दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 29.11.15

प्यार की सजा! दलित युवक के चेहरे को बुरी तरह काटकर निर्मम हत्या – हरिभूमि

http://www.haribhoomi.com/news/rajasthan/jaipur/dalit-boy-killed-because-loves-upper-cast-girl/33962.html

एक समाज से चल रही थी रंजिश, इसलिए पुलिस सुरक्षा में घोड़ी चढ़ा दलित दूल्हा – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/c-10-2294897-jp0925-NOR.html

कुएं में गिरने से महिला की मौत – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/MP-CHHT-MAT-latest-chhatarpur-news-022506-3108195-NOR.html

प्रसव के दौरान प्रसूता की मौत – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/sheopur-heth-news-585906

गोदाम में रह रहे बच्चे, छात्रावास में नहीं मिले अधीक्षक – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/dindori-dindori-news-585845

दलित छात्रा के अपहरण में दो को उम्रकैद – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/jyotiba-phule-nagar/punishment-hindi-news-4/

नोट के बदले वोटके विरोध पर फायरिंग अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/jhansi/jhansi-crime-news/cash-for-vote-firing-on-protesting-hindi-news/

संविधान दिवस पर हुआ सम्मेलन – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/CHH-OTH-MAT-latest-dhamtari-news-021506-3108086-NOR.html

आदिवासी नेतृत्व का सवाल – जनसत्ता

http://www.jansatta.com/sunday-column/dalit-india-politics-casteism-indian-society-adim-samuday/51775/

Please Watch:

Salute the Constitution | संविधान का सम्मान

https://www.youtube.com/watch?v=XUhtkOuk2Ig

 An Urgent Appeal:

Please register your contribution to PMARC for

Strengthening Democracy, Peace & Social Justice!

Only our collective effort can make it possible to carry forward our interventions.

 It is a challenge before each one of us as equal stakeholder of PMARC.

 हरिभूमि

प्यार की सजा! दलित युवक के चेहरे को बुरी तरह काटकर निर्मम हत्या

http://www.haribhoomi.com/news/rajasthan/jaipur/dalit-boy-killed-because-loves-upper-cast-girl/33962.html

 जयपुर. पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर शहर के निवासी बसंती लाल वाल्मीकि के 20 वर्षीय बेटे अजय कुमार वाल्मीकि और उसके परिवार ने सोचा भी नहीं होगा कि उसे ऐसी तालिबानी सजा मिलेगी कि देखने वालों की भी रूह कांप जाएगी। अजय की 27 नवम्बर की रात धारदार हथियार से चेहरा काट कर अत्यंत निर्मम हत्या कर दी गयी। हत्या जिस निर्दयी तरीके से की गयी, शव को देख कर किसी का भी दिल दहल सकता है। 

जानकारी के मुताबिक अजय अपने घर से रात की 8 बजे अपनी बाइक लेकर निकला और रात भर वापस नहीं लौटा। चिंतित परिजनों ने उसकी रात भर खोजबीन की, मगर उसका पता नहीं चल पाया। सुबह करीब 8 बजे अजय कुमार का क्षत विक्षत शव हायरसेकण्ड्री स्कूल के ग्राउंड में पाया गया। अजय के पिता और भाई विशाल ने शव की पहचान अजय के रूप में की। लाश के पास ही अजय कि बाइक भी बरामद हुई। अजय के चेहरे को बुरी तरह से काट दिया गया, उसे चेहरा विहीन कर दिया गया ताकि उसकी पहचान तक नहीं हो पाये। इस अमानवीय हत्याकांड की खबर जैसे ही इलाके के दलित समुदाय को लगी। आक्रोशित लोग सड़कों पर उतर आये तथा बाड़मेर शहर में उपद्रव फैल गया। जिस पर काबू पाने के लिए पुलिस को दिन भर खासी मशक्कत करनी पड़ी। हालत इतने तनावपूर्ण रहे कि जिले के पुलिस कप्तान परीश देशमुख को दिन भर कोतवाली में डेरा डालना पड़ा और स्थितियों को खुद संभालना पड़ा।

