दलित मीडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 15.08.15

महाराष्ट्र:दलित महिला सरपंच को नहीं फेहाराने दिया तिरंगा – आज तक

http://aajtak.intoday.in/story/dalit-female-sarpanch-not-allowed-to-unfurl-tricolor-on-69th-independence-day-at-sangli-in-maharashtra-1-828216.html

सुमंगलीनहीं बंधुआ मजदूर बनी लड़कियां – मेड फॉर माइंड

http://www.dw.com/hi/सुमंगली-नहीं-बंधुआ-मजदूर-बनी-लड़कियां/a-18649882

कहीं नहीं पहुंचाएंगे ये धर्मांतरण – समय लाइव

http://ftp.samaylive.com/editorial/323829/somewhere-would-not-this-conversion.html

बामसेफ अधिवेशन हंगामे की भेंट चढ़ा – नवभारत टाइम्स

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/punjab-and-haryana/other-cities-of-punjab/haryana/bamcef-session-of-uproar-unleash/articleshow/48496190.cms

हरियाणा में दलितों को कावड़ चढ़ाने से रोका बीइंग दलित

http://www.beingdalit.com/2015/08/dalits-not-allowed-t-perform-pooja-in-haryana.html#.VdAtJjam9dg

Please Watch:

India after Independence Lec 14

https://www.youtube.com/watch?v=KRXj7L8F_Wg

An Appeal!

Save Dalit Foundation: Educate, agitate & organize! – Dr. Ambedkar. Let us all educates to agitate & Organize to Save Dalit Foundation ! Please sign petition by click this link : https://t.co/WXxFdysoJK

आज तक

महाराष्ट्र:दलित महिला सरपंच को नहीं फेहाराने दिया तिरंगा

http://aajtak.intoday.in/story/dalit-female-sarpanch-not-allowed-to-unfurl-tricolor-on-69th-independence-day-at-sangli-in-maharashtra-1-828216.html

देश के 69वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शनिवार को महाराष्ट्र के सांगली जिले में दलित महिला सरपंच को तिरंगा नहीं फहराने दिया गया.

घटना आरग गांव की है जहां महिला सरपंच विशाखा कांबले को तिरंगा फहराने से रोक दिया गया. उनकी जगह गांव के उप सरपंच अनिल काबू ने खुद ही झंडा फहराया. इस घटना से गांव के लोगों में काफी गुस्सा है.

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गौरतलब है कि पिछले साल मध्य प्रदेश के मुरैना में एक दलित महिला सरपंच को झंडा फहराने का मौका मिला. लेकिन इसके लिए उन्हें चार साल तक संघर्ष करना पड़ा. आजादी के 68 साल बाद भी देश में महिलाओं और दलितों के प्रति भेदभाव खुलेआम जारी है !

मेड फॉर माइंड

सुमंगलीनहीं बंधुआ मजदूर बनी लड़कियां

http://www.dw.com/hi/सुमंगली-नहीं-बंधुआ-मजदूर-बनी-लड़कियां/a-18649882

तमिलनाडु में एक लाख से भी ज्यादा लड़कियां मिलों में “बंधुआ मजदूर” हैं. दलाल गरीब परिवारों को काम का कॉन्ट्रेक्ट दिलाने के बहाने ठगते हैं और उनकी बेटियां कताई मिलों में शोषण की शिकार बनती हैं.

कई सालों से एजेंटों का तमिलनाडु के गरीब परिवारों में जाकर उन्हें बेहतर जीवन का सपना दिखाने का सिलसिला चल रहा है. वे लड़कियों और महिलाओं को हजारों सूती मिलों में ले जाते हैं, जो भारत में कृषि के बाद सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली टेक्सटाइल इंडस्ट्री का हिस्सा हैं.

सुदूर, कम विकसित इलाकों से महिलाओं को ले जाकर काम दिलाना, पैसे कमाने का मौका देना तो भारत जैसे देश में महिला सशक्तिकरण की सशक्त गाथा होनी चाहिए फिर समस्या कहां है. असल में तमिलनाडु के इरोड जिले की ऐसी ही मिलों में काम कर चुकी कई पूर्व कर्मचारियों ने वहां के हालात का ब्यौरा दिया, जो कि शोषण और बंधुआ मजदूरी की दुखद दास्तान हैं. तमिल में “सुमंगली” नाम की इस स्कीम का अर्थ है “खुशहाल शादीशुदा महिला” – मिल मालिक एजेंटों को लड़कियां लाने के लिए 2,000 रूपये देते हैं. तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद इन बंधुआ लड़कियों को 30,000 से 60,000 रूपए के बीच मिलने होते हैं, जिनमें से भी काफी रकम उनके रहने और खाने के खर्च के नाम पर काट ली जाती है.

