दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 08.11.15

 कर्नाटक में दलित महिला के मिड डे मील बनाने से बच्‍चे छोड़ रहे स्‍कूल… – इनेक्स्ट लाइव

http://inextlive.jagran.com/dalit-women-writes-midday-meal-dairy-every-day-no-one-ate-today-201511060021

पुलिस कांस्टेबल पर छात्रा से दुष्कर्म का आरोप – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/national-police-constable-accused-of-rape-of-schoolgirl-548921

शिक्षा में सरकारी बेरुखी – पत्रिका

http://www.patrika.com/news/opinion/government-indifference-to-education-1131014/

…उजड़ गयी राजू की दुनियां – प्रभात खबर

http://www.prabhatkhabar.com/news/gopalgunj/story/594720.html

दलित पर टिप्पणी करने वाले मंत्री का फूंका पुतला – राजेस्थान पत्रिका

http://rajasthanpatrika.patrika.com/story/rajasthan/burned-the-effigy-of-the-minister-to-comment-on-dalits-1429857.html

An Appeal: Please contribution to PMARC for strengthen Democracy, Peace & Social Justice !

इनेक्स्ट लाइव

कर्नाटक में दलित महिला के मिड डे मील बनाने से बच्‍चे छोड़ रहे स्‍कूल…

http://inextlive.jagran.com/dalit-women-writes-midday-meal-dairy-every-day-no-one-ate-today-201511060021

समाज में व्‍याप्‍त नीच और ऊंच वर्ग की मासिकता से जुड़ा एक मामला कर्नाटक में सामने आया है। यहां पर एक स्‍कूल में एक महिला का बनाया मिड डे मील सिर्फ इसलिए नहीं खाया जा रहा है कि क्‍योंकि वह दलित व गरीब है। इतना ही नहीं पिछले पांच महीने में करीब 100 से अधिक बच्‍चे स्‍कूल छोड़ कर चले गए हैं। हालांकि स्‍कूल प्रशासन इस सबके पीछे गांव की राजनीति बता रहा है।

6th nov 2

किसी ने खाना नहीं खाया

कर्नाटक के कागानाहाली के एक स्‍कूल में मिड डे मील योजना के तहत खाना बनाने के लिए दलित महिला को कुक बना दिया गया है। मगर, स्‍कूल में बच्‍चों ने खाना ही छोड़ दिया है। वह राधाम्‍मा अब रोज मिड डे मील डायरी लिख रही है। उसके चार शब्‍द महिला की व्‍यथा को बयां करने के लिए काफी हैं। “No one ate today.” यानी आज किसी ने खाना नहीं खाया। यह सिलसिला पिछले पांच महीने से जारी है। राधाम्‍मा अनुसूचित जाति से हैं। फरवरी 2014 में जब उनकी नियुक्‍ित इस स्‍कूल में हुई थी तब पहली से आठवीं कक्षा तक यहां 118 बच्‍चे पढ़ते थे। मगर, धीरे-धीरे 100 बच्‍चों ने स्‍कूल छोड़ दिया है। कोलार जिले के इस स्‍कूल में बाकी के बचे 18 बच्‍चे भी इस शर्त पर स्‍कूल आ रहे हैं कि राधाम्‍मा मध्‍यान भोजन नहीं बनाएंगी।

बच्‍चों की टीसी मांग रहे 

इस काम के जरिये वह हर महीने करीब 1700 रुपए कमाती हैं। यह रकम सात लोगों के परिवार को पालने वाली राधाम्‍मा के लिए बहुत मायने रखती है। कागानाहाली छोटा सा गांव है, जहां 101 परिवार रहते हैं और जिसकी कुल आबादी 452 है। गांव की करीब 40 फीसद आबादी अनुसूचित जनजाति है, जबकि 18.14 फीसद आबादी राधाम्‍मा की तरह दलित है। बाकी की आबादी में ओबीसी के खुरुबास और वोक्‍कालीगास शामिल हैं। स्‍कूल के प्रधानाचार्य वाईवी वेंकटाचालापथी आरोप लगाते हैं कि गांव की राजनीति स्‍कूल की इस स्थिति के लिए जिम्‍मेदार है। अभिभावक स्‍कूल में आकर बच्‍चों की टीसी मांग रहे हैं। यदि वह उन्‍हें समझाने की कोशिश करते हैं तो वे गाली-गलौच करने लगते हैं।

नई दुनिया

पुलिस कांस्टेबल पर छात्रा से दुष्कर्म का आरोप

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 रुड़की। रुड़की में तैनात रह चुके उत्तराखंड पुलिस के एक कांस्टेबल पर छात्रा से दुष्कर्म व अश्लील क्लिप बनाने का आरोप लगा है। लड़की के गर्भवती होने पर परिजनों को इसकी जानकारी हुई। आरोपी के दूसरे समुदाय का होने पर आक्रोशित हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने कोतवाली का घेराव किया। पुलिस आरोपी पर कार्रवाई की तैयारी कर रही है। आरोपी सिपाही वर्तमान में उत्तरकाशी में तैनात है।