जिले भर के दलित समुदाय के सक्रिय लोग जाति और राजनितिक पहचान से ऊपर उठ कर एकजुट हो गये और हत्यारों को पकडे जाने तक शव नहीं उठाने पर अड़ गए।  हालांकि देर शाम तक अजय के शव का पोस्टमार्टम तो करवा दिया गया मगर शव लेने से परिजनों के इंकार के बाद अजय वाल्मीकि की लाश को बाड़मेर के मुख्य चिकित्सालय की मोर्चरी में रखवा दिया गया।दलित अत्याचार निवारण समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधान उदा राम मेघवाल के मुताबिक मृतक अजय के परिजनों द्वारा दर्ज करवाई गयी प्राथमिकी में एक स्वर्ण युवक नरेश कुमार पर एक माह पहले अजय को जान से मार देने की धमकी देने का आरोप लगाया गया है। मेघवाल का मानना है कि जिस तरह से शव का चेहरा विकृत किया गया है, वह किसी गहरी घृणा का संकेत देता है। चेहरा पूरा काट करके कंकाल बना दिया गया, ताकि वह पहचाना भी नहीं जा सके।

पुलिस अधीक्षक देशमुख का कहना है कि पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है और कुछ लोगों को संदेह के आधार पर पूछताछ के लिए पकड़ा गया है। पुलिस का भरसक प्रयास है कि जल्द से जल्द इस नृशंस हत्या कांड का पर्दाफाश हो जाये, तब तक लोगों को संयम बरतना चाहिए ताकि पुलिस अपना काम कर सके। मकतूल दलित युवा अजय कुमार वाल्मीकि के परिजनों का कहना है कि यह हत्या एक ऑनर किलिंग है। यह एक स्वर्ण जाति की लड़की से जुड़ा हुआ मामला है। सूत्रों के मुताबिक अजय का एक स्वर्ण लड़की से प्रेम प्रसंग चल रहा था, जिसके लिए उसे परिणाम भुगतने की चेतावनी भी मिल चुकी थी। लोगों का यह भी मानना है कि यह एक सुपारी मर्डर भी हो सकता है, जिसमें किसी भी मार्शल कौम के अपराधी लोग निकल सकते है। पुलिस जाँच जारी है।

इस जघन्य हत्याकांड के विरुद्ध पश्चिमी राजस्थान के युवाओं में जबरदस्त रोष व्याप्त है और आक्रोश की यह आग राज्य भर में फैलने की आशंका जताई जा रही है, मृतक अजय के पिता बसंती लाल वाल्मीकि सफाई कर्मचारी है, इसलिये दलित संगठनों के साथ साथ वाल्मीकि समाज और सफाई कर्मचारी यूनियन्स के लोग राज्य भर में जगह जगह पर धरना –प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।

दैनिक भास्कर

एक समाज से चल रही थी रंजिश, इसलिए पुलिस सुरक्षा में घोड़ी चढ़ा दलित दूल्हा

http://www.bhaskar.com/news/c-10-2294897-jp0925-NOR.html

 जयपुर/ मेहंदीपुर बालाजी। आपसी रंजिश के चलते मेहंदीपुर बालाजी के पास स्थित मेहंदी गांव में शुक्रवार शाम एक दलित दूल्‍हे की बारात पुलिस सुरक्षा में निकली। दरअसल एक समाज के भय से बैरवा (दलित) समाज के दूल्हे को पुलिस प्रोटेक्शन के साथ बारात निकालनी पड़ी।

सालभर पुरानी रंजिश ने दलित दूल्हे को पुलिस की कड़ी सुरक्षा में बारात निकालने को मजबूर कर दिया। राजपूतों के घर के सामने से गुजरने वाले रास्ते से बैरवा समाज के लड़के की बारात जानी थी। इस समाज के साथ राजपूत समाज की पुरानी रंजिश थी। ऐसे में समाज के बंसीलाल ने टोडाभीम थाने में एक परिवाद दाखिल कर पुरानी रंजिश का हवाला देते हुए सुरक्षा की मांग की।