घर जाने की अनुमति नहीं

23 साल की कविता ने वापस अपने गांव आने के बाद बताया, “मैं जिन भी औरतों से मिलती हूं उनको मिलों में ना जाने की ही सलाह देती हूं. मैं जानती हूं कि एजेंट क्या वादे करते हैं और सच्चाई क्या है. वह समान नहीं है.” कविता आगे कहती है, “एक साल तक मुझे अपने घर जाने की अनुमति नहीं थी. यहां तक कि उस परिसर से बाहर जाने की भी नहीं जहां हॉस्टल और मिल थे. मुझसे दो-दो शिफ्टों में काम करवाया गया. मैं झूठ बोलकर वहां से बाहर आ सकी.”

केवल 13 साल की उम्र में वहां जाने वाली कविता उन हजारों लड़कियों में से एक थी जिन्हें “मैरेज स्कीम” के अंतर्गत मिलों में काम पर रखा गया. 1990 में देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के दौर में तमिलनाडु में ऐसी कई कपड़ा मिलें खुलने लगी थीं. “मैरेज स्कीम” जैसी कई योजनाओं के नाम पर मिलों में काम करने के लिए बहुत सारे सस्ते श्रमिक जुटाए गए. इनमें से ज्यादातर गरीब, अशिक्षित और निम्न-जाति या दलित समुदायों की कम उम्र की लड़कियां थीं. इन्हें उनके काम के बदले तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट के पूरा होने पर एकमुश्त रकम दी जाती थी. इस योजना को लड़कियों की शादी के लिए दहेज जुटाने के आसान तरीके के तौर पर प्रचारित किया गया.

दहेज के नाम पर

कई पूर्व कर्मचारियों के अनुभवों और फ्रीडम फंड, एंटी-स्लेवरी इंटरनेशनल जैसे कई सामाजिक संगठनों की अनगिनत स्टडीज दिखाती हैं कि यहां काम करने वाली महिलाओं को क्षमता से ज्यादा भरे हुए, बंद हॉस्टलों में रखा जाता है और कम मेहनताने के साथ साथ कई बार उन्हें मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न भी झेलना पड़ता है. इंडस्ट्री की इकाईयां इन आरोपों को निराधार बताती हैं. देश से सालाना 42 अरब डॉलर का निर्यात करने वाली इस इंडस्ट्री का ज्यादातर काम पश्चिमी तमिलनाडु के नामाक्कल, कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड और सालेम जिलों में ही होता है, जिसके कारण ये “भारत की टेक्सटाइल वैली” कहलाते हैं.

यहां करीब 300,000 लोग इस काम में लगे हैं. बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण उत्पादन और मुनाफा बढ़ाने के लिए कई लोगों से बंधुआ मजदूरी करवाई जाती है. लड़कियों को ठग कर इन मिलों तक लाने वाले “एजेंट” कहलाते हैं. अपने दहेज की रकम खो देने के डर से शोषण के बावजूद लड़कियां सब कुछ सहती हैं. दहेज प्रथा को बंद हुए पांच दशक से भी ज्यादा हो चुके हैं लेकिन आज भी कई समुदायों में लड़की के घरवालों को दूल्हे के परिवार को शादी करने के एवज में बड़ी रकम चुकानी पड़ती है.

इलाके की करीब 400 मिलों के संगठन साउथ इंडियन मिल्स एसोसिएशन (एसआईएमए) के प्रमुख बताते हैं कि सरकार और एसआईएमए ने कर्मचारियों के लिए कई नियम बनाए हैं लेकिन फिर भी कहीं कहीं उनका उल्लंघन हो रहा है. महासचिव के सेल्वाराजू कहते हैं, “कुछ बेशर्म लोग इन नियमों का पालन नहीं कर रहे और उनके कारण सबका नाम खराब हो रहा है. अब जहां जरूरी हो वहां पुलिस ही कार्रवाई कर रही है.”

