दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 18.09.15

दलित युवती को अश्लील विडिओ भेजकर कहे जाती सूचक शब्द – पंजाब केसरी

http://haryana.punjabkesari.in/panipat/news/article-395943

दो सगे भाइयों समेत तीन को उम्रकैद – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/shahjahanpur/shahjahanpur-crime-news/including-two-brothers-three-life-hindi-news/

पंचायत सचिव पर लगाया अपमान करने का आरोप – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/MP-CHHT-MAT-latest-chhatarpur-news-021005-2665461-NOR.html

श्मशान घाट और चरनोई की भूमि पर दबंगों का कब्जा – नई दिनिया

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/shivpuri-shivpuri-news-480462

सरकारी क्षेत्र में बढ़ाया जाए आरक्षण, निजी में भी लागू हो – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/MP-MUR-MAT-latest-morena-news-033044-2666575-NOR.html

टेरर पॉलिटिक्स पर वार करती ऑपरेशन अक्षरधाम – हस्तक्षेप

http://www.hastakshep.com/book-review/2015/09/17/टेरर-पॉलिटिक्स-पर-वार-करत

बिहार में बिल गेट्स के गांव की ये है हालत, बाकी गांवों का पूछिए मत..! – आई बी एन खबर

http://khabar.ibnlive.com/blogs/nawal/bihar-assembly-election-2015-409962.html

Save Dalit Foundation:

Educate, agitate & organize! – Dr. Ambedkar.

Let us all educates to agitate & Organize to Save Dalit Foundation !

Please sign petition for EVALUATION of DF by click this link : https://t.co/WXxFdysoJK

पंजाब केसरी

दलित युवती को अश्लील विडिओ भेजकर कहे जाती सूचक शब्द

http://haryana.punjabkesari.in/panipat/news/article-395943

दलित युवती के व्हटस-अप पर एक युवक के द्वारा अश्लील  वीडियों भेजने और जातिसूचक शब्द बोलने का मामला सामने आया है। पीड़ित युवती के पिता ने आरोपी युवक के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है।

मामला कुलदीप नगर का है, जहां कुलदीप नगर की ही रहने वाली युवती को कालोनी का ही रहने वाला रोहित पिछलें कई दिनों से व्हट्स-अप पर अश्लील वीडिय़ों और जाति-वाचक शब्द भेज कर परेशान कर रहा था। पहले तो युवती ने आरोपी युवक की हरकतों को काफी नजरअंदाज किया, लेकिन आरोपी के हौंसले काफी बढ़ते देख इस बारे में अपने पिता से बात की। पिता ने मॉडल टाऊन पुलिस थाने में आरोपी युवक रोहित के खिलाफ शिकायत दी है। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। फिलहाल आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। 

अमर उजाला

दो सगे भाइयों समेत तीन को उम्रकैद

http://www.amarujala.com/news/city/shahjahanpur/shahjahanpur-crime-news/including-two-brothers-three-life-hindi-news/

कोर्ट ने दो सगे भाइयों समेत तीन लोगों को उम्रकैद और बीस-बीस हजार रुपये अर्थ दंड की सजा सुनाई है, जबकि एक आरोपी की पहले ही मौत हो गई थी। उन्होंने अवैध संबंधों का विरोध करने पर दो अक्तूबर 2003 को चार लोगो की सरेआम हत्या कर दी थी।

सिंधौली थाना क्षेत्र के लखराम निवासी युनूस खां गांव के ही बालकराम के घर आता-जाता था। उसी दौरान यूनुस खां के उस परिवार की एक महिला से अवैध संबंध हो गए थे। इससे गांव में बिरादरी की हुई बदनामी का हवाला देते हुए गयादीन जाटव ने ऐतराज जाहिर किया था। उन्होंने बालकराम के यहां आवाजाही ना करने के लिए यूनुस को समझाया। इसके करीब सप्ताह भर बाद दो अक्तूबर 2003 की शाम साढ़े सात बजे गांव के निकट सुनसान खेतों की पगडंडी पर यूनुस ने तीन अन्य लोगों के साथ मिलकर गयादीन को घेर लिया और लाठी-डंडे से प्रहार कर जमीन पर गिरा दिया। फिर उसे खींचते हुए यूनुस के घर में ले जाया गया। वहां मो. शेर खां और सरदार खां ने मिलकर गयादीन को जमीन पर गिराकर पकड़े रखा और यूनुस व उसके भाई नबी शेर ने बांके से उसके शरीर के कई टुकड़े कर दिए।