पुलिस सुरक्षा में घोड़ी पर चढ़ा दूल्हा

टोडा भीम थाने के 10 पुलिस कांस्टेबल एसएचओ राजेंद्र सिंह की मौजूदगी में बारात के आस-पास मुस्तैद दिखे। इस दौरान नायब तहसीलदार भी मौजूद थे। जिस रास्ते से बारात निकली उस रास्ते से दूल्हा घोड़ी पर बैठकर बाकायदा गाजे-बाजे के साथ नहीं निकल सकता था। ऐसे में उसने पुलिस प्रोटेक्शन में बारात निकालने की समझदारी दिखाई।

शव यात्रा को रोक दिया था राजपूतों ने :

सालभर पहले बरसात के सीजन में बैरवा समाज के खेमचंद की मौत हो गई। समाज के लोग श्मशान जाने के लिए राजपूत समाज के घरों के सामने से गुजर रहे रास्ते को सुविधाजनक मानते हुए उससे जाने लगे। इस पर राजपूत समाज के लोगों ने उनका घोर विरोध किया। इससे दलित समाज के लोग उस रास्ते पर जाने से कतराने लगे।

 इस क्षेत्र में ऐसी है दबंगई :

मेहंदीपुर गांव और उसके आस-पास आज भी दलित दूल्हा बड़े समुदाय के लोगों के घरों के सामने गुजरने वाली सड़क पर घोड़ी पर चढ़कर नहीं जाता है। उनके घरों के सामने आते ही बाजे बंद कर दिए जाते हैं और उनके सम्मान में दूल्हा घोड़ी से उतरकर जाता है।

दैनिक भास्कर

कुएं में गिरने से महिला की मौत

http://www.bhaskar.com/news/MP-CHHT-MAT-latest-chhatarpur-news-022506-3108195-NOR.html

छतरपुर | मातगवां थाना क्षेत्र के तहत आने वाले खैरों गांव में शनिवार सुबह एक 75 महिला की कुआं में गिरने से मौत हो गई। खैरों निवासी श्यमबाई पति दरुआ आदिवासी उम्र 75 वर्ष सुबह से शौंच के लिए घर से निकली थी। घर के पीछे खेत पर बने सरकारी कुआं में गिर गई। गिरने से महिला की मौत हो गई। मातगवां थाना की एएसअई सरोज गहलोत ने बताया कि मामला कायम कर लिया गया है। घर के पीछे खेत पर बिना जगत का कुआं होने के कारण महिला को दिखाई नहीं दिया, महिला गिर गई। गिरने से महिला को चोटें आईं है। चोट गंभीर होने के कारण महिला की मौत हो गई है। पुलिस ने मामले को जांच में ले लिया है। 

नई दुनिया

प्रसव के दौरान प्रसूता की मौत

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/sheopur-heth-news-585906

कराहल। शनिवार को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कराहल में एक प्रसूता की मौत अधिक रक्तस्त्राव से हो गई। परिजनों ने महिला की मौत अस्पताल स्टाफ की लापरवाही से होने का आरोप लगाया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्याणी (20) पत्नी प्रमोद आदिवासी निवासी शंकरपुर कराहल को शुक्रवार को रात 8 बजे के करीब प्रसव पीड़ा होने पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कराहल में भर्ती कराया गया। महिला को भर्ती कराने के एक घंटे बाद नर्सों द्वारा उसे दो टीके लगाना बताए गए। परिजनों ने बताया कि, इसके बाद नर्सों या डॉक्टरों ने प्रसूता को देखा तक नहीं जबकि, प्रसूता लगातार तेज दर्द की शिकायत कर रही थी। सुबह 5 बजे प्रसूता की तबियत और अधिक खराब हो गर्ई। परिजनों द्वारा बताने पर नर्सों ने पहुंचकर प्रसूता की डिलेवरी तो करा दी,लेकिन उसके रक्त प्रवाह को अस्पताल प्रबंधन नहीं रोक सका। आनन-फानन में प्रसूता को जिला अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। प्रसूता के ससुर रामकिशन ने आरोप लगाया कि, प्रसूता की मौत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कराहल में ही हो गई थी। उसे मरी हालत में रेफर किया गया था। हमें यह जानकारी न मिल जाए इसलिए, हमें वाहन में नहीं बैठने दिया और न ही प्रसूता को देखने दिया सिर्फ प्रसूता की सास उसके साथ गई थी। जिसे भी प्रसूता से दूर रखा गया। जिला अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया। प्रसूता की यह पहली डिलेवरी थी।प्रसव के बाद जन्में बच्चे की हालत ठीक है। उसे चिकित्सीय निरीक्षण में रखा गया है। संस्थागत प्रसव व सभी टीके लगने के बाद भी प्रसूता की मौत जिले में चल रहे मातृ मृत्युदर रोकने के अभियान की औपचारिकता बयान कर रहे हैं।

