दलित मीडिया वांच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 23.09.15

खान माफिया हथिया रहे दलितों की बेशकीमती जमीन – पत्रिका

http://www.patrika.com/news/bhilwara/dalits-occupy-prime-land-mafia-are-mine-1107131/

ग्रामीण मजदुर यूनियन ने किया चक्का जाम – पंजाब केसरी

http://punjab.punjabkesari.in/moga/news/article-397597

दौलतखेड़ा में खुलेगा सिलाई प्रशिक्षण केंद्र – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-MAT-latest-mangliyawas-news-053534-2700079-NOR.html

अब तो उबरें बीमार मानसिकता सेदैनिक ट्रिब्यून

http://dainiktribuneonline.com/2015/09/अब-तो-उबरें-बीमार-मानसिकत/

Save Dalit Foundation:

Educate, agitate & organize! – Dr. Ambedkar.

Let us all educates to agitate & Organize to Save Dalit Foundation !         

Please sign petition for EVALUATION of DF by click this link : https://t.co/WXxFdysoJK

पत्रिका

खान माफिया हथिया रहे दलितों की बेशकीमती जमीन

http://www.patrika.com/news/bhilwara/dalits-occupy-prime-land-mafia-are-mine-1107131/

भीलवाड़ा। जिले के बिजौलिया खनन क्षेत्र में सैण्डस्टोन के रूप में सोना निकल रहा है। इसके लिए करोड़ों की बेशकीमती जमीनों को क्षेत्र के भूमि व खान माफिया कोडियों के दाम खरीद रहे हैं। उच्चतम न्यायालय के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए दलितों की जमीन को फर्जी तरीके से हथिया कर खनिज विभाग के अधिकारियों व ग्रामदानी कारिंदों की मिलीभगत से खातेदारी भूमि पर खान के एग्रीमेंट किए गए।

बिजौलिया उपखण्ड के ग्रामदानी गांव काटबड़ा के निरक्षर और गरीब भील जाति के लोग करोड़ों की जमीनों के मालिक होते हुए भी फटे हाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं, वहीं इनकी जमीनों को हथिया कर भूमाफिया, सरकार एवं ग्रामदान बोर्ड के कारिंदे करोड़पति होते जा रहे हैं। क्षेत्र की 25 बीघा खातेदारी भूमि के एग्रीमेंट की बाजार कीमत लगभग 7.10 करोड़ रूपए तक आंकी जाती है।

खातेदारी भूमि के एग्रीमेंट के दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताएं व भ्रष्टाचार हुए। ग्रामदानी गांव काटबड़ा में एक क्वारी लाइसेंस के लिए 25 बीघा खातेदारी भूमि के एग्रीमेंट मामले में खनिज विभाग व ग्रामदानी पटवारी ने उच्चतम न्यायालय के उस आदेश की अवहेलना की है, जिसके तहत खनन क्षेत्र का नदी, नाला, आबादी, विद्यालय, सड़क व हाईटेंशन लाइनों से 45 मीटर दूर होना आवश्यक है। एग्रीमेंट में ऎरू नदी से सटी आराजी भी शामिल हैं, जो गांव के नक्शे व जमाबंदी में दर्ज है। इसके बावजूद खनिज विभाग ने एग्रीमेंट मान लिया।

इसी तरह की अनियमितताएं एक अन्य एग्रीमेंट में भी सामने आई है। इसमें एनीकट भूमि ही खातेदारी में दे दी गई। सिंचाई व राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज सिंचाई नहरों को नजर अंदाज कर एग्रीमेंट किए गए। खननकर्ताओं द्वारा नहरों को तोड़ कर वष्ाोü से खनन करना जारी है। ग्रामदानी का मामला कपासन विधायक अर्जुनलाल जीनगर ने 2014 को विधानसभा में भी उठाया था, लेकिन इस मामले की जांच तक नहीं हो सकी।