इस घटना की सूचना से इलाके में सनसनी फैल गई। लाश को सामने रखकर मृतक के पिता स्वामी दयाल ने सिंधौली थाने में चारों आरोपियों के खिलाफ नामजद तहरीर दी थी। उसके आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 302, एससी एसटी एक्ट आदि के तहत मुकदमा दर्ज किया था। अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय पीके चौरसिया ने गवाहों, साक्ष्यों और बचाव पक्ष के वकील के साथ ही सरकारी वकील सुनील कुमार सिंह के तर्को को सुनने के उपरांत कोर्ट ने जीवित नामजद तीनों आरोपियों को दोषी पाया। कोर्ट ने बृहस्पतिवार को आरोपी पक्ष के दो सगे भाइयों समेत तीन को दोषी सिद्ध पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई और 20-20 हजार रुपये का अर्थदंड मुकर्रर किया। अर्थदंड के रूप में जमा होने वाली राशि में आधी रकम मृतक के पिता स्वामी दयाल को दिए जाने का निर्देश दिया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक नामजद आरोपी शेर खां की मौत हो चुकी है।

दैनिक भास्कर

पंचायत सचिव पर लगाया अपमान करने का आरोप

http://www.bhaskar.com/news/MP-CHHT-MAT-latest-chhatarpur-news-021005-2665461-NOR.html

 छतरपुर| बिजावर थाना के ग्राम नया ताल निवासी एक दलित व्यक्ति ने ग्राम पंचायत सचिव मनोज विश्वकर्मा पर गाली गलौज कर आपमानित कर कार्यालय से भगा देने के आरोप लगाते हुए हरिजन थाना छतरपुर में शिकायत की है। नयाताल निवासी खेमचंद्र अहिरवार पिता हरदास अहिरवार ने पुलिस को बताया कि गत 9 सितंबर को दोपहर 2 बजे वह प|ी मीरा बाई के साथ पंचायत कार्यालय पहुंचा, पंचायत सचिव मनोज विश्वकर्मा से अपना व प|ी का आधार कार्ड बनाने की बात कही। इस पर वे भड़क उठे और बोले तुम लोग कुर्सी पर कैसे बैठे तथा गाली गलौज कर भगा दिया। 

 नई दिनिया

श्मशान घाट और चरनोई की भूमि पर दबंगों का कब्जा

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/shivpuri-shivpuri-news-480462

बैराड़। तहसील क्षेत्र के तहत आने वाली गोदरी पंचायत के देवगढ़ गांव के दलित समाज के रहवासी श्मशान घाट की भूमि और शासकीय चरनोई भूमि पर गांव के ही एक दबंग परिवार के कब्जे से परेशान हैं। इस कब्जे को हटाने के लिए ग्रामीणों ने जनसुनवाई से लेकर पुलिस प्रशासन तक को शिकायत की, लेकिन आज तक दबंग से कब्जे को मुक्त नहीं कराया गया है।

यहां है दबंगों का कब्जा

ग्राम देवगढ़ (रूपापुर) में शासकीय भूमि सर्वे क्रमांक 08 एवं सर्वे क्रमांक 09 हल्का नंबर 32 चरनोई भूमि और श्मशान घाट के नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज है। इस पर ग्राम देवगढ़ के कपूरसिंह पुत्र रघुवीर यादव द्वारा बलपूर्वक अवैध कब्जा कर शासकीय भूमि पर बागड़ कर सोयाबीन और तिली की खेती की जा रही है। कब्जे के कारण ग्रामीण मवेशियों को चराने के लिए परेशान हो रहे हैं। वहीं श्मशान घाट की जमीन पर बागड़ कर खेती करने से गांव में अगर किसी की मौत हो जाती है तो दाह संस्कार के लिए भी ग्रामीणों को परेशान होना पड़ रहा है। देवगढ़ गांव के निवासी पातिराम जाटव, मिचुआ जाटव, सुरेश आदिवासी, मनीराम आदिवासी, पूरन जाटव, चिरोंजी जाटव, महेश जाटव, काशीराम आदिवासी, बारेलाल जाटव, सोनेराम जाटव, रतिराम आदिवासी आदि ग्रामीणों ने बताया कि शासकीय भूमि पर दबंगों के कब्जे की शिकायत थाने तहसील कार्यालय से लेकर जनसुनवाई में कलेक्टर के यहां भी की, लेकिन इनके बाद भी कार्रवाई नहीं की गई।

इनका कहना है

हमने देवगढ़ गांव के ग्रामीणों का पंचनामा बनाकर तहसील और थाने में शिकायत कर दी है। अब अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई उन्हें ही करना है।

गोदरी गंगाराम आदिवासी, ग्राम पंचायत सरपंच।

दैनिक भास्कर

सरकारी क्षेत्र में बढ़ाया जाए आरक्षण, निजी में भी लागू हो

http://www.bhaskar.com/news/MP-MUR-MAT-latest-morena-news-033044-2666575-NOR.html

नौकरी के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने, उच्च न्यायिक सेवाओं में आरक्षण देने सहित राजनीति में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण देने की मांग को लेकर आरक्षण बचाओ मोर्चा ने गुरुवार को बड़ी रैली निकालकर कलेक्टोरेट पर प्रदर्शन किया। मोर्चा ने मांग की है कि आरक्षण का विरोध कर रहे लोगों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज किए जाएं।

अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़ा वर्ग के हजारों लोग गुरुवार की दोपहर 12 बजे पीडब्ल्यूडी सर्किट हाउस पर एकत्रित हुए। हजारों की संख्या में शामिल छात्र-युवाओं की रैली बैरियर चौराहे से नारे लगाती हुई दोपहर दो बजे कलेक्टोरेट पहुंची। कलेक्टोरेट के गेट बंद देखकर युवाओं ने आधा घंटे तक वहां सरकार व प्रशासन के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाए। नारेबाजी के दौरान आरक्षण बचाओ मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने आरक्षण बढ़ाए जाने को लेकर भी नारेबाजी की। 

आरक्षण बचाओ मोर्चा के पदाधिकारी सतीश बौद्ध ने कहा कि केन्द्र सरकार मुनाफे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण करने पर आमादा है। केन्द्र ने विनिवेश के नाम पर बीएसएनएल, बाल्को, एचपीसीएल आदि को निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया है। हमारी मांग है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

आरक्षण के लिए सड़कों पर प्रदर्शन…

भीड़ में शामिल युवाओं ने लगाए यह नारे

85 प्रतिशत एससी,एसटी व ओबीसी ने जाना है, आरक्षण बचाना है।

पहले धन,धरती बांटो उसके बाद आरक्षण काटो। 

निजी क्षेत्र में आरक्षण दो, निजीकरण बंद करो।

जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी हो। सामाजिक दुर्दशा की क्षतिपूर्ति ही आरक्षण का आधार है।

मठ, मंदिरों पर एकाधिकार खत्म करो।

जनसंख्या के आधार पर मिले आरक्षण

आरक्षण बचाओ मोर्चा के संयोजक जितेन्द्र बौद्ध ने कहा कि केन्द्र सरकार ने अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़ा वर्ग के लोगों को उनकी जनसंख्या के आधार पर नौकरियों व शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण नहीं दिया है। यही कारण है कि शोषित व कमजोर वर्ग के लोग आज भी अपने वाजिब हक से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि दलित व पिछड़ा वर्ग के युवाओं को उच्च न्यायिक सेवा में आरक्षण दिया जाना चाहिए। एससी,एसटी व ओबीसी के खिलाड़ी उच्च स्तर पर खेल प्रदर्शन में आगे नहीं आ पा रहे हैं। बौद्ध ने डीआरडीओ, इसरो, बार्क, एम्स व आईआईटी जैसे संस्थानों मेंं दलित व पिछड़ों को आरक्षण दिए जाने की पुरजोर वकालत की। 

सरकार के गठन में हो आरक्षण 

आरक्षण बचाओ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे युवा नेता नितिन टैगोर ने कहा कि रा’यसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री रा’यपाल, केन्द्रीय मंत्री में एससी,एसटी व ओबीसी वर्ग का कोई आरक्षण नहीं है। इसलिए सरकार के गठन में भी आरक्षण की व्यवस्था लागू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरक्षण व्यवस्था का विरोध करने वाले तत्वों के खिलाफ देशद्रोह के मुकदमे दर्ज होना चाहिए।

आरक्षण बढ़ाने की मांग को लेकर दलित व पिछड़ा वर्ग के लोग रैली निकालते हुए।

हस्तक्षेप

टेरर पॉलिटिक्स पर वार करती ’ऑपरेशन अक्षरधाम

http://www.hastakshep.com/book-review/2015/09/17/टेरर-पॉलिटिक्स-पर-वार-करत

देश में कमजोर तबकों दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को दोयम दर्जे की स्थिति में बनाए रखने की तमाम साजिशें रचने तथा उसे अंजाम देने की एक परिपाटी विकसित हुई है। इसमें अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम आबादी को निशाना बनना सबसे ऊपर है। सांप्रदायिक हिंसा से लेकर आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुस्लिमों को ही प्रताड़ित किया जाता है। इसमें राज्य व्यवस्था की मौन सहमति व उसकी संलिप्तता का एक प्रचलन निरंतर कायम है।

राज्य प्रायोजित हिंसा 

के खिलाफ आंदोलनरत पत्रकार और डॉक्यूमेंन्ट्री फिल्म निर्माता राजीव यादव और शाहनवाज आलम राज्य व्यवस्था द्वारा रचित उन्हीं साजिशों का ऑपरेशन अक्षरधाम’ किताब से पर्दाफाश करते हैं। यह किताब उन साजिशों का तह-दर-तह खुलासा करती है जिस घटना में छह बेगुनाह मुस्लिमों को फंसाया गया। यह पुस्तक अक्षरधाम मामले की गलत तरीके से की गई जांच की पड़ताल करती है साथ ही यह पाठकों को अदालत में खड़ी करती है ताकि वे खुद ही गलत तरीके से निर्दोष लोगों को फंसाने की चलती-फिरती तस्वीर देख सकें।