नई दुनिया

गोदाम में रह रहे बच्चे, छात्रावास में नहीं मिले अधीक्षक

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/dindori-dindori-news-585845

डिंडौरी। जनपद डिंडौरी के दूरस्थ ग्राम पाकर स्थित बालक छात्रावास में व्याप्त अव्यवस्थाएं कलेक्टर श्रीमती छवि भारद्वाज द्वारा किए गए निरीक्षण में सामने आईं। निरीक्षण के दौरान अधीक्षक शरद नामदेव व चौकीदार छात्रावास में मिले ही नहीं। छात्रावास परिसर में साफ-सफाई के अलावा रसोई कक्ष में भोजन व्यवस्था का उचित प्रबंध नहीं पाया गया। अधीक्षक द्वारा 20 बच्चों को तेंदूपत्ता गोदाम में रखे जाने की बात भी सामने आई। इस पर कलेक्टर ने नाराजगी जाहिर की। कलेक्टर ने अधीक्षक व चौकीदार की इस प्रकार की कार्यप्रणाली को गंभीरता से लेते हुए उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश संबंधति अधिकारियों को दिए।

28din05_28_11_2015

कभी-कभार आते हैं अधीक्षक

निरीक्षण में छात्रावास भवन का फर्श जर्जर पाया गया। छात्रावास अधीक्षक द्वारा फर्श की मरम्मत व छात्रावास में साफ-सफाई नहीं कराई जा रही है। रसोइये ने बताया कि छात्रावास अधीक्षक शरद नामदेव छात्रावास में नहीं रहते। अधीक्षक डिंडौरी में रहकर छात्रावास का संचालन करते हैं। छात्रावास की व्यवस्था के संबंध में सप्ताह या पंद्रह दिन में आकर भोजन इत्यादि की व्यवस्था करते हैं। रात में छात्रावास में बालकों की सुरक्षा के लिए कोई नहीं रहता है।

तेंदूपत्ता गोदाम में शिफ्ट किए 20 छात्र

रसोइये ने कलेक्टर को बताया कि छात्रावास में बालकों की दर्ज संख्या 50 है। अधीक्षक द्वारा छात्रावास के 20 बालकों को तेंदूपत्ता गोदाम में शिफ्ट कर दिया गया है जिससे बालकों की सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारी निश्चित नहीं है। भवन की दीवारें गंदी व जर्जर नजर आईं। पलंग में पुराने गद्दे जर्जर हालत में बिछे थे। बच्चों के पढ़ने और बिछाने के लिए पुराने चादर व कंबल रखे पाए गए। फर्श में गड्डे होने के साथ लगभग हर कोने में कूड़ा करकट जमा था।

दो साल से नहीं हुई सफाई छात्रावास भवन में साफ-सफाई व मरम्मत कार्य पिछले दो साल से नहीं कराया गया है। रसोइए ने बताया कि कलेक्टर ने रसोईये को छात्रावास की अव्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के साथ छात्रावास में हमेशा साफ-सफाई रखने को कहा।

व्यवस्थाएं दुरुस्त करने दिए निर्देश

कलेक्टर ने आदिवासी विकास विभाग को नियमित रूप से बालक छात्रावास पाकर का निरीक्षण कर समस्त व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश जारी किए हैं। रसोईये की मांग पर कलेक्टर ने बालक छात्रावास में पानी की उपलब्धता व फर्श की मरम्मत करने के निर्देश दिए। छात्रावास में रोजाना साफ-सफाई करने, बालकों के लिए नए गद्दे, चादर व कंबल वितरित करने के साथ कूड़ा-करकट हटाने को कहा।

