दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 09.11.15

 मेरठ: नाबालिग दलित छात्रा से रेप के बाद हत्‍या, खेत में पड़ा मिला शव – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/UP-MEER-minor-dalit-girl-raped-and-murdered-in-meerut-5164033-PHO.html

जमीन विवाद को लेकर हुई थी महिला की हत्या, थाना इंचार्ज समेत कई लाइन हाजिर आज समाज

http://www.aajsamaaj.com/article/406.html

सहारनपुर: शादी का झांसा देकर युवक ने दलित विधवा से कि‍या रेप, केस दर्ज – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/UP-MEER-widow-raped-by-young-man-to-deceive-marry-in-saharanpur-5164142-PHO.html

जुगलीपुर के युवक की नेपाल में संदिग्ध मौत – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/siddharthnagar/siddharthnagar-hindi-news/one-killed-in-nepal-hindi-news/

बेटियों की शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/ghazipur/daughters-need-to-focus-on-education-hindi-news/

न्याय का नखलिस्तान – जनसत्ता

http://www.jansatta.com/politics/justice-system-in-india/48405/

 An Appeal: Please contribution to PMARC for strengthen Democracy, Peace & Social Justice !

दैनिक भास्कर

मेरठ: नाबालिग दलित छात्रा से रेप के बाद हत्‍या,

खेत में पड़ा मिला शव

http://www.bhaskar.com/news/UP-MEER-minor-dalit-girl-raped-and-murdered-in-meerut-5164033-PHO.html

 मेरठ. थाना दौराला क्षेत्र के गांव समौली में 12 साल की दलित छात्रा से रेप के बाद हत्या कर दी। छात्रा का शव खेत में पड़ा मिला। उसके शरीर पर चोट के निशान थे और कपड़े फटे हुए थे। घटना से क्षेत्र में हड़कंप मच गया। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने शव कब्जे में लेने की कोशि‍श की, लेकिन ग्रामीणों ने हंगामा कर दिया। ग्रामीण डीएम को मौके पर बुलाने की मांग कर रहे थे। एसडीएम, सीओ दौराला और इंस्पेक्टर दौराला पुलिस बल के के साथ मौके पर पहुंचे। एसडीएम ने आरोपी को 24 घंटे में गिरफ्तार करने और पीड़ित परिवार को हर संभव आर्थिक मदद उपलब्ध कराए जाने का आश्वासन देकर ग्रामीणों को शांत किया। बाद में पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

Dalits 10

 अपने नाना के घर आई हुई थी छात्रा

लावड़ चौकी क्षेत्र के गांव भगवानपुर निवासी छात्रा (12) आठवीं में पढ़ती थी। करीब 20 दिन पहले वह अपने नाना के घर आई थी। बताया गया कि मृतका की बड़ी बहन अपने नाना के पास रहकर एक इंस्टीटयूट में बीएससी होम सांइस की पढ़ाई कर रही है। रविवार को छात्रा की नानी उसे अपने साथ लेकर खेतों में घास लेने गई थी। थोड़ी घास काटने के बाद उसकी नानी ने उसे घर पर घास डालकर वापस खेत में आने के लिए कहा था। छात्रा घास लेकर खेत से चली गई, लेकिन वह वापस अपनी नानी के पास खेत में नहीं पहुंची।

छात्रा के गायब होने पर शुरू की तलाश 

छात्रा के खेत में वापस न पहुंचने पर नानी वापस गांव पहुंची और उसके बारे में पूछा। परिजनों ने बताया कि छात्रा तो तभी वापस खेत में चली गई थी। तब परिजनों ने ग्रामीणों के साथ मिलकर उसकी तलाश की। दोपहर में करीब दो बजे छात्रा का शव गांव के ही धर्मवीर के गन्ने के खेत में पड़ा मिला। जिस हालत में छात्रा का शव पड़ा था उसे देखकर लगता था कि उसके साथ रेप करने के बाद गला दबाकर हत्या की गई है। उसके शरीर पर नाखून की खरोंच व चोट के निशान मिले हैं। परिजन उसका शव पुलिस के पहुंचने से पहले ही उठाकर घर ले आए थे। पुलिस पहले गांव में पीड़ित के घर पहुंची और बाद में घटना स्थल का मुआयना किया।