गंगनहर कोतवाली क्षेत्र की निवासी 16 वर्षीय दलित लड़की सिविल लाइंस कोतवाली क्षेत्र के स्कूल में दसवीं की छात्रा है। पीड़िता के भाई के मुताबिक पिछले साल उसकी बहन जब स्कूल जाती थी तो रास्ते में सिविल लाइंस कोतवाली में तैनात कांस्टेबल आमिर खान उसका पीछा करता था।

एक दिन मौका पाकर आरोपी उसे एक दोस्त के कमरे में ले गया और दुष्कर्म किया। यह बात घर बताने पर जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद आरोपी सिपाही इसी साल 10 मार्च को नाबालिग छात्रा को खंजरपुर स्थित अपने एक दोस्त के घर ले गया और दुष्कर्म किया। आरोप है कि इस दौरान उसकी वीडियो क्लिप भी बना ली। इसी दौरान परिजनों को पता चला कि लड़की सात माह की गर्भवती है।

 पत्रिका

शिक्षा में सरकारी बेरुखी

http://www.patrika.com/news/opinion/government-indifference-to-education-1131014/

हमारे देश में आरक्षण पर बहुत बहस होती है लेकिन देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था अमीर बाप के बच्चों के लिए है। इस आरक्षण पर बहस नहीं होती। संख्या की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी छात्रवृति योजना है मीन्स-कम-मेरिट स्कॉलरशिप। पिछली सरकार के दौरान अपूर्व विस्तार के बावजूद इस योजना में कक्षा नवीं से बाहरवीं तक पढऩे वाले लगभग छह करोड़ बच्चों में से चार लाख जरूरतमंद बच्चों को स्कॉलरशिप दी जाती है। पता है कितनी? सिर्फ 500 रुपए प्रतिमाह। और वह भी बढ़ोत्तरी के बाद की स्थिति है। देश भर में छात्रवृत्तियों का यही हाल है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सामने विरोध प्रदर्शन में खड़े-खड़े मेरा मन अतीत में घूमने लगा। शायद माहौल का असर था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ और अन्य छात्र संगठन एमफिल और पीएचडी की छात्रवृत्ति बंद करने के तुगलकी आदेश का विरोध करने के लिए धरने पर बैठे थे। उनके समर्थन में बोलते हुए मैं अपने छात्र जीवन के बारे में सोचने लगा। मैं ग्यारहवीं में था जब मुझे \’राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृतिÓ (एनटीएस या नेशनल टैलंट स्कॉलरशिप) मिली। उन दिनों हर महीने 250 रुपए मिलते थे, साथ में किताब खरीदने के सालाना 300 रुपए।

अपने छोटे शहर से बाहर दिल्ली महानगर में आकर एम.ए. की पढ़ाई मैंने इसी स्कॉलरशिप के सहारे की। कभी-कभार घर से पैसे लाने पड़ते थे, लेकिन स्कॉलरशिप से गुजारा चल जाता था। दिल्ली आकर तो एक मित्रमंडली बन गई थी जो सब एनटीएस धारक थे, सब महीने के आखिरी दिनों में पैसे दांत से पकड़ते थे, लेकिन काम चला लेते थे। जब 1978 में मुझे स्कॉलरशिप शुरू हुई तब नए लेक्चरार को करीब 1000 रु. मासिक वेतन मिलता था। यानी नए लेक्चरार की पहली तनख्वाह का एक-चौथाई हिस्सा देश की सर्वश्रेष्ठ स्कॉलरशिप में मिल जाता था।

कम है स्कॉलरशिप

तीस साल बाद मुझे एनटीएस की खबर लेने का मौका मिला। इस स्कॉलरशिप को चलाने वाली संस्था एनसीईआरटी ने मेरे आग्रह पर इसकी समीक्षा के लिए एक समिति बनाई और मुझे उसमें शामिल कर दिया। तीस साल में इस स्कॉलरशिप की संख्या बढ़ गई थी। इसकी परीक्षा पूरे देश में राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तर पर हो रही थी। लेकिन तीस साल में जहां लेक्चरार की तनख्वाह तीस-पैंतीस गुणा बढ चुकी थी, वहीं एनटीएस सिर्फ 500 रुपए मासिक पर अटकी हुई थी। कमेटी में जब इस राशि को बढ़ाने की बात आई सब बाबू लोगों ने इसका विरोध किया, पैसे की कमी का तर्क दिया। किसी तरह कमेटी ने स्कॉलरशिप राशि बढ़ाने का प्रस्ताव माना और मंत्रालय से अनुनय-विनय, सिफारिश और धमकी बाद कटौती के साथ प्रस्ताव मंजूर हुआ। आज एनटीएस में बीए/बीएससी में 2000 रुपए और एमए में 3000 रुपए मासिक हैं।