छात्रावास में रहेंगे सभी बच्चे

कलेक्टर ने कहा कि सभी बालकों को छात्रावास भवन में शिफ्ट कर उनकी नियमित रूप से सुरक्षा के प्रबंध किए जाएं। छात्रावास भवन के दरवाजे व खिडकियों में पर्दे लगाने, बालकों को नियमित रूप से मेन्यू के आधार पर भोजन देने को कहा। इस अवसर पर जनपद पंचायत डिंडौरी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एसके गुप्ता, सहायक यंत्री आरजी श्रीवास्तव सहित अन्य अधिकारी व कर्मचारी मौजूद रहे।

अमर उजाला

दलित छात्रा के अपहरण में दो को उम्रकैद

http://www.amarujala.com/news/city/jyotiba-phule-nagar/punishment-hindi-news-4/

विशेष सत्र एवं अपर जिला जज बीडी भारती ने दलित छात्रा के अपहरण में दोषी पाने पर दो अभियुक्तों को उम्रकैद, जबकि एक को दस वर्ष की सजा सुनाई है।

सभी पर कुल मिलाकर एक लाख 61 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। दोषियों को पुलिस कस्टडी में जेल भेज दिया गया है।

गजरौला थाना क्षेत्र के गांव बलदाना असगरअली निवासी लल्तू जाटव पुत्र मोहर सिंह की बेटी शांति समीपवर्ती गांव जलालपुर कलां के कृष्णा इंटर कालेज की छात्रा थी। 

19 सितंबर 2012 को सुबह वह स्कूल के गेट पर ही पहुंची थी कि तभी एक गाड़ी वहां आकर रूकी और उसमें से उतरे तीन युवक छात्रा को जबरन गाड़ी में बैठाने लगे।

शोर मचाने पर स्कूल के स्टाफ ने छात्रा को बचाने का प्रयास किया, लेकिन युवक छात्रा का अपहरण कर फरार हो गए। पांच अक्तूबर को पुलिस ने छात्रा को हापुड़ के टोल टैक्स प्लाजा से बरामद किया था और डिडौली कोतवाली क्षेत्र के गांव तोहफापुर निवासी प्रदीप पुत्र शीशपाल, मदन पुत्र रामस्वरूप और चुड़ियाला भोजपुर गाजियाबाद के वीरेंद्र पुत्र जयचंद के खिलाफ अपहरण और एससीएसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। 

पुलिस ने अभियुक्तों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया, जो कुछ समय बाद जमानत पर रिहा होकर जेल से बाहर आ गए। शनिवार को विशेष सत्र एवं अपर जिला जज बीडी भारती ने मामले की सुनवाई की। 

अभियोजन और बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने जोरदार बहस की। बहस सुनने के बाद न्यायाधीश ने मदन और वीरेंद्र को उम्र कैद और 67-67 हजार रुपये जुर्माना जबकि प्रदीप को दस वर्ष की कैद और 27 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। दोषियों को पुलिस कस्टडी में जेल भेज दिया गया।

अमर उजाला

नोट के बदले वोटके विरोध पर फायरिंग

http://www.amarujala.com/news/city/jhansi/jhansi-crime-news/cash-for-vote-firing-on-protesting-hindi-news/

झांसी। रक्सा की हरिजन आदिवासी कालोनी में शुक्रवार की रात ‘नोट के बदले वोट’ मांगे गए। ना-नुकुर करने पर दबंगों ने परिणाम भुगतने की धमकी दी। दो ग्रामीणों की पिटाई कर दहशत फैलाने के लिए फायरिंग भी की।

रात करीब पौने दो बजे खोड़न के 10-12 दबंग दो व चार पहिया वाहनों से हरिजन आदिवासी कालोनी पहुंचे। क्षेत्र वासियों के अनुसार दबंगों ने घर में सो रहे लोगों को बाहर निकाला और एक प्रत्याशी का नाम लेते हुए वोट देने को कहा। इसके साथ ही इन लोगों को धन बांटना शुरू कर दिया।