पंजाब केसरी

ग्रामीण मजदुर यूनियन ने किया चक्का जाम

http://punjab.punjabkesari.in/moga/news/article-397597

मोगा(ग्रोवर): पिछले लंबे समय से मजदूर वर्ग की लटकती मांगों के हल के लिए आज ग्रामीण मजदूर यूनियन द्वारा मोगा-बरनाला रोड पर गांव बुघीपुरा के पास चक्का जाम करके सरकार के खिलाफ नारेबाजी की गई। 

इस दौरान मजदूरों ने घोषणा की कि जितनी देर मजदूरों की लटकती मांगों का हल नहीं किया जाता उतनी देर संघर्ष को जारी रखा जाएगा। धरने को संबोधित करते जत्थेबंदी के नेता भरपूर सिंह रामा ने कहा कि केन्द्र व पंजाब सरकार पर पिछले 60 सालों से राज करती सरकारों ने हमेशा ही दलित वर्ग से झूठे वायदे करके वोटें हासिल की हैं, जबकि किसी सरकार ने भी दलितों की सुध तक नहीं ली। इस मौके पर जिला महासचिव दलजीत सिंह रोडे, सुरजीत सिंह डाला, गुरचरण सिंह मैहना, पूर्ण सिंह बुघीपुरा, गुरमेल सिंह तखानवध मौजूद थे।

दैनिक भास्कर

दौलतखेड़ा में खुलेगा सिलाई प्रशिक्षण केंद्र

http://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-MAT-latest-mangliyawas-news-053534-2700079-NOR.html

मांगलियावास| दलितमहिला मंच के तत्वावधान ने मांगलियावास ग्राम पंचायत के दौलत खेड़ा गांव में सिलाई प्रशिक्षण केंद्र खोला जाएगा। बैठक की अध्यक्षता दलित महिला मंच की समन्यवक इंद्रा सोलंकी ने की। ब्लॉक को-ऑर्डिनेटर कैलाश चिड़ीवाल ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं को बताया कि सिलाई प्रशिक्षण के दौरान सिलाई के गुर विधियों पर प्रकाश डाला जाएगा। सोलंकी ने बताया कि योजना का मकसद ग्रामीण स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराकर उनका पलायन रोकना है। बैठक में दलित अधिकार केंद्र के जिला समन्वयक रमेश बंसल, सुमन, रेखा देव समेत ग्रामीण मौके पर उपस्थित थे।

दैनिक ट्रिब्यून

अब तो उबरें बीमार मानसिकता से

http://dainiktribuneonline.com/2015/09/अब-तो-उबरें-बीमार-मानसिकत/

आधी सदी से भी अधिक पुरानी बात है। राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे में रहता था मैं। सिर पर मैला ढोने की प्रथा वहां आम थी। और मैला ढोने वाले को छूना भी पाप है, यह बात एक स्वाभाविक रूप में सोच का हिस्सा थी। मैला ढोना, मरे हुए जानवरों को ठिकाने लगाना, चमड़े का काम करना जैसे काम, भले ही समाज के लिए कितने ही ज़रूरी क्यों न थे, उन्हें ‘छोटा’ ही नहीं, घटिया समझा जाता था। जिस जाति-व्यवस्था में हमने अपने समाज को ढाला हुआ था, उसमें छुआछूत जैसा व्यवहार करने वाला, और जिसके साथ यह व्यवहार होता है, वह भी, इसे स्वाभाविक मान कर ही चलता था।

हालांकि महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान ही सफाई करने वालों को हरिजन नाम देकर एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत की थी, पर बहुत जल्दी ही यह ‘हरिजन’ शब्द भी वही अर्थ देने लगा था, जिससे बचने के लिए गांधीजी ने यह कोशिश की थी। वैयक्तिक और सामूहिक संस्कारों के चलते यह सब सामान्य लगता था। यह सब यानी कथित ‘घटिया’ काम करने वालों को नहीं छूना, उन्हें गांव के कुएं से पानी न भरने देना, उनके द्वारा काम में लिये जाने वाले बर्तनों को, घर में या चाय की दुकानों पर अलग रखना, उन्हें मंदिरों में प्रवेश न करने देना, स्कूल में उनका बाकी बच्चों से अलग बैठना, उनकी बस्तियों का अलग-थलग होना आदि बातें तब मुझे चौंकाती नहीं थीं।