समय लाइव

कहीं नहीं पहुंचाएंगे ये धर्मांतरण

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इस बार जो हुआ वह समूचे देश में घटित परिघटनाओं-घटनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले राजधानी दिल्ली के हृत्क्षेत्र जंतर-मंतर पर हुआ. यहां हरियाणा के हिसार जिले के भगाना गांव के सौ से ज्यादा दलित परिवारों ने हिंदू धर्म त्याग कर इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया. उनका यह धर्मातरण आकस्मिक नहीं था. यह भी उन समाजार्थिक कारणों की उस लंबी और ऐतिहासिक श्रंखला की नवीनतम कड़ी था जिसके कारण ऐसे धर्मातरण सदियों से होते रहे हैं, यानी उच्चवर्णीय जातियों द्वारा अपमान, उपेक्षा और उत्पीड़न. उच्च जातियों के अन्याय, भेदभाव और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उत्पीड़न के शिकार इन दलितों ने कई बार अपनी शिकायतें ठिकाने तक पहुंचाई पर कहीं कोई असर नहीं हुआ. मई 2012 में उन्होंने 41 दिन तक जंतर-मंतर पर धरना दिया था कि उनकी बात सुन ली जाए. मार्च 2014 में चार दलित लड़कियां बलात्कार की शिकार बनाई गई लेकिन अपराधियों के विरुद्ध वांछित कार्रवाई नहीं हुई. उसके बाद 14 अप्रैल 2014 से जो धरना चला वह अब तक जारी रहा. हिंदू से मुसलमान बने एक पीड़ित के अनुसार ‘हमने प्रधानमंत्री से लेकर हरियाणा के मुख्यमंत्री तक हर किसी से गुहार लगाई परंतु कहीं से वह उत्तर नहीं मिला जो मिलना चाहिए था.’ कुछ राजनेता आए जरूर और उन्होंने सहानुभूति भी प्रकट की मगर जमीन पर कुछ नहीं उतरा. और फिर उन्होंने वह फैसला लिया जो उन्हें उनके उस दलितत्व से उबारने वाला था जिसके कारण उन्हें सवर्णो के तमाम तरह के अत्याचार सहने पड़े.

जाहिर है कि ‘धर्मविरोधी’ इस कांड पर हिंदुत्ववादी संगठनों की ‘षड्यंत्र’ सूंघने वाली प्रतिक्रियाएं सामने आनी थी और वे तत्काल आनी भी शुरू हो गई. मुस्लिम समुदाय के जो लोग इस धर्मातरण में सहायक हुए उन्होंने अपने मजहबी विस्तार का विजयी सुख उठाया होगा जिस तरह हिंदुत्ववादियों ने अपने अपमान और अपनी पराजयबोध का दुख उठाया. लेकिन हैरानी की बात यह है कि हर धर्मातरण पर बुरी तरह तिलमिला जाने वाले हिंदुत्ववादी संगठन उस जाति व्यवस्था के विरुद्ध और सवर्ण मानसिकता के विरुद्ध सीधा संघर्ष नहीं छेड़ते जिनके कारण धर्मातरण की एकाकी और सामूहिक घटनाएं घटती हैं और उनके कलेजे पर सांप की तरह लोट जाती हैं. एक ओर वे धर्मातरण पर आक्रोश से भर जाते है तो दूसरी ओर वे अपनी उस सवर्णता को भी सनातन बनाए रखना चाहते हैं जिसे वे अपने धर्म की धुरी मानकर चलते हैं. वे दलितों की उस पीड़ा का अहसास तक नहीं करना चाहते जो दलितों को हिंदुत्व की परिधि से बाहर निकल जाने के लिए बाध्य करती है. यहां उल्लेख कर दिया जाए कि जब धर्मातरित एक नौजवान से पूछा गया कि उन्होंने परिवर्तन के लिए बौद्ध या सिख धर्म क्यों नहीं चुना तो उसने कहा कि ये धर्म हिंदुत्व के प्रभाव में हैं और हम पूरी तरह हिंदुत्व से कटना चाहते हैं और ऐसा इस्लाम अपनाकर ही हो सकता है. यह वह स्थिति है जो इस्लाम और हिंदुत्व को एक-दूसरे के धुर विरोधी के तौर पर प्रस्तुत करती है और दलितों की गहरी पीड़ा व नफरत को भी.