इस किताब पर अपनी टिप्पणी में वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया कहते हैं कि पूरी दुनिया में ही हिंसा की बड़ी घटनाओं में अधिकतर ऐसी हैं जिन पर राज्य व्यवस्था द्वारा रचित होने का शक गहराया है। लेकिन रहस्य खुलने लगे हैं। राज्य व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले समूह अपनी स्वाभाविक नियति को कृत्रिम घटनाओं से टालने की कोशिश करते हैं। वे अक्सर ऐसी घटनाओं के जरिये समाज में धर्मपरायण पृष्ठभूमि वाले लोगों के बीच अपनी तात्कालिक जरूरत को पूरा करने वाला एक संदेश भेजते हैं। लेकिन यह इंसानी फितरत है कि मूल्यों व संस्कृति को सुदृढ़ करने के मकसद से जीने वाले सामान्य जन एवं बौद्धिक हिस्सा उस तरह की तमाम घटनाओं का अंन्वेषण करता है और रचे गए झूठों को नकारने के लिए इतिहास की जरूरतों को पूरा करता है।

जिस दिन 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव के नतीजे सामने आ रहे थे और नरेंद्र मोदी  के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को विजयी घोषित किया गया, ठीक उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने अक्षरधाम मंदिर पर हमले मामले में निचली अदालत व उच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए गए सभी छह आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया। इन छह लोगों को 24 सितंबर 2002 को किए गए अपराध की साजिश का हिस्सा बताया गया था, जिसमें मंदिर परिसर के भीतर दो फिदाईन मारे गए थे। गलत तरीके से दोषी ठहराये गए इन लोंगों में से तीन को मृत्युदंड भी सुनाया जा चुका था।

भारतीय राजतंत्र की एजेंसियों द्वारा मुसलमानों के उत्पीड़न के दो आयाम हैं। पहला यह कि मुसलमानों के खिलाफ संगीन से संगीन अपराध करने वाले व्यक्ति बिना किसी सजा के खुले घुमते हैं। बमुश्किल ही कोई मामला होगा जिनमें दोषियों को सजा हुई हो। यही वजह है कि जबलपुर से लेकर भिवंडी, अलीगढ़, जमशेदपुर, भागलपुर, मलियाना, हाशिमपुरा, बाबरी मस्जिद और मुंबई जनसंहार तक की लंबी फेहरिस्त इस तथ्य को उजागर करती है कि भारतीय राज्य सत्ता ऐसे अपराधों को अंजाम देने वालों को सजा देने में नाकाम रहने के कारण खुद कठघरे में है।

तथाकथित आतंकवादी मामलों में बरी किए जाने की दर में इजाफा इस बात को पुख्ता करता है कि दरअसलसारी कवायदों का उद्देश्य ही मुस्लिम समुदाय को निरंतर भयअसुरक्षा और निगरानी में घेरे रखना है। 

संदिग्ध आधारों पर किसी को दोषी ठहराये जाने की यह कवायद इसलिए जारी रहती है क्योंकि ऐसा करने वालों को कानूनी संरक्षण हासिल है। हमारे लोकतंत्र में अधिकारियों को दंडित किए जाने से छूट मिली हुई है।

ले ही भारतीय न्यायपालिका, खासकर उच्च अदालतों ने गलत तरीके से दोषी ठहराये गए लोगों को बरी किया है, लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसे लोगों को अपनी आजादी वास्तव में कई बरस बाद मिल पाती है। कभी कभार तो एकाध दशक बाद यह आजादी हासिल हो पाती है। यानी वे ऐसे अपराध के लिए कैद रहते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं। और वे तब तक कैद में रहते हैं जब तक कि अदालतें उन्हें बरी करने का फैसला न लें या फिर जैसा कि होता है, वे उस अपराध के लिए लगातार सजा भोगते रहते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं।

हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम पलट कर अक्षरधाम मामले को दोबारा देखें। यह समझें कि कैसे इस मामले में जांच की गई या की ही नहीं गई। अक्षरधाम मंदिर पर हमला 24 सितंबर 2002 को हुआ था जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी। मामला सबसे पहले अपराध शाखा को सौंपा गया लेकिन जल्दी ही इसे गुजरात एटीएस के सुपुर्द कर दिया गया क्योंकि इसे आतंकी मामला करार दे दिया गया था। एटीएस साल भर मामले को सुलझा नहीं पाई। जिसके बाद इसे वापस अपराध शाखा को भेजा गया। इस बार मामला हाथ में आने के 24 घंटे से कम समय में ही शाखा ने चमत्कारिक तरीके से दावा कर डाला कि यह साजिश 2002 में गुजरात में हुए मुसलमानों के संहार का बदला लेने के लिए सउदी अरब में रची गई थी।

इस मामले में जांच अधिकारी जीएल सिंघल ने, जो कई फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में जमानत पर रिहा होने के बाद हाल ही में पदस्थापित किए गए हैं,  ने 25 सितंबर 2002 को अक्षरधाम हमला मामले की एफआईआर दर्ज कराई थी  जिसमें मारे गए दोनों फिदाईन की पहचान और राष्ट्रीयता दर्ज नहीं थी।