इस बढ़ोतरी के बावजूद पिछले 40 साल में जहां लेक्चरार की तनख्वाह 50 गुणा बढ़ी है, विद्यार्थियों की स्कालरशिप सिर्फ आठ से बारह गुणा बढ़ी है। किसी साधारण परिवार का बच्चा सिर्फ स्कॉलरशिप के सहारे हॉस्टल में रहकर पढऩे की सोच भी नहीं सकता। यह कहानी केवल राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृति की नहीं है। देश भर में छात्रवृत्तियों का यही हाल है।

शिक्षा में अमीरों को आरक्षण

आरक्षण पर बहुत बहस होती है, लेकिन देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था अमीर घर के बच्चों के लिए है। इस आरक्षण पर बहस नहीं होती। संख्या की दृष्टि से देश की सबसे बड़ी छात्रवृति योजना है मीन्स-कम-मेरिट स्कॉलरशिप। पिछली सरकार के दौरान अपूर्व विस्तार के बावजूद इस योजना में कक्षा नवीं से बाहरवीं तक पढऩे वाले लगभग छह करोड़ बच्चों में से चार लाख जरूरतमंद बच्चों को स्कॉलरशिप दी जाती है।

पता है कितनी? सिर्फ 500 रुपए प्रतिमाह। और वह भी बढ़ोत्तरी के बाद की स्थिति है। बाकी जितनी भी योजनाएं हैं वो ऊंट के मुंह में जीरा जैसी हैं। योजनाओं को गिनने लगें तो लंबी सूची बन जाएगी। अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए अनेक स्कॉलरशिप योजना हैं, कुछ एकल लड़की के लिए तो कोई अल्पसंख्यक या विस्थापित के लिए। लेकिन सब को जोड़ दें तो एक प्रतिशत विद्यार्थी को भी नहीं मिलती स्कॉलरशिप। जो स्कॉलरशिप सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए है, उसकी राशि उतनी ही कम है! जिस स्तर पर इसकी जरूरत सबसे ज्यादा होती है, यानी स्कूल के बाद घर छोड़कर बीए/मेडिकल/इंजीनियरिंग की पढ़ाई के वक्त, वहीं स्कॉलरशिप की संख्या सबसे कम है। इस नियम के दो अपवाद हैं। एक तो विज्ञान और तकनीक विभाग द्वारा युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन देने वाली \’इंस्पायरÓ स्कॉलरशिप, जो अकसर आईआईटी जैसी संस्थाओं में पढऩे वाले विद्यार्थियों को मिलती है। देश का शासक वर्ग अपने बच्चों का खयाल रखते हुए इंस्पायर स्कॉलरशिप में 6650 रु. मासिक देता है।

दूसरा अपवाद है पीएचडी के लिए जूनियर-सीनियर रिसर्च फेलोशिप, जिसे पास करने वालों को 17000 रु. से 20,000 रु.मासिक मिलते हैं। यूजीसी के खिलाफ धरना इसी से सम्बंधित है। करीब पांच साल पहले यूजीसी ने फैसला किया था कि जो विद्यार्थी इस टेस्ट को पास न कर पाएं लेकिन एमफिल और पीएचडी में दाखिले की शर्तें पूरी करते हों, उन्हें गुजारे के लिए 5000 रुपए मासिक की \’नॉन-नेटÓ स्कॉलरशिप दी जाएगी। योगेंद्र यादव राजनीतिक विश्लेषक

एक फीसदी को भी नहीं छात्रवृत्ति अपने आप को जनकल्याणकारी, समाजवादी और न जाने क्या कुछ कहने वाले इस देश में एक प्रतिशत विद्यार्थियों को भी स्कॉलरशिप नहीं मिलती। जिन्हें मिलती भी है तो इतनी कम कि न्यूनतम खर्च भी नहीं निकलता। अमरीका जैसा घोर पूंजीवादी देश हमारे से कई गुना ज्यादा फीसदी बच्चों को पूरे खर्चे की स्कॉलरशिप देता है। हमारे यहां सरकारी स्कूलों की फीस तो न के बराबर है पर मां-बाप बच्चों को जिन निजी स्कूलों में भेजना चाहते हैं उनकी फीस तक भी स्कॉलरशिप से नहीं भरी जा सकती। शिक्षा में भी बाजार का क्रूर कानून लागू है।