खैर, यह दीगर विषय है. मूल विषय यह है कि जिन दलितों ने इस्लाम अपनाया है क्या उनके हालात सुधर जाएंगे या उनको उनके हक मिल जाएंगे? या उनकी स्थिति पहले से ज्यादा बदतर हो जाएगी? जो सूचनाएं मिल रही हैं वे बदतर की तरफ इशारा कर रही हैं. इशारा कर रही है कि अगर ये नव-मुस्लिम परिवार अपने गांव में रहने के प्रयास करते हैं तो उन्हें अधिक उपेक्षा, बहिष्कार और प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ेगा. प्रशासन या परिवेश की उनके प्रति सहानुभूति होगी या परेशान करने वालों के मन में कोई पश्चाताप पैदा होगा, इसकी संभावना दूर तक नजर नहीं आती. उनका अलगाव और ज्यादा बढ़ जाएगा और उनकी कठिनाइयां और अधिक जटिल हो जाएंगी. दूसरी ओर इस्लाम के पास भी कोई जादुई छड़ी नहीं है जो इनकी समस्याओं का कोई तात्कालिक हल पैदा कर देगी. भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ में भारतीय मुसलमानों की अपनी आंतरिक उलझनें इतनी ज्यादा हैं कि वे अपनी भौतिक समस्याओं का हल एक समुदाय के तौर पर नहीं ढूंढ पा रहे हैं, तब नव-मुसलमानों की समस्याओं का निपटारा हो सकेगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता. हां, नव-मुसलमान इस अहसास पर जरूर खुश हो सकते हैं कि उन्होंने जातिवादी सवर्ण हिंदुओं से अपने तरीके से बदला ले लिया है.

हो सकता है बहुत से लोग अपने-अपने सीमित हितों की दृष्टि से इस पर सहमत न हों, परंतु हकीकत यह है कि धर्मातरण किसी भी समाजार्थिक समस्या का हल नहीं है. उस समय तो बिल्कुल भी नहीं जब हर धर्म के भीतर मनुष्य विरोधी, अवैज्ञानिक और असंवेदनशील प्रवृत्तियां नए-नए रूपों में सक्रिय हो रही हों, सहज मानवीय जीवन को असामान्य तौर पर जटिल बना रही हों और अन्याय-अत्याचार के नए-नए तरीके ईजाद कर रही हों. वास्तविक न्याय पाने का कारगर रास्ता एक धार्मिकता छोड़कर दूसरी धार्मिकता में प्रवेश करने से नहीं बल्कि धार्मिक जड़ताओं के विरुद्ध विजयकारी संघर्ष के भीतर से खुलता है. संघर्ष उन जड़ परंपराओं, व्यवस्थाओं और नैतिकताओं के विरुद्ध जो मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देती हैं और अगर कोई मनुष्यवत बने रहने के आग्रह प्रस्तुत करता है तो उसे मनुष्य मानने से इनकार कर देती हैं.

जहां तक भारतीय समाज का संबंध है तो यह संघर्ष उन जातिगत व्यवहारों के विरुद्ध होना चाहिए जो वर्तमान राजनीतिक व्यवहारों से मिलकर पहले की तुलना में कहीं अधिक मनुष्य विरोधी और घातक हो गए हैं. इनकी भारी कीमत भारतीय राज्य और समाज को अतीत में भी चुकानी पड़ी है और आज भी चुकानी पड़ रही है. जब तक जातिविहीन और सवर्णताविहीन समाज की स्थापना नहीं होगी तब तक न वैसे अन्याय से मुक्ति मिलेगी जो भगाना गांव के दलितों को झेलना पड़ा और न समाज-विभाजक धर्मातरणों से मुक्ति मिलेगी. जब क्रियाएं असंगत और अतिवादी होती हैं तो उनकी प्रतिक्रियाएं भी असंगत और अतिवादी होती हैं. दोनों के परिणाम सामाजिक शांति, सद्भाव और सहकार के लिए घातक होते हैं.

नवभारत टाइम्स

बामसेफ अधिवेशन हंगामे की भेंट चढ़ा

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/punjab-and-haryana/other-cities-of-punjab/haryana/bamcef-session-of-uproar-unleash/articleshow/48496190.cms

रोहतक : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की अगुआई में भारी हंगामे के चलते एमडीयू में बामसेपफ का अधिवेशन नहीं हो सका। शनिवार सुबह बामसेफ के कार्यकर्ताओं को आंबेडकर हॉल में बंद कर दिया। दोनों पक्षों में मारपीट भी हुई। दलितों के मशहूर वैचारिक संगठन बामसेफ का दिन का हरियाणा राज्य अधिवेशन एमडीयू के आंबेडकर हॉल में शनिवार सुबह शुरू होना था। एबीवीपी एमडीयू में इस अधिवेशन को नहीं होने देने पर आमादा थी। एबीवीपी नेताओं के मुताबिक, शुक्रवार को उन्होंने घोषणा कर दी थी कि यूनिवर्सिटी केम्पस में इस अधिवेशन को नहीं होने दिया जाएगा। एबीवीपी के मुताबिक, बामसेफ एक धर्म के खिलाफ आवाज बुलंद करता है और जातिवाद को बढ़ावा देता है। गौरतलब है कि मनुवाद और ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाल बामसेफ वैचारिक रूप से एबीवीपी और उसके फादर ऑर्गेनाइजेशन आरएसएस के खिलाफ पड़ता है। बामसेफ को बीएसपी का थिंक टैंक भी माना जाता है।