हालांकि अक्टूबर 2002 में समीर खान पठान, जो कि एक मामूली चेन छिनैत से ज्यादा कुछ नहीं था, मुठभेड़ मामले में दर्ज एफआईआर में पुलिस ने लिखा था कि समीर खान पठान नरेंद्र मोदी जैसे प्रमुख नेताओं और अक्षरधाम जैसे हिन्दू मंदिरों को निशान बनाने की एक पाकिस्तानी साजिश का हिस्सा था। चूंकि बाद में सिंघल समेत कई पुलिस अधिकारियों पर पठान और अन्य को मुठभेड़ों में की गई हत्याओं के सिलसिले में मुकदमा कायम हुआ। इसलिए एफआईआर लिखने के आधार की सत्यता पर संदेह खड़ा होता है।

 जैसा दिख रहा था मामला उससे कुछ और गंभीर था। यहां तक कि अक्षरधाम मामले में यह बात भी कही जा सकती है जिसकी जांच सिंघल समेत दो और पुलिसकर्मियों डीजी वंजारा और नरेंद्र अमीन के जिम्मे थी। जिन्हें बाद में फर्जी मुठभेड़ मामले में दोषी ठहराया गया।

 यह पुस्तक अक्षरधाम मामले का अनुसंधानपरक और मुक्कमल पर्दाफाश है। 

इस पुस्तक में हर एक पन्ना विवरणों से भरा हुआ है जो बिल्कुल साफ करता है कि कैसे अक्षरधाम मामले की जांच फर्जी तरीके से की गई। जांच से पहले कैसे निष्कर्ष निकाल लिए गए और खुद को आश्वस्त कर लिया गया कि मुकदमा चाहे कितना भी बेमेल या असंतुलित हो, लेकिन सभी छह आरोपी कई साल तक जेल में ही सड़ते रहेंगे। मसलन, जिस चिट्ठी के मामले का जिक्र है जिसे एक आतंकवावादी की जेब से बरामद दिखाया गया था, वह चमात्कारिक ढंग से बिल्कुल दुरुस्त थी जबकि उसका शरीर खून से लथपथ, क्षतिग्रस्त था। लेकिन चिट्ठी पर कोई दाग.धब्बा या शिकन नहीं था।

इतना ही नहीं तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने दावा किया था कि घटना के चश्मदीद मंदिर के एक पुजारी ने उन्हें निजी तौर पर बताया था कि फिदाईन सादे कपड़े में थे, जबकि पुलिस ने अदालत में सबूत दिया कि वे वर्दीनुमा कपड़े में थे। जब एक आरोपित यासीन बट्ट जम्मू कश्मीर पुलिस की हिरासत में था, तो गुजरात पुलिस ने यह दावा क्यों किया कि वह उसका सुराग नहीं लगा पाई? मामले की चार्जशीट में सारी गड़बड़ियां शामिल हैं।

यह पुस्तक दिखाती है कि कैसे सैकड़ों मुसलमानों को उठाकर ऐसे ही अलग.अलग किस्म के आतंकी मामलों में फंसाया गया।

पुस्तक इसका भी पर्दाफाश करती है कि कैसे निचली आदलत और गुजरात हाईकोर्ट ने तमाम असंबद्धताओं और असंभावनाओं को दरकिनार करते हुए छह लोगों को दोषी ठहराया और इनमें से तीन को मौत की सजा सुना दी।

इन छह आरोपितों के बरी हो जाने के बावजूद 12 साल तक इन्हें इनकी आजादी से महरूम रखने, प्रताड़ित करने और झूठे सबूतों को गढ़ने के जिम्मेदार लोग झूठा मुकदमा कायम करने के अपराध में सजा पाने से अब तक बचे हुए हैं।

यहीं से यह तर्क निकलता है कि अक्षरधाम हमले का मामला कोई अलग मामला नहीं था बल्कि सिलेसिलेवार ऐसे मामलों की महज एक कड़ी थी जिससे मुसलमानों के खिलाफ संदेह पैदा किया गया और आतंकवावाद से लड़ने की खोल में राज्य को बहुसंख्यकवाद थोपने का बहाना मिला। इसके अलावा राजनैतिक रंजिशों को निबटाने का भी यह एक बहाना था। हरेन पांड्या का केस इसका एक उदाहरण है। मसलन, सवाल यह है कि अक्षरधाम मंदिर के महंत परमेश्वर स्वामी की मौत कैसे हुई?

पहली चार्जशीट कहती है कि महंत मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के लिए मंदिर परिसर से बाहर गए और वापसी में तथाकथित आतंकी हमले में मारे गए। फिर इस तथ्य को दूसरी चार्जशीट में से क्यों हटा लिया गया?