डॉग स्क्वॉयड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट की टीम पहुंची

सीओ डॉ. अरविंद कुमार मौके पर पहुंचे। उन्होंने डॉग स्क्वॉयड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट की टीम को भी मौके पर बुला लिया। दोनों टीमों ने मौके पर पहुंच कर जांच पड़ताल शुरू की। मौके से टीम ने कुछ नमूने लिए हैं। डॉग स्क्‍वॉयड व फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंचकर छानबीन में जुट गई। मृतक छात्रा के परिजनों ने दौराला थाने में अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है। सीओ डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत कैसे हुई इसका पता चलेगा। रेप की पुष्टि भी मेडिकल रिपोर्ट के आने के बाद ही होगी। सीओ के अनुसार, रिपोर्ट दर्ज कर पुलिस ने जांच पड़ताल शुरू कर दी है।

आज समाज

जमीन विवाद को लेकर हुई थी महिला की हत्या, थाना इंचार्ज समेत कई लाइन हाजिर

http://www.aajsamaaj.com/article/406.html

नरवाना। कलौदा कलां गांव में शुक्रवार को जमीन विवाद को लेकर खूनी संघर्ष हुआ। हमले में 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला कुलवंती की हत्या और 6-7 लोग घायल हो गए थे। मृतक महिला के परिजनों ने पुलिस और दूसरे पक्ष के लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए प्रशासन को शव उठाने से इनकार कर दिया था।

शुक्रवार आधी रात को डीसी विनय सिंह गांव पहुंचे और शव को सिविल अस्पताल लाया गया। शनिवार को डीसी ने पीड़ितों की कई मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया व कई मांगों को सरकार के पास भेजने की बात कही। मौके पर ही पीड़ित परिवार को तीन लाख रुपए दिए गए। इसके बाद ही दलित पोस्टमार्टम कराने को राजी हुए। शनिवार शाम पुलिस की मौजूदगी में महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

सदर पुलिस ने रामफल की शिकायत पर भीम सिंह, बृछभान, बलमंत, भीम सिंह का लड़का, सलिन्द्र, काला, साबिल, पम्मी, बीर सिंह, सत्यवान, सुभाष, दनौदा खुद की अंगूरी व भीम सिंह के जमाई को नामजद कर 150 से अधिक लोग व 20-25 अज्ञात महिलाओं के खिलाफ हत्या व एससी एसटी समेत कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया है।

दनौदा पुलिस चौकी के इंचार्ज एएसआई जयबीर सिंह को लाइन हाजिर कर एएसआई सुरेंद्र सिंह को कमान सौंपी गई है। हेड कांस्टेबल सतपाल, कुलदीप समेत 3-4 अन्य पुलिस कर्मचारियों को लाइन हाजिर किया है।

झगड़े में घायल सतीश व कुलवंत ने कहा कि उनका सही इलाज नहीं हो रहा। परिजनों ने एसडीएम को शिकायत दी है। इसके बाद उनके एक्स-रे किए गए। सतीश ने कहा कि उसकी टांग टूटी है। न तो अब तक प्लास्टर किया और न रेफर किया है।

दैनिक भास्कर

सहारनपुर: शादी का झांसा देकर युवक ने

दलित विधवा से कि‍या रेप, केस दर्ज

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 सहारनपुर. कोतवाली देवबंद थानाक्षेत्र में एक दलि‍त वि‍धवा से शादी का झांसा देकर रेप करने का मामला सामने आया है। बताया जाता है कि‍ आरोपी विधवा को पहले अपने प्रेम जाल में फंसाया और फि‍र शादी करने की बात कहकर उसे लेकर दूसरे जगह भाग गया। चार माह तक युवक उसके साथ शारीरि‍क संबंध बनाता रहा। जब पीड़ि‍ता ने शादी करने के लि‍ए दबाव बनाया] तो युवक गाली-गलौज करते हुए उसे जान से मारने की धमकी देने लगा। इसके बाद पीड़ि‍त विधवा ने कोतवाली देवबंद में आरोपी के खिलाफ रेप, धमकी और एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज कराया है।