दिलचस्प यह रहा कि इस मुहिम में एबीवीपी अपने साथ दलित छात्रों के संगठन आंबेडकर मिशनरी विद्यार्थी असोसिएशन को भी शामिल कर रखा था। बामसेफ के हरियाणा राज्य के महासचिव संधीर बौद्ध के मुताबिक, वह अपने कार्यकर्ताओं के साथ आंबेडकर हॉल में बैनर लगा रहे थे तो एबीवीपी के कार्यकर्ताओं व उनके साथ आए दूसरे लोगों ने बाहर से हॉल में ताला लगा दिया। दोनों ओर से नारेबाजी भी हुई। संधीर के मुताबिक, महिलाओं और बच्चों समेत कई लोगों को चोट भी लगी है। एबीवीपी नेता दिनेश चोपड़ा ने आरोप लगाया कि बामसेफ कार्यकर्ताओं ने शांतिपूर्वक धरने पर बैठे विद्यार्थियों को डंडे से पीटना शुरू कर दिया था। पुलिस के अधिकारी और पुलिस के ब्लैक कैट कमांडो भी मौके पर पहुंचे। बाद में एमडीयू के रजिस्ट्रार एसपी वत्स ने एमडीयू में अधिवेशन होने देने में असमर्थता जता दी। बाद में यह अधिवेशन सुखपुरा चौक पर अंबेडकर पब्लिक स्कूल में शुरू किया गया। संधीर बौद्ध ने आरोप लगाया कि पूर्व में अनुमति होने के बावजूद बामसेफ के अधिवेशन को जबरन रोकने में प्रदेश की सरकार की भूमिका रही। एबीवीपी के साथ डॉ. आंबेडकर मिशनरीज विद्यार्थी असोसिएशन और चौधरी छोटूराम युवा छात्रा प्रदर्शन में शामिल थे। एसएफआई ने जबरन अधिवेशन को रोके जाने की निंदा की है।

 बीइंग दलित

हरियाणा में दलितों को कावड़ चढ़ाने से रोका

http://www.beingdalit.com/2015/08/dalits-not-allowed-t-perform-pooja-in-haryana.html#.VdAtJjam9dg

सबसे पहले तो अपने सभी देश वासियो को 69वे स्वतंत्र दिवस की सुभ कामनाएं देना चाहता हू। जहा आज पूरा देश स्वतंत्र का जश्न मन रहा हैं वही हरियाणा के गांव डिडवाड़ा में कावड़ लिए दलितों को मंदिर में गंगाजल चढ़ाने से रोकने का मामला सामने आया है। मैंने कल अपने ब्लॉग पर राजस्थान में हुई एक घटना का उल्लेख किया था जिसमें एक दलित महिला को मंदिर में पूजा करने से रोक गया था।  गांव के दलितों ने घटना के दो दिन बाद शुक्रवार (14/08/2015 ) को एसडीएम कार्यालय में जमकर नारेबाजी कर नाराजगी जाहिर की और एसडीएम बलराज जाखड़ को ज्ञापन सौंपा। एसडीएम ने शांति बनाए रखने व दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया। 

दलित समुदाय से संबंध रखने वाले ग्रामीणों ने कहा कि शिवरात्री के दिन वे कावड़ लेकर गांव में पंहुचे थे। जब वे गांव के मंदिर में गंगाजल को अर्पित करने लगे तो गांव के कई लोगो ने उन्हे मंदिर में गंगाजल चढ़ाने से रोक दिया। इससे उन्हें गांव से करीब 7 किलोमीटर दूर गांव बडौद के शिव मंदिर में पूजा कर गंगाजल अर्पित करना पड़ा। इन लोगों ने बताया कि पिछले दो दिनो से गांव में तनाव का माहौल है और मजबूरन उन्हें दो दिन बाद इस मामले की शिकायत देनी पड़ी। इस मामले में एसडीएम ने शांति बनाए रखने व दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।

देश तो आजाद हो गया लेकिन ये आज़ादी कुछ लोगो के लिए ही हैं। दलितों को इस आज़ादी का हिस्सा बनने में न जाने कितना समय लगेगा। कल मुझे अपने एक पाठक का मेल मिला था वो बोल रहे थे की हमें ये दलित शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाइये ये हमें छोटी जात का होने का अहसास करवाता हैं। में उसके जवाब में यही कहना चाहता हु के ये शब्द हमने अपनी इच्छा से नहीं अपनाया हैं ये हम पर जबरदस्ती थोपा गया हैं। 

 News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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