सवाल व्यक्ति, पार्टी या सरकार की बेरुखी का नहीं है। यह सवाल मौजूदा व्यवस्था की संवेदनहीनता का है। इसे भीतर से सुधारा नहीं जा सकता, इसे बाहर से तोडऩा पड़ेगा। यूजीसी के सामने चल रहा धरना इस संघर्ष की शुरुआत हो सकता है। इस संघर्ष को शिक्षा में समान अवसरों के संघर्ष में बदलना होगा।

कमेटी का उलटा काम

शुरू में नॉन-नेट स्कॉलरशिप सिर्फ केंद्रीय विश्वविद्यालय और फिर कुछ चुनिंदा राज्य विवि. में लागू किया गया। पर इसका विस्तार करने का वक्तआया तो यूजीसी ने बिना कारण बताए इस योजना को बंद कर दिया। अब सरकार एक कमेटी बिठाकर वक्त गुजारने का खेल खेल रही है। मजे की बात यह है कि इस मसले पर बनी कमेटी को इस स्कॉलरशिप की राशि बढ़ाने का काम दिया गया था, उलटे उसने इसे बंद कर दिया। और शर्म की बात यह है कि जिस बैठक में यूजीसी ने यह फैसला लिया, उसी बैठक में आयोग ने अपने सदस्यों के हर मीटिंग में बैठने के भत्ते को 2,000 रुपए से 5,000 रुपए कर लिया।

 प्रभात खबर

उजड़ गयी राजू की दुनियां

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गोपालगंज) : देवान परसा में अज्ञात बीमारी कहर बन कर टूट पड़ी है. इस बीमारी जहां एक मां की गोद सुनी कर दी है, तो वहीं एक पिता अपने बच्चों का अंतिम दर्शन भी नहीं कर सका. दिल दहला देने वाले इस घटना का गवाह बना देवान परसा आज रो रहा है. बता दें कि देवान परसा दलित टोले में सरकारी सुविधाएं न के बराबर है.

इसी दलित टोले में इंद्रदेव राम का परिवार रहता है. इंद्रदेव राम की मौत कुछ वर्षों पूर्व ही हो चुकी थी. इंद्रदेव राम के पुत्र राजू राम एवं राजेश राम दोनों काफी हंसी खुशी से जिंदगी व्यतीत कर रहे थे. राजू की शादी सात वर्ष पूर्व सरस्वती देवी के साथ हुई थी. शादी बाद उसे तीन बच्चे प्रीतम, मुनमुन और प्रीति हुए. खर्च बढ़ा तो राजू कमाने बाहर चला गया.

सरस्वती अपने तीनों बच्चों के साथ काफी खुश थी. लेकिन उसकी खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक पायी. देवान परसा गावं के दलित बस्ती में अज्ञात बीमारी ने घर बना कर सबसे पहले उसके ही दोनों बच्चों को अपना शिकार बना लिया. पहले बच्चे प्रीतम कुमार की मौत 28 अक्तूबर को हुई, जबकि बेटी प्रीति कुमारी की मौत 29 अक्टूबर को हो गयी.

इस दर्दनाक हादसे के बाद सरस्वती की हालत काफी खराब है. वहीं पिता राजू के भाई राजेश राम के बेटे सोनू क ी मौत भी गुरूवार को हो गयी. इसके साथ ही उसके दो और बच्चे इस बीमारी के शिकार हो गये. राजेश के बाहर रहने के कारण वो अपने बच्चे का अंतिम दर्शन भी नहीं कर सका. फिलहाल इस घटना के बाद अभी तक पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा है.

राजेस्थान पत्रिका

दलित पर टिप्पणी करने वाले मंत्री का फूंका पुतला

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 श्रीगंगानगर अनुसूचित जाति, जनजाति आरक्षण मंच ने गुरुवार को  केन्द्रीय मंत्री वीके सिंह पर दलित विरोधी टिप्पणी करने के विरोध में कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर केन्द्रीय मंत्री का पुतला फूंका। उन्होंने जिला कलक्टर के मामध्य से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर मंत्री को हटाने की मांग भी की।

मंच के जिलाध्यक्ष कालूराम मेघवाल ने बताया कि ज्ञापन में प्रधानमंत्री को अवगत कराया कि पिछले महीने हरियाणा में केन्द्रीय मंत्री वीके सिंह का दलित समाज को निशाना बनाने वाला बयान सामने आया। मानवता को शर्मसार करने वाले एेसे  बयान के लिए सरकार जिम्मेवार है। जिला महामंत्री सुरेश नागर, रमेश बंसल, सोहनलाल निर्वाण, अभयराम गहलोत, रघुवीर परिहार, शिवलाल भाटी, महेन्द्रसिंह लाटसाहब, श्रवण रेगर, रामकुमार पंवार, कश्मीरी इन्दौरा, राजकुमार खींची, रामकुमार मेघवाल आदि प्रदर्शन में शामिल हुए।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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