कोतवाली देवबंद थानाक्षेत्र निवासी पीड़ि‍त महिला के पति की कुछ समय पहले मौत हो गई थी। विधवा का आरोप है कि मुजफ्फरनगर के थाना पुरकाजी के गांव मौजाहेडी निवासी अश्वनी पुत्र महेश का उसके घर आना-जाना था। पति की मौत के बाद आरोपी ने विधवा को प्रेम जाल में फंसा लिया और फिर शादी का झांसा देकर 16 अगस्त 2015 को उसे गांव से बहला-फुसलाकर भगा ले गया। इसके बाद एक कमरा लेकर उसके साथ रहने लगा। पीड़ि‍त विधवा ने बताया कि आरोपी युवक उससे शादी का झांसा देकर उसकी इज्‍जत से खेलता रहा। जब भी वह शादी करने की बात कहती तो आरोपी टाल-मटोल करता रहता था।

शादी का दबाव बनाने पर जान से मारने की दी धमकी

विधवा ने जब युवक पर शादी के लिए दबाव बनाया तो वह उसे जातिसूचक शब्द इस्‍तेमाल कर गाली देते कहते हुए उसे जान से मारने की धमकी दे डाली। रविवार देर शाम पीड़िता एसएसपी आवास पर पहुंची और एसएसपी राजेंद्र प्रसाद यादव को आपबीती सुनाई। विधवा की पीड़ा सुनने के बाद एसएसपी ने देवबंद कोतवाली पुलिस को मामले में रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए। इसके बाद कोतवाली देवबंद में अश्वनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

आरोपी को पकड़ने के लि‍ए पुलि‍स दे रही दबि‍श

देवबंद पुलिस ने बताया कि मौजाहेडी मुजफ्फरनगर निवासी अश्वनी पुत्र महेश के खिलाफ रेप, धमकी और एससी/एसटी एक्ट की धारा में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह गांव से फरार बताया जा रहा है।

अमर उजाला

जुगलीपुर के युवक की नेपाल में संदिग्ध मौत

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मोहाना थाना क्षेत्र के जुगलीपुर गांव के एक दलित युवक की नेपाल स्थित ससुराल में संदिग्ध हालत में मौत हो गई। रविवार को युवक के मौत की सूचना घर पहुंची तो कोहराम मच गया।

 मोहाना थाना क्षेत्र के जुगलीपुर निवासी शैलेष (25) शनिवार को घर से ससुराल के लिए चला। पहले वह शोहरतगढ़ थाना क्षेत्र के महली गांव में अपनी बहन के घर पहुंचा। यहां कुछ देर रुकने के बाद वह देर शाम नेपाल के कपिलवस्तु जिले के लौसा गांव में अपने ससुराल  जाने की बात बहन से कह  वहां से निकल गया। 

शनिवार की रात को ही उसकी  संदिग्ध  हालत में मौत हो गई। रात में  ही  उसके  ससुराल के लोग  इलाज के  लिए  तौलिहवा जिला अस्पताल ले गए। जहां चिकित्सकों ने युवक को मृत घोषित कर दिया। अस्पताल की सूचना पर पहुंची तौलिहवा  पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पीएम के लिए भेज दिया।

 युवक की  संदिग्ध  हालत में मौत की सूचना  पर  मुकामी पुलिस  पहुंचती  कि  ससुराल  के  लोग घर में ताला

जड़कर फरार हो  गए।  रविवार  की  सुबह  नेपाल  पुलिस  ने जुगलीपुर के  युवक  के  घर वालों को घटना  की जानकारी  हुई तो  लोग  मृतक  के  ससुराल  पहुंचे, मगर  वहां  कोई  नहीं  मिला।  तौलिहवा  पुलिस  से मिलकर परिजन  शव  लेकर  घर लौट आए।

अमर उजाला

बेटियों की शिक्षा पर ध्यान देने की जरूरत

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गाजीपुर। सदर ब्लाक के सुलेमाबाद दलित बस्ती में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के तहत रविवार को गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर जिला संयोजक डा. संगीता बलवंत ने कहा कि हर वर्ग की बेटियों को शिक्षा से जोड़कर ही भारत को सशक्त बनाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि दलित समाज की बेटियां भी जब शिक्षा के क्षेत्र में आगे आएंगी, तभी आधी आबादी पूर्ण रूप से विकसित होगी। जमानिया की कक्षा-4 में पढ़ने वाली दलित समाज की तीरंदाजी राष्ट्रीय स्तर पर कई बार स्वर्ण पदक जीतने वाली अंजलि को राष्ट्रपति द्वारा 14 नवंबर को सम्मानित किया जाएगा, जो बेटियों के लिए गौरव की बात है।