शरणार्थी शिविरों में काम कर रहे मुस्लिमों या इन शिविरों को आर्थिक मदद दे रहे प्रवासी गुजराती मुस्लिमों पर गुजरात पुलिस की विशेष नजर थी और इन्हें बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया। तो क्या मुस्लिमों का खुद को बचाना कोई नाराजगी या पीड़ा से उपजे उन्माद का सबब रहा? आखिर इतनी बड़ी संख्या में ऐसे मुस्लिमों को ही आतंकी मामलों में क्यों फंसाया गया?

पोटा अदालत 

द्वारा दोषी करार दिए गए प्रत्येक छह व्यक्तियों मुफ्ती अब्दुल कय्यूम, आदम अजमेरी, मौलवी अब्दुल्लाह, मुहम्मद सलीम शेख, अल्ताफ हुसैन मलिक और चांद खान की दास्तानें किसी डरावनी कहानी की तरह हमारे सामने आती हैं। तीन मुफ्ती मुहम्मद कय्यूम, चांद खान और आदम अजमेरी को मृत्युदंड सुनाया गया। सलीम को आजीवन कारावास, मौलवी अब्दुल्लाह को 10 साल की कैद और अल्ताफ को 5 साल का कारावास। अदालती कार्यवाहियां स्पष्ट करती हैं कि कानून का राज निरंकुशता के जंगल राज में बड़ी आसानी से कैसे तब्दील किया जा सकता है।

निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के फैसले की आलोचना में सुप्रीम कोर्ट के वाजिब तर्क इस रिपोर्ट की केंद्रीय दलील को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं कि मुसलमानों के साथ हो रहा भेदभाव संस्थागत है, जहां अधूरे सच, नकली सबूतों और अंधी आस्थाओं की भरमार है।

हमारे राजतंत्र और समाज के भीतर जो कुछ गहरे सड़.गल चुका है, जो भयंकर अन्यायपूर्ण और उत्पीड़क है, अक्षरधाम मामले पर यह बेहतरीन आलोचनात्मक विश्लेषण उस तस्वीर का एक छोटा सा अक्स है।

आई बी एन खबर

बिहार में बिल गेट्स के गांव की ये है हालत,

बाकी गांवों का पूछिए मत..!

http://khabar.ibnlive.com/blogs/nawal/bihar-assembly-election-2015-409962.html

अक्सर हम शहरों में रहने वाले फ़िर चाहे हमारा जन्मस्थल कोई गांव ही क्यों न हो, गांवों के प्रति संकीर्ण सोच के शिकार हो जाते हैं। हम सोचते हैं कि शहरों में बिजली है, चमचमाती सड़कें हैं और वे तमाम सुविधाएं हैं, जिसके लिए एक मनुष्य कल्पनाएं करता है। जबकि गांवों के बारे में हमारी सोच “एक सुविधाविहीन, उपेक्षित और वंचित समाज” तक सीमित हो जाती है। ऐसा भी नहीं है, ऐसी सोच कोई गलत सोच है। सच्चाई तो यही है कि गांवों के देश भारत में “इन्डियन टाउनशिप”, “मेट्रो सिटी” और अब “स्मार्ट सिटी” आदि विकसित हो गए हैं या फ़िर होने वाले हैं। लेकिन गांवों में अब भी प्रेमचंद के हजारों “किसान” मौजूद हैं। अंतर केवल इतना है कि पहले उनके बथान पर हीरा-मोती की जोड़ी रहती थी और अब कुछ भी नहीं।

In this Wednesday, March 23, 2011 photo Microsoft Corp. founder and philanthropist Bill Gates, right, and his wife Melinda Gates attend to a child as they meet with members of the Mushar community at Jamsot Village near Patna, India. (AP Photo/Aftab Alam Siddiqui)

In this Wednesday, March 23, 2011 photo Microsoft Corp. founder and philanthropist Bill Gates, right, and his wife Melinda Gates attend to a child as they meet with members of the Mushar community at Jamsot Village near Patna, India. (AP Photo/Aftab Alam Siddiqui)

खैर, बीते साढ़े छह दशकों में गांवों ने पलायन से लेकर नवउदारवादी नाज-नखरों तक सब कुछ देखा-सुना है। इसकी झलक भी दिखाई देती है। पटना के राजनीतिक गलियारे से निकल गांवों के नजर से राजनीति को समझने की इच्छा थी। इसलिए 17 सितंबर यानी विश्वकर्मा पूजा के दिन मिले अवकाश का उपयोग करने घर से निकल गया। समस्या दिशा तय करने की थी। मतलब गांवों को देखने की यह यात्रा कहां से शुरू और कहां खत्म हो। इसके अलावा एक समस्या यह भी थी कि खुद को शहरी मानते हुए गांवों को देखा जाए या फ़िर पटना के फ़ुलवारी थाने के एक गांव के वाशिंदे के रूप में गांवों को देखूं।

