INDIA HAS BEEN RANKED AS ONE OF THE MOST RACIST COUNTRIES IN THE WORLD, HERE’S WHAT MAKES US SO

India has Been Ranked As One Of The Most Racist Countries In The World, Here’s What Makes Us So

http://www.youthkiawaaz.com/2014/09/racism-in-india/

By Asees Bhasin:

In a map of a survey released last year by The Washington Post, India was ranked as one of the most racist countries in the world. Through the course of this article, I have tried inspecting the reasons which many have caused a deep rooted xenophobia in the minds of the Indian populace.

racism-in-India

Picture Credits: Lennart Tange

Racism as an ego defence mechanism

After two hundred years of colonial domination and being labelled as barbarians, the Indian identity faced a major setback. The belief that India needed saving from itself and the initiation of an entire ‘civilizing mission’ for the populace reiterated a sense of Indian inferiority time and again. Some regressive Indian cultural practices were questioned at a global level, and many were changed. The attempt to get the Indians to emulate the Western ways of living infuriated the Indians, while making them question their own identity time and again. Post independence, in order to counter the existing mindset, a strong patriotic identity was forged. This identity led to an exaltation of Indian culture and practices, and portrayed these to be superior to British or Western tradition.

As Alfred Adler, an eminent psychologist postulated, “superiority complexes are essentially inferiority complexes in order to mask feelings of insecurity”. Does our racism stem out of a larger attempt at protection and promotion of the Indian identity?

A subservience can still be traced to British and Western structures. The common notion of beauty is attached to fair and light skin, which is evident in the search for brides/grooms who are fair skinned. The endorsement of a plethora of fairness products substantiate this. The persecution of Africans and black skinned people from Uganda and Nigeria in the past can be attributed to the deep seated contempt towards dark skin.

Racism due to the perception of an ‘out-group’

It can be noticed that countries which are racially more tolerant are usually melting pots of different nationalities and cultures. Most of these nations are also very individual centric, wherein people are self absorbed and individual identity is placed above group identity.

In India, however, post colonial rule hasn’t been much of an influx of different nationalities settling down for work and living here. Therefore, when one encounters foreigners, they are immediately viewed as an outsider and beyond the Indian social fabric. This xenophobia leads to hostility and alienation as they don’t fit in Indian standard norms and societal framework.

Racism as an act of retaliation

There have been many noted cases of visible racism against Indians around the world. These are evident in reports of crimes against Indian students in Australia, UK, politicians and business corporations discriminating against Indian brown skin, and in America, where Indian-Americans are constantly shunned. Also, Indian stereotypes are used to taint the image of the country time and again, and questions such as “Do people in India go to school on cows?” and “How can you speak in English?” are asked very often, demeaning and infuriating the Indian masses.

Racism due to competition

With the coming in of so many foreign firms, Indians are often reminded of their managerial positions in the workplace. In most scenarios, Indians form the labour workforce for international business ventures, but even if they reach corporate set-ups, they often hit a glass ceiling and find individuals of western nationalities superseding them, or above them, in the corporate ladder. This constant competition for jobs and financial comparison leads to an unhealthy relationship or mental perception towards foreigners. This makes them an out-group and subjects of Indian indignation.

Racism due to diversity in identity

Racism in India is also visible amongst Indian communities. Due to a large regional diversity, we find communities pitted up against each other ideologically, or for resources. There have been many cases of North Indian discriminating against those from the South, the mainland population isolating the North Easterns and a multitude of regional clashes. In a scenario where the country is so fragmented within itself, a foreigner seems even more alien, and a common enemy of all.

Racism due to a lack of imbibing virtues of tolerance

Children, and even adults, aren’t being taught tolerance or the beauty of harmonious living. Since this is left as a grey area, people live on with persisting mindsets. They are given no stimulus to change the way they think and the importance of international help and support doesn’t trickle down to the masses.

Furthermore, the government hasn’t put in place strong deterrence in instances of violence towards a particular community or racial abuse against foreigners who come to the country. A clear no tolerance policy towards racial intolerance must be put forth by the government, and the message should be loud and clear.

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One response to “INDIA HAS BEEN RANKED AS ONE OF THE MOST RACIST COUNTRIES IN THE WORLD, HERE’S WHAT MAKES US SO

  1. ट्विटर पर दलित प्रोफेसर मांग रहा है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से बैठने के लिए कुर्सी : http://khabar.ndtv.com/news/blogs/dalit-professor-demands-justice-from-pm
    आज सुबह इस ट्वीट पर नज़र गई तो यकीन नहीं हुआ कि इस देश में किसी को जाति के नाम पर बैठने के लिए कुर्सी-टेबल नहीं दी जा रही है। जब कुएं से पानी नहीं पीने दिया जा रहा है, बारात में घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जा रहा है तो इसमें क्या हैरत कि कोई असिस्टेंट प्रोफेसर को बैठने की जगह नहीं दे रहा होगा।
    मैं @ChoudhriAk नाम से बने हैंडल को स्क्रोल करते हुए हर ट्वीट को ध्यान से पढ़ने लगा। पता चला कि अरुण कुमार चौधरी ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, पंजाब के मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और तमाम अख़बारों और चैनलों को ट्वीट किया है। अपने ट्वीट के साथ अनुसूचित जाति आयोग से लेकर मानवाधिकार आयोग तक की गई शिकायतों की चिट्ठी जोड़ी है। एक अदद कुर्सी के लिए किसी को इस अपमान से गुज़रना पड़े तो इंडिया इंडिया चिल्लाने वालों को एक बार सोचना चाहिए कि जब तक इस तरह के भेदभाव रहेंगे तब तक क्यों न इंडिया इंडिया चीखना बंद कर दिया जाए।