चौंकाया मुझे उस बात ने जब एक दिन मैंने घर का मैला ढोने वाले को यह कहते सुना कि कपड़े धोने वाले, अर्थात धोबी उनसे नीची जाति के हैं, वे धोबियों का हाथ का छुआ नहीं खाते। पर उम्र के साथ ज्ञान भी बढ़ता गया। समझ भी। समझ में आ गया कि तथाकथित छोटे-बड़े काम के आधार पर और समाज की सोच का हिस्सा बनी जाति-प्रथा के आधार पर मनुष्य और मनुष्य में भेद करना ग़लत है। और हमारे संविधान में तो छुआछूत को धारा 17 के अनुसार अपराध भी घोषित किया जा चुका है।

शहरों में, खासकर बड़े शहरों में, यह छुआछूत अब सामान्यतः दिखाई नहीं देती। लेकिन जो दिखता है, कोई ज़रूरी नहीं कि वह वैसा ही हो। शहरी-जीवन की स्थितियों ने, शिक्षा के कारण आ रहे विचार-परिवर्तन आदि ने भले ही कुछ बदलाव आता दिखाया हो, पर अभी हमारा समाज छुआछूत की मानसिकता से मुक्त नहीं हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में, और कुछ शहरी क्षेत्रों में भी, इस छुआछूत के परिणामों से जुड़ी घटनाएं अकसर घटती रहती हैं। दलित समाज आज भी समाज के सबसे निचले पायदान पर है। गांव की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं है। आज भी सामान्यतः उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में अकसर दलित बच्चों से सफाई करायी जाती है; दलितों के घोड़े पर बैठकर बारात निकालने का विरोध होता है। इस आशय के समाचार अकसर मीडिया में दिखते हैं।

कहा यह जाता है कि इसे अपवाद मान लिया जाये। पर यह अपवाद है नहीं। इण्डिया ह्यूमन डेवलेपमेंट सर्वे की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार देश की 27 प्रतिशत आबादी आज भी छुआछूत में विश्वास करती है!
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकानोमिक रिसर्च तथा यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड द्वारा किये गये इस सर्वेक्षण के नतीजे कुछ अर्सा पहले ही घोषित हुए हैं। सर्वेक्षण में पहला सवाल पूछा गया था, ‘क्या आपके परिवार का कोई व्यक्ति छुआछूत बरतता है?’ इस प्रश्न का जवाब देने वालों में से 27 प्रतिशत ने प्रश्न के उत्तर में ‘हां’ कहा था। यह माना जा सकता है कि इतने सीधे सवाल का सही जवाब कई बार लोग नहीं देते। अतः इस 27 प्रतिशत को 30 प्रतिशत तो माना ही जा सकता है। अर्थात देश के लगभग एक-तिहाई लोग आज भी छुआछूत को मानते हैं । सर्वेक्षण के अनुसार शहरी इलाकों में छुआछूत मानने वालों का प्रतिशत 20 है। यानी देश का हर पांचवां शहरी आज भी छुआछूत की भावना से उबरा नहीं है। हां, ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत 30 है। इसका मतलब यह हुआ कि 27 प्रतिशत भारतीय खुलेआम छुआछूत को स्वीकार रहे हैं।