यह एक कठिन सवाल था। लेकिन फ़ैसला वक्त पर छोड़ निकल पड़ा। अंतर यह रहा कि हर दिन मैं घर से निकल उत्तर की ओर चल पड़ता हूं, लेकिन अपनी यात्रा मैंने दक्षिण दिशा की ओर शुरू की। कोशिश थी कि शुरुआत अपने ही गांव से करूं जो इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पटना से बमुश्किल 5 किलोमीटर दूर अपने आधे-अधूरे अस्तित्व के साथ रोज सिसकता है, लेकिन मुझ तक इसकी आवाज नहीं पहुंचती है।

मेरे गांव को संजीवनी प्रदान करने वाली बादशाही नहर तबाह हो चुकी है। देखकर झटका लगा। गांव वालों से पूछा तो जानकारी मिली कि नहर का अतिक्रमण कर लिया गया है और अब सब खत्म हो गया है। फ़िर मेरी नजर गांव के बधार में दूर तक खाली पड़े खेतों पर पड़ी। कभी ये खेत इस समय धान के हरियाली से भरे रहते थे। मन में टीस उठी। आगे बढ़ा तो गंज पर पहुंचा। यह एक खास गांव है फ़ुलवारी प्रखंड का। खास इसलिए कि बीते एक दशक में इस एक गांव ने जितनी तरक्की की है, उतनी तरक्की आसपास के गांवों में दूर-दूर तक नहीं हो सकी। यहीं एक मुसहरी भी है, जहां मांझी समाज के लोग रहते हैं। गंज पर ही अपनी पत्नी के साथ मिलकर परचून दूकान चलाने वाले प्रमोद सिंह से मेरा पहले कोई परिचय नहीं था, लेकिन मेरी सूरत मेरे बड़े भाई से मिलती है, इसलिए परिचय सहज ही हो गया।

प्रमोद सिंह ने यह कहकर चौंका दिया कि गंज पर का विकास केवल दारू के कारण हुआ है। मैं  चौंक गया। विस्तार से बताने का अनुरोध किया तब उन्होंने बताया कि गंज पर मुसहरी में महुआ दारु (सरकारी भाषा में अवैध देशी शराब) खूब बिकती है। अब यहां सरकारी भट्ठी भी खुल गई है, जिसमें देशी और विदेशी दोनों मिलती है। रोज शाम को यहां पीने वालों का मेला लगता है, जो यहां का मुख्य अर्थशास्त्र है।

जानकारी मिली कि यही एक शिवधारी मांझी भी अपने परिवार के साथ रहते हैं, जिन्हें लालू प्रसाद ने अपने शासनकाल में रंक से राजा बना दिया था। यकीन नहीं आया इसलिए मिलने चला गया। दरवाजे पर सरकारी राशन दुकानदार का बोर्ड लगा था। बोर्ड पर डीलर का नाम था – शिवधारी मांझी। बातचीत होने लगी तब शिवधारी मांझी ने स्वीकार किया कि राशन दुकान लालू बाबू ने खुलवाया था और यहां से लेकर इस गांव के अंत तक जितने घर आपको दिखाई दे रहे हैं सब लालू बाबू के दिए इंदिरा आवास से बने हैं।

बातचीत के दौरान ही यह जानने की इच्छा भी हुई कि इस बार मांझी समाज के लोग किसे वोट करना चाहते हैं। शिवधारी मांझी ने बेबाकी से जवाब दिया – जीतन राम मांझी को। वजह पूछने पर बताया कि नीतीश कुमार ने उन्हें छह महीने में मुख्यमंत्री पद से क्यों हटा दिया। मैंने उनसे कहा कि क्या आप केवल इसलिए जीतन राम मांझी को वोट करेंगे क्योंकि वे आपकी जाति के हैं? क्या नीतीश कुमार की सरकार या फ़िर लालू प्रसाद ने आप लोगों के लिए कुछ नहीं किया। जबकि आपके पास तीन मंजिला मकान है। पक्की सड़क और बिजली भी है।

शिवधारी मांझी ने जवाब दिया – पक्की सड़क और बिजली क्या हम दलितों के लिए हैं। हम दलितों को रोजगार चाहिए। मेरे तीन बेटे हैं और तीनों ने बीएड किया है, लेकिन सब बेरोजगार हैं। मैंने पूछा कि आपकी बस्ती में और कितने लोग हैं, जिन्होंने बीए किया है। हंसते हुए गर्व के साथ बोले – केवल मैंने अपने बच्चों को पढ़ाया है। बाकी लोगों को दारू बेचने और पीने से फ़ुरसत कहां है।

जाहिर है कि मुझे जवाब मिल गया था, इसलिए कोई और प्रश्न पूछने का सवाल ही नहीं था। आगे बढ़ा तो पुनपुन नदी के उस पार कई गांवों में गया। कहानी एक ही। बिजली, सड़क और स्कूल तो है, लेकिन रोजगार नहीं है। एक गांव में चौधरी यानी पासी समाज के लोग मिले। कहने लगे कि उन्हें नीतीश कुमार से कोई शिकायत नहीं है। विकास हो रहा है। अब तो सब कहने भी लगे हैं। अब बारी उत्तर की ओर लौटने की थी।