मालती देवी ने कहा कि दहेज के कारण हमें कन्या भ्रूण हत्या को बंद करना चाहिए। बेटियां आज स्वयं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही है। अध्यक्षता कर रहे शिवराम ने कहा कि दलित वर्ग को अपनी बेटियों की शिक्षा पर बहुत ध्यान देने की जरूरत है।

हमारे समाज की बेटियां जब शिक्षित होंगी, तभी हमारा समाज तेजी के साथ विकास करेगा। गोष्ठी में राधेश्याम, मुकेश राम, मालती, साधना, संजू देवी, चंद्रकला, सुमन, प्रमिला, चिंता, रिशा, रीना, सोनी, बेइली, गीता और जीरा ने भी अपना विचार व्यक्त किया।

जनसत्ता

न्याय का नखलिस्तान

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भारतीय समाज पहले वर्ण-व्यवस्था आधारित था जो धीरे-धीरे जाति-व्यवस्था में परिवर्तित हो गया। असमानता, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, रूढ़िवादिता समाज में पूरी तरह व्याप्त थी। यह सामंती दौर था जब गरीबों, दलितों, महिलाओं और विकलांगों को न्याय नहीं मिलता था। आजादी के बाद कुछ परिवर्तन अवश्य हुआ है, लेकिन अब भी समाज का बड़ा हिस्सा न्याय की तलाश में भटकता नजर आता है। अदालतों में विचाराधीन मुकदमों को देखा जाए तो देश में न्याय प्रक्रिया की स्थिति बड़ी शोचनीय नजर आती है। देश भर की अदालतों में कोई तीन करोड़ मामले लंबित हैं। इनका निपटारा कब तक हो पाएगा, कहना मुश्किल है। मुकदमों का यह पिरामिड देशवासियों के लिए चिंता का विषय है। अदालती फैसलों में पांच-छह साल लगना तो सामान्य-सी बात है, पर अगर बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो तो आम लोगों के लिए यह किसी नारकीय त्रासदी से कम नहीं है। वैसे तो न्याय का मौलिक सिद्धांत यह है कि ‘न्याय में विलंब होने का मतलब न्याय को नकारना है’।

विडंबना यह है कि अदालतों में जब करोड़ों मामलों में नित्य न्याय की प्रक्रिया मुल्तवी की जा रही हो तो आम आदमी को न्याय सुलभ हो पाना मृग मरीचिका जैसा ही है। दरअसल, अदालतों में त्वरित निर्णय न हो पाने के लिए प्रशासनिक कार्यप्रणाली ही ज्यादा दोषी है जो अंगरेजी शासन की देन है। उसमें व्यावहारिक परिवर्तन आज तक नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हों, देश के विधिमंत्री हों या अन्य, लंबित मुकदमों के अंबार को देख कर चिंता में डूब जाते हैं, लेकिन किसी को हल नजर नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अदालतों में जजों की कमी है। उच्च न्यायालयों के लिए डेढ़ हजार और निचली अदालतों के लिए तेईस हजार जजों की आवश्यकता है।

फिलहाल उच्च न्यायालयों में ही दो सौ अस्सी पद रिक्त पड़े हैं। जजों की कार्य-कुशलता के संबंध में ओड़िशा हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश बिलाई नाज ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई जज फौजदारी मामले निपटाने में अक्षम हैं। 1998 की फौजदारी अपीलें मुंबई उच्च न्यायालय में इसलिए विचाराधीन पड़ी हैं, क्योंकि कोई जज प्रकरण का अध्ययन करने में दिलचस्पी नहीं लेता। पदों की कमी और रिक्त पदों को भरे जाने में विलंब ऐसी समस्याएं हैं, जिनका निराकरण जल्दी होना चाहिए, पर यहां भी यथावत शिथिलता देखी जा सकती है। अखबारों और टीवी के सर्वव्यापी अस्तित्व के बावजूद नोटिस तामील के लिए उनका सहारा नहीं लिया जाता। नोटिस तामील होने में काफी वक्त जाया होता है। आवश्यकता इस बात की है कि कानूनों में अपेक्षित सुधार कर जमानत और अपीलों की शृंखला में कटौती की जाए और रोज पेशियां बढ़ाने पर बंदिश लगाई जाए। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि दलित अत्याचार संबंधी कानून को कभी ठीक से लागू नहीं किया गया। पुलिस अधिकारियों को दलितों-आदिवासियों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए कानून के अहम प्रावधानों के बारे में ठीक से अवगत कराने का प्रयास नहीं हुआ। हमारे संविधान में सामाजिक और आर्थिक न्याय की गारंटी समस्त नागरिकों को दी गई है।

संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के जरिए जीने के अधिकार की गारंटी मिली हुई है। सामाजिक न्याय का मुख्य उद््देश्य व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित के बीच सामंजस्य स्थापित करना है। इसलिए कल्याणकारी राज्य की कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय को ध्यान में रखते हुए समाजवादी व्यवस्था का प्रावधान भी रखा गया। पर राजनीतिक स्वार्थों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने समाजवादी स्वप्न साकार नहीं होने दिया। राजनीतिक और नौकरशाह भ्रष्टाचार में लिप्त होते गए। देश में भ्रष्टाचार इतना सर्वव्यापी हो चुका है कि संप्रति व्यवस्था का कोई भी कोना उसकी सड़ांध से बचा नहीं है। लेकिन उच्च न्यायपालिका कुछ अपवाद छोड़ कर सामान्यतया साफ-सुथरी ही कही जाएगी। पश्चिम बंगाल के न्यायमूर्ति सेन और कर्नाटक के दिनकरन जैसे मामले प्रकाश में आने से न्यायपालिका की धवल छवि पर कालिख के छींटे पड़े हैं। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के जजों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कार्रवाई किया जाना बहुत कठिन होता है।

न्यायिक आयोग के गठन का मसला बरसों से अधरझूल में था। पर जब इस पर कानून बना भी, तो सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से उस पर पानी फिर गया। एक पहलू यह भी है कि अगर विगत छह दशकों में राज्य के तीन अंगों यानी विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के प्रदर्शन पर नजर डाली जाए तो इनमें न्यायपालिका को बेहतर माना जाएगा। अनेक अवसरों पर उसने विधायिका और कार्यपालिका द्वारा संविधान के उल्लंघन को रोका है। उसकी सक्रियता ने जनजीवन में एक नई उम्मीद भी पैदा की। लेकिन न्यायालय से पूर्व की न्याय प्रक्रिया किस तरह प्रारंभ होती है इसे भी देखना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद-21 में उल्लिखित गरिमामय ढंग से जीने के अधिकार की उच्चतम न्यायालय की विभिन्न व्याख्याओं से स्पष्ट है कि मानव जीवन पशुवत नहीं है और सम्मान और गरिमा के साथ जीवन यापन करना हमारा अधिकार है और यह मानवाधिकार भी है। अलबत्ता यह एक ऐसी सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रणाली में ही संभव है जो स्वस्थ और पारदर्शी हो। लेकिन जिस व्यवस्था के बल पर देश में सुशासन लाने की बात होती रही है वही व्यवस्था कुशासन की नींव बन चुकी है। आखिर क्या वजह रही कि पुलिस व्यवस्था जनतांत्रिक मूल्यों के हिसाब से ढल नहीं पाई है; वह अब भी बहुत हद तक औपनिवेशिक जमाने की खामियों की शिकार है और उसे लेकर भ्रष्टाचार की शिकायतें भी आम हैं। ‘इंडिया करप्शन एंड ब्राइबरी रिपोर्ट’ के अनुसार भारत में रिश्वत मांगने वाले सरकारी कर्मचारियों में तीस प्रतिशत की भागीदारी अकेले पुलिस तंत्र की है।