छुआछूत की यह अवधारणा किस गहराई तक समूचे भारतीय समाज में धंसी हुई है, इसका उदाहरण राजस्थान के उस कस्बे का वह धोबी ही नहीं था, जो मैला ढोने वाले की दृष्टि में उससे नीचा था। इस सर्वेक्षण ने यह भी बताया कि छुआछूत में विश्वास करने वालों में ब्राह्मणों के बाद जिस वर्ग का स्थान है, वह है ओबीसी अर्थात अन्य पिछड़ी जातियां। सर्वेक्षण में ओबीसी तबके के 15 प्रतिशत लोगों ने छुआछूत में विश्वास करने की बात स्वीकारी थी। 35 प्रतिशत जैन छुआछूत को मानते हैं, 30 प्रतिशत हिंदू। यही नहीं, हिंदू समाज की कुरीतियों से उबरने के लिए सिख और मुसलमान बने लोगों में भी क्रमशः 23 और 18 प्रतिशत लोग छुआछूत से नहीं उबर पाये हैं।

सवाल मानसिकता को बदलने का है। इसके लिए समस्या की जड़ में जाने की ईमानदार कोशिश करनी होगी। सदियों से हमारी सामाजिक सोच का हिस्सा बनी छुआछूत को मिटाना है तो उस जाति-प्रथा को भी बदलना होगा, जो मनुष्य को ऊंचा या नीचा समझने का भ्रम देती है। यह सही है कि शिक्षा के प्रसार ने स्थितियों को बहुत हद तक बदला है, पर सवाल स्थितियों के कुछ बदलने का नहीं, आमूलचूल परिवर्तन का है। मनुष्य की समानता को बौद्धिक और भावनात्मक स्तर पर स्वीकारने का है।

महात्मा गांधी ने कहा था, “यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं अछूत पैदा होना चाहूंगा, ताकि मैं उनके दुखों, कष्टों और अपमानों का भागीदार बनकर स्वयं को और उन्हें इस दयनीय स्थिति से छुटकारा दिलाने का प्रयास कर सकूं।’

बचपन में ही, जब मां ने उनसे कहा, “इस बच्चे को मत छूना, यह अछूत है।’ गांधीजी ने पलटकर पूछा था, ‘क्यों न छूऊं?’ इस सवाल को गांधीजी ने अपने भीतर एक “विद्रोह का प्रारंभ’ कहा है। गांधीजी ने यह भी कहा था कि ‘भारत की जनसंख्या के पांचवें हिस्से को सदा के लिए पराधीन रखना चाहें और उन्हें राष्ट्रीय संस्कृति की उपलब्धियों से वंचित रखें, तो स्वराज्य बेकार है।’ उन्होंने तो यहां तक कहा था कि ‘हिंदू धर्म के सुधार और संरक्षण के लिए छुआछूत को मिटाना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है…। अगर छुआछूत कायम रहती है तो हिंदू धर्म को खत्म हो जाना चाहिए।’
राष्ट्रपिता के ये शब्द आने वाली पीढ़ी के लिए एक चुनौती हैं। यदि हमें सही अर्थों में मनुष्य बनना है, मनुष्य बने रहना है तो छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ लड़ना होगा। एक बीमार मानसिकता से उबरना होगा। यह एक अच्छी बात है कि 70 प्रतिशत भारतीय छुआछूत में विश्वास नहीं करते, पर यह सच्चाई डराने वाली है कि 30 प्रतिशत अभी भी कुछ मनुष्यों को ‘कम मनुष्य’ मानते हैं।‘कम मनुष्य’ मानने वालों की संख्या शून्य कब होगी? जब ऐसा होगा तभी हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी होंगे। पर ऐसा तब होगा जब हममें से हर एक अस्पृश्यता के अभिशाप से मुक्त होने का संकल्प ले। कब ले रहे हैं आप यह संकल्प?

बिंदास न्यूज़

आरक्षण के खिलाफ संघ और पत्रिका का साझा षडीयंत्र

http://bhadas4media.com/news/sabkuchh/2865-sangh-patrika-ka-shadyantra

सारा देश जानता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अर्थात् आरएसएस भारत के अनार्य-वंचित दलित-आदिवासी-पिछडें और अल्पसंख्यक मोस (MOSS=Minority+OBC+SC+ST) वर्गों को किसी भी सूरत में सबल नहीं होने देना चाहता है। संघ की ओर से लगातार इस देश को आर्य-अनार्य में विभाजित करने के लिये नये-नये रास्ते खोजे जाते रहे हैं। अनार्यों को कमजोर करने के लिये मुसलमानों के खिलाफ कट्टर हिन्दुत्व की आग सुलगाने के पीछे भी वंचित वर्गों को हमेशा के लिये मनुवादी व्यवस्था का अनुगामी और गुलाम बनाये रखने की खतरनाक नीति है।