जब कई लोगों ने नोट के बदले वोट देने की बात का विरोध किया तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। हीरा यादव व मुकेश सेन को पीटा गया। यह जानकारी दूसरे प्रत्याशी के समर्थकों को हुई तो वह विरोध करने कालोनी पहुंच गए। उन्होंने इस संबंध में पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी। इस बीच दोनों पक्षों में कहासुनी भी हुई।

चर्चा है कि खोड़न से आए लोगों ने दबदबा बनाने के लिए हवाई फायरिंग की। सूचना पर थाना पुलिस मौके पर पहुंची, मगर तब तक दबंग भाग निकले। वहीं थानाध्यक्ष ने फायरिंग की बात से इनकार किया है।

दैनिक भास्कर

संविधान दिवस पर हुआ सम्मेलन

http://www.bhaskar.com/news/CHH-OTH-MAT-latest-dhamtari-news-021506-3108086-NOR.html

धमतरी| दलित साहित्य अकादमी की राज्य ईकाई द्वारा 66वें संविधान दिवस के अवसर पर वृंदावन हाल रायपुर में सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आरपी संभाकर, विशिष्ट अतिथि डा जेआर सोनी, सुशीला वाल्मीकि, गंगाराम देशहलरा, जेआर सोनवानी, रमेश कुमार थे। इस अवसर पर प्रदेश के 49 विशिष्टजनों को मानद अलंकरण से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में प्रेम सायमन, सुनील बंजारे, आकाश आहूजा, पुन्ना गुप्ता, मुरारीदास, प्रकाश सिंह बादल, अजय ध्रुव, अमरदास आदि उपस्थित थे। 

जनसत्ता

आदिवासी नेतृत्व का सवाल

http://www.jansatta.com/sunday-column/dalit-india-politics-casteism-indian-society-adim-samuday/51775/

भारतीय समाज को समझने के लिए हम वर्ण आधारित जातिसमुच्चय और आदिम समुदायों से निर्मित जनगण की अवधारणा का सहारा ले सकते हैं। जातिगत भारत मुख्य धारा का समाज रहा है, जिस पर बहुत अध्ययन और शोध सामग्री उपलब्ध है। पर आदिवासी भारत के बारे में जो भी अध्ययन सामने आए हैं उनमें अधिकतर की पृष्ठभूमि में या तो आदिवासी को ‘जंगली-बर्बर’ चित्रित करने का दृष्टिकोण रहा है या ‘रोमांटिक’ किस्म का, जिसके तहत यह कहा जाता रहा है कि ‘आदिवासी समृद्ध प्रकृति की गोद में मस्ती से नाचता-गाता रहता है।’ इस समाज को गहराई से समझने का प्रयास कम ही हुआ है। पहले दृष्टिकोण को हम ठेठ भारतीय मिथकों में वर्णित ‘राक्षस-असुर-दैत्य-दानव वगैरह की दी गई संज्ञाओं से लेकर उपनिवेशवादी ‘आपराधिक जनजातीय अधिनियम-1871’ से वर्तमान में भी किसी अन्य रूप में देख सकते हैं। दूसरा दृष्टिकोण ‘गणतंत्र दिवस की झांकियों’ का-सा है।

सवर्ण नेतृत्व का लंबा इतिहास रहा है, जिसे इतिहास ने पर्याप्त पहचान दी है। दलित नेतृत्व का श्रेय बाबा साहेब आंबेडकर की वैचारिक चेतना को दिया जा सकता है, जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त राजनीतिक आरक्षण ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के लोकतांत्रिक नेतृत्व के उभार में खुद का बलबूता या फिर एक हद तक तुष्टीकरण की नीति को कारण माना जा सकता है। पर सवाल है कि अब तक आदिवासी लोकतांत्रिक नेतृत्व अन्य वर्गों की तरह अपेक्षित उभार क्यों नहीं ले सका? विकसित और समृद्ध लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में कमोबेश सभी सामाजिक श्रेणियों की भागीदारी राष्ट्र-निर्माण और मानव संसाधन के उपयोग की दृष्टि से संभव हो सके। ऐसा नहीं कि आदिवासी समुदायों का इतिहास में कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं रहा। इन समुदायों के भी बड़े-बड़े राजवंश रहे हैं, जिन्हें हम पूर्वोत्तर सहित भारत के सभी आदिवासी अंचलों में देख सकते हैं।