भारत में पुलिस के हस्तक्षेप का दायरा बहुत विस्तृत है, इसीलिए उसके पास असीमित अधिकार हैं। वह राज्यसत्ता की सबल संस्था है, सत्ता का सशक्त औजार भी है। जाहिर है, उसका चरित्र राजसत्ता के चरित्र से अलग नहीं हो सकता। पुलिस द्वारा रिश्वत प्राथमिकी दर्ज करवाने, आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज करने में कोताही बरतने या मामला न दर्ज करने तथा जांच करते समय सबूतों को नजरअंदाज करने संबंधी मामलों में ली जाती है। रसूखदारों के दबाव में काम करना तथा अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप को झेलना पुलिस की नियति हो गई है। पुलिस सुधार और पुनर्संगठन की आवश्यकता कई दशकों से महसूस की जा रही है, लेकिन इस दिशा में पहल नहीं की जाती। केंद्र के गृहमंत्री और कानूनमंत्री कोई पहल नहीं करते। वे हमेशा इस दलील की आड़ लिए रहते हैं कि कानून-व्यवस्था राज्यों की जिम्मेदारी है इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों पर हिंसा और हरियाणा में दलितों पर अत्याचार की हाल की घटनाएं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि किस तरह बहुसंख्यकों और खाप पंचायतों ने ऐसे हमलों की योजना बनाई और उन पर खुलेआम अमल करवाया। आगजनी तथा हत्याओं में लिप्त अपनी जाति के लोगों को बचाने में खाप पंचायतें आगे आर्इं। कहीं सांप्रदायिक तनाव का माहौल बनाया गया। कहीं दंगे करवाए गए।

कहीं दलितों को जिंदा जलाया गया। चुनाव और वोट की राजनीति की गई। प्राय: यह देखा जाता है कि पुलिस और प्रशासनिक अमला ऊंची-दबंग जातियों के हितों की हिफाजत करने में लगा रहता है। स्वाभाविक तौर पर प्रश्न उठता है कि जब तक समाज के मानस में बदलाव नहीं होगा- जिसे नए किस्म के समाज सुधार तथा सांस्कृतिक आंदोलनों से क्रियान्वित किया जा सकता है- क्या हमारे लिए यह संभव होगा कि हम जमीनी स्थिति में कोई गुणात्मक फर्क ला सकें। पुलिस तंत्र की स्थापना कानून-व्यवस्था को कायम रखने के लिए की गई थी। आज भी पुलिस तंत्र का यही कर्तव्य माना जाता है कि वह सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करे तथा जनजीवन को भयमुक्त रखे। इसके लिए पुलिस को पर्याप्त अधिकार भी प्राप्त हैं। भारत का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास, बढ़ती जनसंख्या, प्रौद्योगिकी का विकास, सफेदपोश अपराधों में बढ़ोतरी, इन तमाम परिस्थितियों के कारण पुलिस तंत्र की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। लेकिन भारतीय समाज में पुलिस की तानाशाहीपूर्ण छवि, जनता के साथ मित्रवत न होना तथा अपने अधिकारों के दुरुपयोग के कारण वह आरोपों से घिरती गई है। आज स्थिति यह है कि पुलिस बल समाज के तथाकथित ठेकेदारों, नेताओं तथा सत्ता के हितों की कठपुतली बन गया है। समाज का दबा-कुचला वर्ग तो पुलिस के पास जाने से भी डरता है। चूंकि पुलिस के पास सिविल समाज से दूरी बनाए रखने और उसके ऊपर बेजा प्रभाव डालने की तमाम व्यावहारिक शक्तियां हैं इसलिए साधारण वर्ग अपनी आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता और वह करता भी है तो उसके भयावह परिणाम उसे भोगने पड़ते हैं। कार्यपालिका और न्यायपालिका उसकी कोई मदद नहीं कर पाती हैं, क्योंकि उनका आधार पुलिस पर ही टिका होता है। ऐसे में सामान्य व्यक्ति को न्याय मिलना दूर की संभावना ही कही जाएगी। चौथा खंभा कहलाने वाला मीडिया भी राजनीतिक दबावों से बच नहीं पाया है।

इसके अलावा, वह मुनाफा कमाने के औजार के रूप में भी तब्दील हो चुका है। अब वह भी सामान्य व्यक्ति के दुख-दर्द का साझीदार नहीं है। ऐसी स्थिति में समाज के पास एक सशक्त आंदोलन निर्मित करने करने अलावा कोई और विकल्प शेष नहीं बचता है।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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