    आख़िर अरुण ने चांद-तारे तो नहीं मांगे हैं। मैंने भी अरुण के ट्वीट को री-ट्वीट कर दिया। लिहाज़ा प्रतिक्रिया में कई नागरिकों का जवाब आया है कि ऐसा भी हो सकता है उन्हें यकीन नहीं हो रहा है। वे भी अरुण की इस पीड़ा के साझीदार बन गए। कुछ लोग ऐसी भी थे जो तुरंत आरक्षण के विरोध की बात करने लगे। ये वो लोग हैं जो अरुण कुमार चौधरी के साथ हो रहे बर्ताव को सही ठहरा रहे थे।

    भटिंडा के अरुण कुमार से फोन पर बातचीत हुई और उनके अनुसार जो कहानी है वो इस तरह से है।

    पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला का भटिंडा में एक रीजनल सेंटर है। वहां की लौ फैकल्टी में 6 पद हैं। सहायक प्रोफेसर का एक पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 2011 में पहली बार कांट्रेक्ट पर हुआ। जब भी इंटरव्यू हुआ अरुण के अलावा कोई पहुंचा ही नहीं लिहाज़ा विश्वविद्यालय को उन्हें 2012 में भी बहाल करना पड़ा। स्थायी पद की वैकेंसी होने के बावजूद अरुण कुमार चौधरी कांट्रेक्ट पर रखे जाते रहे। अरुण कुमार ने इसी रीजनल सेंटर से पढ़ाई भी की है। जब अरुण कुमार चौधरी ने आवाज़ उठानी शुरू कि तो उन्हें लेकर विभाग के पुराने शिक्षकों को परेशानी होने लगी। ”टीचरों के काम के बंटवारे के लिए होने वाली बैठक में मुझे नहीं बुलाया जाता था। मुझे टीचिंग से अलग काम दिया जाता था कि आप दोपहर दो बजे क्लास ख़त्म होने के बाद शाम पांच बजे तक कॉलेज में रुको। जबकि सारे टीचर घर चले जाते थे। मुझे छुट्टी के दिन भी सेंटर में बुलाया जाता था”, फोन पर बात करते हुए अरुण कुमार न तो भावुक थे न उत्तेजित। बेहद संयमित और तार्किक तरीके से अपनी बात बता रहे थे।
    उन्होंने कहा कि मेरे ख़िलाफ़ उनकी नाराज़गी तब और बढ़ गई जब पंजाब विश्वविद्यालय ने रीजनल सेंटर से राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार कराने के लिए कहा। विभाग के प्रोफसरान नहीं चाहते थे इसलिए टालने के लिए यह जिम्मा मुझे दे दिया। मैंने उस सेमिनार को कामयाब बना दिया। तब से उन्हें लगा कि अरुण तो दबने वाला नहीं है। मैं छात्रों को लगन से पढ़ा भी रहा था। तभी अचानक मुझे पता चलता है कि सेंटर के 35 लोगों ने मेरे ख़िलाफ़ लिखित शिकायत की है। दो महीने के कार्यकाल में मैंने इनमें से कई लोगों का चेहरा तक नहीं देखा था। मेरे विभाग की एक महिला टीचर ने आरोप लगाया कि मैंने उन्हें फोन कर अपशब्दों का प्रयोग किया। बाद में चपरासी से लेकर क्लर्क तक ने उस मेमोरेंडम पर दस्तख़त किये कि मैं अनुशासन तोड़ता हूं और व्यवहार ठीक नहीं है। विश्वविद्यालय ने इसकी जांच के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई जिसके सभी सदस्य रीजनल सेंटर के ही थे और उनमें से एक तो शिकायतकर्ता भी था। मेरा सामाजिक बहिष्कार भी किया गया।

    कमेटी की रिपोर्ट के बाद मुझे भटिंडा से ढाई सौ किलोमीटर दूर मांसा ज़िले के जुनीर कस्बे में भेज दिया गया। वहां कानून का कोई विभाग ही नहीं है। मुझे अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए बाध्य किया गया। ढाई साल तक मैंने वहां अंग्रेज़ी पढ़ाई जबकि मैं एलएलबी, एलएलएम हूं। मेरा तबादला नहीं हुआ, डेपुडेशन के नाम पर भेजा गया ताकि सवाल न उठे कि सौ लोग कांट्रेक्ट पर लिये गए हैं, उनमें से एक का तबादला क्यों हो रहा है। मैंने 20 मई 2015 को अप्रैल को वाइस चांसलर को ई-मेल किया कि मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है और मैं तनाव में आकर आत्महत्या कर सकता हूं। आप इसके ज़िम्मेदार होंगे। उस समय मोगा बस कांड को लेकर हंगामा हो रहा था, वाइस चांसलर को लगा कि इसे लेकर कोई और बवाल न हो जाए इसलिए मेरा तबादला वापस रीजनल सेंटर में कर दिया गया। मुझ पर दबाव डाला जाने लगा कि मैं अनुसूचित जाति आयोग से अपनी शिकायतें वापस ले लूं।

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