इसके बाद उपनिवेश काल में सामंतों और फिरंगियों के खिलाफ जितनी लड़ाइयां आदिवासियों ने लड़ीं, उतनी किसी अन्य वर्ग ने नहीं। पूर्वोत्तर के खासी, नगा, मिजो संघर्षों से लेकर संताल परगना के सिद्दो-कानो, आज के झारखंड के बिरसा मुंडा, मध्यप्रांत के टंट्या भील, राजस्थान के गोविंद गुरु, गुजरात के जोरिया भगत, महाराष्ट्र के ख्याजा नायक, अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में तेलंगाना का संघर्ष, केरल की किसान क्रांति और अंडमान में हुई अबेर्दीन की लड़ाई तक देखा जा सकता है। यह एक ऐसी राजनीतिक चेतना थी, जिसका महत्त्वपूर्ण अवदान देश की आजादी में रहा। और भी देखें तो आदिवासी गणराज्यों का अपना अलग गौरवशाली अतीत रहा है, जहां हम वर्तमान प्रजातंत्र की जड़ों को ढूंढ़ सकते हैं। पर जब हम आधुनिक लोकतंत्र में आदिवासी राजनीतिक नेतृत्व के मुद्दे पर आते हैं, तो बड़ी निराशा होती है। दलितों की तरह भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए भी राजनीतिक आरक्षण की व्यवस्था रखी गई है, जिसमें संविधान निर्मात्री सभा में आदिवासी सदस्य जयपालसिंह मुंडा का मूल्यवान योगदान रहा।

इसके बावजूद राष्ट्रीय फलक पर किसी आदिवासी राजनीतिक नायक का उभर कर सामने नहीं आना चौंकाता है। यों कई आदिवासी राजनेताओं के नाम गिनाए जा सकते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी राष्ट्रीय स्तर का नहीं बन सका। पीए संगमा चाहे केंद्र में काबीना मंत्री और बाद में लोकसभा के अध्यक्ष तक बन गए, मगर अंतत: वे पूर्वोत्तर तक ही सिमट कर रह गए। यही हाल शिबू सोरेन का हुआ, जिन्होंने झारखंड राज्य के लिए संघर्ष किया, पर वे राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासियों का नेतृत्व नहीं कर सके। राजनीतिक-नेतृत्व और सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का लंबा इतिहास होने के बावजूद यह दशा क्यों है? इसका एक बड़ा कारण है भौगोलिक दृष्टि से आदिवासी समुदायों का बिखराव, जिसने उन्हें एकजुट होने में बाधा पहुंचाई। दूसरा बड़ा कारण है मुख्य भारतीय समाज से अलगाव। अन्य कारणों में पिछड़ापन हो सकता है, जिसकी वजह से ये आदिम समुदाय शिक्षा और अन्य भौतिक सुविधाओं से वंचित रहे, जिसके चलते उनका मुख्यधारा से अपेक्षित जुड़ाव संभव नहीं हो सका। भौगोलिक अलगाव ने इस समाज को ‘अपने हाल में संतोषी’ की-सी मानसिकता बना दी, जिसके चलते निजी संपत्ति की अवधारणा का विकास न हो पाना, पेट भरने के आगे और कुछ नहीं सोच पाना, अकूत प्राकृतिक संपदा का उपयोग-उपभोग भौतिक संपन्नता के उद्देश्य से न कर सकना, संघर्ष की परंपरा के बाद भी बहुमुखी शोषण को सहते जाना, टुकड़ा-टुकड़ा अपनी आंचलिक स्वायत्तता के मोहवश बाहरी दुनिया से संपर्क न रखना, अपने में खुलापन के बाद भी ‘बंद समाज’ की तरह जीते चले जाना, गैर-आदिवासी लोगों की राजनीतिक रणनीति को सीखने में धीमी गति से चलना आदि की दशा बना दी। किसी भी देश-समाज में उभरने वाली लोकतांत्रिक राजनीति के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक वैचारिकी का निर्माण हो।