खुशी की बात है कि शिक्षित-दलितों को संघ की इस अनार्य-विरोधी-सुनियोजित-योजनाओं का अहसास होता जा रहा है। वनवासी, गिरवासी एवं वनबन्धु की गाली झेलते-झेलते आदिवासी भी धीरे-धीरे अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये संघ की दिखावटी योजनाओं के पीछे छिपे जहरीले इरादों को समझने लगे हैं।

देशभर की ओबीसी जातियां और मीणा आदिवासी जाति के लोग संघ के वास्तविक किन्तु छिपे हुए ऐजेण्डे को समझने को अभी भी तैयार नहीं हैं। जबकि-

  1. संघ द्वारा संचालित पार्टी के निर्णयों के मार्फत ओबीसी गुर्जरों को (राजस्थान में) संघ और उनकी राजनैतिक पार्टी की छद्म नीति ज्ञात हो चुकी हैं।
  2. मनुवादी वर्चस्व वाली न्यायिक व्यवस्था बिना असंदिग्ध आंकड़ों और सूचनाओं के जाटों को ओबीसी से निष्कासित करने का फरमान जारी कर चुकी है।
  3. मनुवादी शक्तियां ओबीसी को विधायिका और सरकारी नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने हेतु संविधान संशोधन करने के विरुद्ध हैं।
  4. राजस्थान की मीणा जनजाति को जनजातियों की सूची से बाहर करने का मुनवादी षड़यंत्र जारी है।
    संघ की पाठशाला के शिष्य को राजस्थान सरकार में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री बना रखा है। जो अजा एवं अजजा वर्गों को सामाजिक न्याय उपलब्ध करवाने के स्थान पर, हाई कोर्ट परिसर में आयोजित सामाजिक न्याय विषयक एक सेमीनार में सार्वजनिक रूप से आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करने की हिमायत कर चुके हैं।

राजस्थान सरकार के कथित मौखिक आदेशों के आधार पर मीणा जनजाति को जनजाति प्रमाण-पत्र पर रोक लगा चुके हैं। दलित, आदिवासी और ओबीसी विरोधी खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिये प्रतिबद्ध तथा संघ और संघ संचालित भारतीय जनता पार्टी की कट्टर हिन्दुत्व एवं मनुवादी विचारधारा को राजस्थान सहित देशभर में जबरदस्त तरीके से स्थापित करने वाली राजस्थान पत्रिका और संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आरक्षण को समाप्त करने पर भारतीय लोकतंत्र में मंत्रणा करना दु:खद और आश्‍चर्यजनक घटना है।

मोहन भागवत और राजस्थान पत्रिका के गुलाब कोठारी दोनों ही किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं। दोनों को संविधान के विरुद्ध बयान जारी करने का कोई हक नहीं है। इसके उपरान्त भी मोहन भागवत तथा गुलाब कोठारी संविधान सम्मत आरक्षण व्यवस्था को तहस-नहस करने पर चर्चा कर बयान जारी करते हैं और इस बारे में पत्रिका के मुखपृष्ठ पर असंवैधानिक तथा आम जन को उकसाने और भड़काने वाली शब्दावली में खबर प्रकाशित की जा रही है।

समाज में इस प्रकार का माहौल निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है, जैसे कि संविधान के प्रावधानों के तहत प्रदान किया गया आरक्षण इस देश की सबसे बड़ी समस्या हो। दु:खद आश्‍चर्य तो इस बात का है कि इसके उपरान्त भी पत्रिका का बहुसंख्यक ओबीसी-दलित और आदिवासी पाठक वर्ग यह सब चुपचाप देख रहा है। ऐसा सन्नाटा पसरा हुआ है, जैसे पत्रिका और संघ के खिलाफ आवाज उठाना देश के संविधान के विरुद्ध आवाज उठाने जैसा दुरूह और अवैधानिक कार्य हो!