दानापुर के जमसौत गांव पहुंचा। वहां तीन वर्ष पहले बिल गेट्स और उनकी पत्नी दोनों गए थे। वहां जमसौत मुसहरी

को उन्होंने गोद लिया था। तीन वर्षों के बाद जमसौत मुसहरी का क्या हुआ, यही जानने की इच्छा थी। पूछने पर लोगों ने रानी के बारे में बताया जिसे गेट्स दंपत्ति ने अपनी गोद में खेलाया था और पूरे गांव को गोद लिया था। उसकी मां रुन्ती देवी ने बताया – “साहेब(बिल गेट्स) के गेला के बाद कुच्छो न होलई हे। दीदी जी (पद्मश्री सुधा वर्गीज) एगो सेंटर चलाव हलथिन, जेकरा में औरत लोग के महीना के कपड़ा (नैपकिन पैड) बन हलई। हमहूं ओकरे में काम कर हलियई। लेकिन अब ओहू बंद हो गेलई। अब तो कोई झांकियो पाड़े न आव हथिन।”

वहीं एक नौजवान अमर मांझी ने बताया कि गांव के नौजवान दिहाड़ी मजदूर हैं।  कोई मकान में मजदूरी करता है, तो कोई साफ़-सफ़ाई का काम। वह खुद पोल गाड़ने का काम करता है। बदले में प्रतिदिन के हिसाब से तीन सौ रुपये मिलते हैं। पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछने पर बताया कि उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। गांव के अन्य लोगों की दास्तान भी ऐसी ही थी।

खास बात लोगों ने यह बताया कि दो वर्षों से शौचालय बनाने की सामग्री लाकर रखी हुई है, जिसे कोई पूछने वाला नहीं है। वहीं गांव की हर गली के दीवार पर भाजपा का स्लोगन लिखा था – “अबकी बार – उनकी सरकार”। मुझे लगा कि आचार संहिता का मतलब केवल राजधानी होता है। वैसे भी जमसौत मुसहरी जैसे गांव किसी राज्य का हिस्सा कैसे हो सकते हैं।

बहरहाल, वहीं बगल में एक फ़ार्म है। पहले यह कृषि फ़ार्म हुआ करता था। उन दिनों जब सोन में कटाव के कारण गांव के गांव अस्तित्वहीन हो गए तब इसी फ़ार्म की जमीन पर लालू प्रसाद ने गांव वालों को बसाया था। पूछने पर चिंता राय ने बताया कि वे झऊरी टोला के रहने वाले हैं, जो दानापुर सैन्य छावनी के उस पार में हुआ करता था। लालू यादव ने हम सभी को बसा दिया। सभी को एक-एक कट्टा जमीन दी। अब हम लोगों को कोई तकलीफ़ नहीं है।

हालांकि गांव में खेत बहुत थे, अब यहां आकर थोड़ी सी जमीन से काम चलाना पड़ रहा है। दानापुर में सोन नदी के उस पार से मेरा खास व्यक्तिगत लगाव रहा है, इसलिये नदी के उस पार जाने की इच्छा थी। लेकिन समयाभाव के कारण ऐसा न हो सका। परंतु नाव से नदी के उस पार आने-जाने वालों से रूबरू होने का मौका मिला।

पानापुर दियारा के केशव बाबू ने बताया कि हम दियारा वासियों की दो मुख्य परेशानियां हैं। दानापुर में एक स्थायी पुल का निर्माण और गांव में बिजली। हर बार नेता लोग आते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं। इस बार हम लोगों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया है, हम चाहे कासिमचक पंचायत के हों चाहे पानापुर के, वोट उसी को करेंगे जो हमारी इन मांगों को मानेगा। फ़िर चाहे कोई उम्मीदवार हमारी जाति का हो या न हो। इस बार हम अपने मुद्दों को लेकर वोट करेंगे।

मैं लौट रहा था। तेजी से बदल रहे दानापुर को करीब से निहारते हुए। मैं सोच रहा था कि बिहार के सबसे लंबे फ़्लाई ओवर पर खड़े होकर जो नजारा दिखता है, वह गांवों में दिखे यह जरूरी तो नहीं है और न ही गांवों के लिए लाभदायक ही,  लेकिन क्या गांवों के भाग्य में केवल तरसना ही लिखा है।

बिल गेट्स अपनी पत्नी के साथ जमसौत मुसहरी आते हैं, फ़ोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। गांव के लोग उनकी राह तकते हैं। यही हाल सरकार का भी है जो हर बार चुनाव के समय गांव की ओर कूच तो जरूर करती है, लेकिन गांव से केवल वोट ले जाती हैं, देती कुछ भी नहीं। वैसे खास बात यह रही कि गांव भी बोलने लगे हैं और उनकी आवाज तेज होने लगी है, जो लोकतंत्र के लिये सकारात्मक भी है।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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