जब हम दलितों से आदिवासियों के राजनीतिक नेतृत्व की तुलना करते हैं, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि दलितों में मसीहा के रूप में बाबा साहेब आंबेडकर मौजूद हैं, जो संपूर्ण राष्ट्र के दलित समाज के वैचारिक महानायक हैं, जिनसे दलित समाज निरंतर प्रेरणा लेता रहता है। आदिवासीजन के साथ स्थिति भिन्न है। यहां कोई प्रेरणादायक विभूति नहीं है। जो भी ऐतिहासिक या लोकतांत्रिक नायक उभरे, उनमें से कोई अपने अंचल की सीमाओं को पार नहीं कर सका। आदिवासी समाज की विरासत में सामूहिकता एक शक्तिशाली तत्त्व रहा है। जिन गणतंत्रात्मक प्रणालियों का ऐतिहासिक संदर्भ हम लेते हैं, वहां मुखिया होते हुए भी सामूहिक निर्णय की बहुत बड़ी जगह रहती थी। आधुनिक लोकतंत्रात्मक व्यवस्थाओं में एकल व्यक्तित्व पर केंद्रित राजनीतिक नेतृत्व की अवधारणा लोगों की मानसिकता में गहरी जड़ जमाए हुए प्रतीत होती है। इसका थोड़ा और विश्लेषण किया जाए, तो आजादी के दौर में ‘लाल-बाल-पाल’ के बाद महात्मा गांधी के रूप में ‘एकछत्रीय नायकत्व’ की छवि उभरती है। फिर आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू की। आगे चल कर ‘कांग्रेसी सिंडीकेट प्रणाली’ के अल्पकालीन दौर में इंदिरा गांधी का ‘करिश्माई नेतृत्व’ उस प्रणाली को ध्वस्त कर विफल बना देता है। यानी फिर वही एकछत्र नायकत्व। इसके आगे जब हम आज की सत्ता-राजनीति को देखते हैं, तो वही दृश्य हमारे समक्ष उपस्थित हो जाता है। जब परंपरागत आदिवासी सामूहिक राजनीतिक नेतृत्व से वर्तमान प्रजातांत्रिक नेतृत्व तक यात्रा करते हैं तो एक बड़ा कारण यह हो सकता है, जिसने आदिवासी लोकतांत्रिक नेतृत्व को उभरने देने में व्यवधान पहुंचाया।

आंबेडकर ने कहा था कि ‘सत्ता वह मास्टर चाबी है, जिससे किसी भी ताले को खोला और बंद किया जा सकता है।’ दलित राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र में आवश्यक हस्तक्षेप किया है। मगर आदिवासी की राजनीतिक लड़ाई कोई दूसरा लड़ने का दावा कर रहा है, चाहे वह एनजीओ हो, धर्मांतरणकारी या नक्सलवाद के नाम पर हिंसक तत्त्व। इन सारी गतिविधियों का नेतृत्व गैर-आदिवासी करता है, इसीलिए आदिवासी के भले का तरीका भी गलत है और इरादा भी गलत। प्रजातंत्र में राजनीतिक दखलंदाजी से ही अपने पक्ष में निर्णय कराए जा सकते हैं। यही वजह है कि संविधान में प्रभावी प्रावधान और सरकारी बजटों में पर्याप्त धनराशि होने के बाद भी आदिवासी समाज विकास की धारा से अब तक नहीं जुड़ पाया है। स्वस्थ और समृद्ध लोकतंत्र समाज के सभी घटकों के प्रतिनिधित्व की अपेक्षा करता है। भारतीय जनतंत्र दुनिया के सफलतम लोकतंत्रों में गिना जाता है। इसे और अधिक मजबूत होना है। आदिवासी ही नहीं, बल्कि सभी वर्गों के जागरूक लोगों और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी लोकतांत्रिक नेतृत्व को विकसित किया जाए।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s