मोहन भागवत सार्वजनिक रूप से जोधुपर में घोषणा करते हैं कि-‘‘आरक्षण के खिलाफ प्रत्येक समाज खड़ा हो रहा है।’’ संघ अपने लोगों को प्रायोजित तरीके से आरक्षण के खिलाफ खड़ा करता है, जिनके बारे पत्रिका जैसे अखबारों में प्रचार-प्रसार करवाया जाता है और इसके बाद खुद संघ प्रमुख देश-विदेश की जनता को भ्रमित करने वाला बयान देते हैं कि-‘‘आरक्षण के खिलाफ प्रत्येक समाज खड़ा हो रहा है।’’ आखिर भागवत का प्रत्येक समाज से आशय क्या है? क्या केवल विदेशी आर्यों के वंशज ही प्रत्येक समाज हैं। इस देश के नब्बे फीसदी अनार्य-मोस वर्ग अर्थात-मुस्लिम, ओबीसी, दलित और आदिवासियों को आरक्षण की सख्त दरकार है। जिसके दो मायने हैं- पहला नब्बे फीसदी अनार्य-मोस वर्गों का आरक्षण को लेकर किसी प्रकार को विरोध नहीं है। दूसरे शेष बचे आरक्षण विरोधी दस फीसदी आर्य सम्पूर्ण समाज नहीं हो सकते हैं। ऐसे में संघ प्रमुख मोहन भागवत को इस बारे में भी तो मुख खोलना चाहिये कि आखिर आरक्षण की जरूरत ही क्यों पड़ी? उन कारणों के बारे में विचार मंथन क्यों न किया जाये, जिनकी वजह से संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी है।

राजस्थान के डांगावास में दलितों की सार्वजनिक हत्याओं एवं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान, झारखंड, उड़ीसा आदि प्रदेशों में आदिवासी स्त्री-पुरुषों के ऊपर किये जाने वाने अत्याचारों और अमानवीय व्यवहारों के बारे में संघ प्रमुख-कभी गुलाब कोठारी से मंत्राणा क्यों नहीं करते हैं? गुलाब कोठारी की कलम आरक्षण को समाप्त किये जाने के लिये तो चलती है, लेकिन कभी भी शोषक, अत्याचारी और सामन्ती व्यवस्था के खिलाफ लिखने में क्या उनके हाथ कांपने लगते हैं? संघ और संघप्रिय मीडिया ने संविधान को मजाक बना रखा है। केन्द्र सरकार ने अमानवीय मनुवादी व्यवस्था को बढावा देने के लिये संघ प्रमुख एवं संघ समर्थक कथित योगगुरू बाबा रामदेव को राष्ट्रीय खजाने के विशेष सुरक्षा मुहैया करवा रखी है। इससे इन लोगों को अपनी असंवैधानिक और अवैज्ञानिक विचारधारा को फैलाने में सुविधा मिल रही है। राजस्थान पत्रिका सहित कुछ समाचार-पत्र इनके रुग्ण विचारों का प्रचार-प्रसार करने में लगे हुए हैं। कुल मिलाकर किसी भी सूरत में देश को आर्यों के सम्पूर्ण कब्जे में लाकर मुस्लिम, ओबीसी, दलित और आदिवासी वर्गों को अधिकार विहीन-गुलाम बनाने के सुनियोजित षड़यंत्र पर काम चल रहा है। अत: अब संघ एवं पत्रिका द्वारा मिलकर मोस वर्गों के खिलाफ चलाये जा रहे संविधानेत्तर क्रियाकलापों की खिलाफत करने की सख्त जरूरत है। अब वंचित मोस वर्ग के जागने का वक्त आ गया है। अब संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को बचाने का वक्त आ गया है।

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