनमें दलितों का प्रवेश वर्जित है। होटल, मॉल और प्राइवेट फैक्टरियों के लिए दलित-आदिवासी बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है। राजनीति से दलित साहित्यकारों के रिश्ते अटपटे रहे हैं। दलित राजनीति से खासकर। उनका जुड़ाव सामाजिक आंदोलनों से रहा है। ये आंदोलन सशक्तीकरण के माध्यम बने। इन्होंने तमाम दलित जातियों को एकजुट होने का धरातल मुहैया कराया। तंत्र में तब्दीली की राह निकाली। ये सारे काम राजनीति को करने थे। यह तथ्य अक्सर ओझल रह जाता है कि दलित पैंथर का निर्माण दलित राजनीति से नवयुवकों के विद्रोह के फलस्वरूप हुआ। बाबासाहेब द्वारा परिकल्पित लेकिन उनकी मृत्यु के बाद बनी रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआइ) ने दलित समुदाय में आशा का संचार किया था। दुखद यह कि बहुत जल्दी ही पार्टी विभिन्न धड़ों में बंट गई।

वैयक्तिक सत्ता और निजी लाभ के लोभ में कई नेताओं ने समझौते किए। बेबी कांबले के शब्दों में दलित समुदाय की उम्मीदों के साथ गद्दारी की। इन्हें धिक्कारते हुए नई पीढ़ी के जुझारू और रचनाशील दलित युवाओं ने पैंथर बनाया। उत्तर भारत में बीएसपी का ऐसा ही हश्र हुआ। जिस वर्चस्ववादी ताकत से उन्हें टकराना था, पार्टी उन्हीं की हमजोली बन गई। मोहभंग के ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर सत्ता की राजनीति- ‘गुरुकिल्ली’ पर दलित चिंतक पुनर्विचार कर रहे हैं। शक्ति के केंद्रीकरण के दुष्परिणामों से वाकिफ दलित साहित्यकार सत्ता का विलय चाहते हैं। तमिल दलित लेखक राज गौतमन का मंतव्य है- ‘सत्ता से दमित रहे लोग आज सत्ता का स्वाद पाने की इच्छा रखते हैं। स्थिति भी अनुकूल दिखाई पड़ रही है। लेकिन, दलित मुक्ति मूलत: सत्ता को नष्ट करने में है। केवल वही राजनीति दलित राजनीति हो सकती है, जो सत्ता को नष्ट कर दे।’

बजरंग बिहारी तिवारी

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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