दलित मिडिया वाच – हिंदी न्यूज़ अपडेट 05.06.15

Dalits Media Watch

Hindi News Updates 05.06.15

 

सचिव और सीईओ से तंग दलित महिला सरपंच ने निगला जहर, मौत – नई दुनिया

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-dalit-sarpanch-swallowed-poison-fed-by-secretary-and-ceo-380747

छात्र की निर्मम हत्या, विरोध में सड़क जाम – दैनिक जागरण

http://www.jagran.com/bihar/bhojpur-12442636.html

आजादी के बाद पहली बार घोड़ी पर बैठा दलित दूल्हा, गांव में पुलिस पहरा – दैनिक भास्कर

http://www.bhaskar.com/news/c-10-2139827-NOR.html

संकट में है मालवा की अनूठी कबीर परंपरा – आई बी एन 7 खबर

http://khabar.ibnlive.com/blogs/sandip/kabir-das-malawa-378275.html

युवक की हत्या, लड़की के परिवारीजन फरार – नवभारत टाइम्स

http://navbharattimes.indiatimes.com/metro/lucknow/other-news/the-killing-of-the-young-man-the-girl-escaped-priwarijn/articleshow/47532699.cms

दलित प्रफेसर को बैठने के लिए कुर्सी नहीं, मोदी से लगाई गुहार – नवभारत टाइम्स

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/punjab-and-haryana/chandigarh/dalit-professor-of-punjabi-university-asks-pm-modi-for-cahir-and-table/articleshow/47542529.cms

देश में जातिवाद के लिए जिम्मेदार कौन है?  आज तक

http://aajtak.intoday.in/story/ichowk-who-is-responsible-for-casteism-in-india-congres-bjp-politicians-or-society-1-815541.html

 

Please Watch:

Watch how hindus treat their own people. Untouchable

https://www.youtube.com/watch?v=jTMVZ2e_UKQ&list=PL57c8xlnMOPeP7G-GqOiKLWOmIMwUm3fw&index=8

नई दुनिया

सचिव और सीईओ से तंग दलित महिला सरपंच ने निगला जहर, मौत

http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/bhopal-dalit-sarpanch-swallowed-poison-fed-by-secretary-and-ceo-380747

ग्राम अवध की दलित महिला सरपंच ने पंचायत सचिव और जनपद सीईओ सं तंग आकर जहर निगल कर आत्महत्या कर ली। मौके से मिले सुसाइड नोट में उसने सचिव और साईओ पर छेड़छाड़ और दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

मिली जानकारी के अनुसार ग्राम अवध की दलित महिला सरपंच सुगना बाई ने मंगलवार की रात जहर निगलकर आत्महत्या कर ली। मौके से मिले सुसाइड नोट ने प्रशासन को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। सुसाइड नोट में मृतका ने लिखा है कि उसे सचिव और सीईओ काम नहीं करने देना चाह रहे थे। जब मैंने इसका विरोध किया तो मेरे साथ छेड़खानी की गई और दुष्कर्म का भी प्रयास किया गया गया। मैंने इसकी शिकायत 15 दिन पहले डीएम से भी की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इन सबसे तंग आकर मैं मौत को गले लगा रही हूं।

इस मुद्दे पर जब जनपद सचिव और सीईओ से बात की गई तो उन्होंने लगाए गए आरोप को बेबुनियाद और झूठा बताया । वहीं डीएम का कहना है कि उनके पास बस सचिव की शिकायत की गई थी। ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि अगर सचिव की शिकायत की गई थी तो उसपर कार्रवाई क्यों नहीं की गई। ऐसे में प्रशासन का रवैया संदेह के घेरे में है।

दैनिक जागरण

छात्र की निर्मम हत्या, विरोध में सड़क जाम

http://www.jagran.com/bihar/bhojpur-12442636.html

आरा : भोजपुर जिले के कृष्णगढ़ थाना के पीपरपांती गांव में एक दलित छात्र की निर्मम तरीके से हत्या किये जाने से गुस्साई भीड़ गुरुवार को सड़क पर उतर आयी। शव के साथ सरैयां-बलुआं पथ को जाम कर घंटो विरोध-प्रदर्शन किया। सड़क जाम कर रही भीड़ घटनास्थल पर खोजी कुत्ता मंगाने तथा हत्यारों को जल्द से जल्द चिह्नित कर उन्हें गिरफ्तार करने की मांग कर रही थी। बाद में सदर एसडीपीओ विनोद कुमार राउत के प्रयास से सड़क जाम हट सका।

मारा गया छात्र किशुनदेव गोड़ (18) पीपरपांती के सुरेन्द्र गोड़ का पुत्र बताया जाता है, जो इंटर में पढ़ता था। बकौल परिजन दो जून यानी मंगलवार को गांव के सरपंच शिव शंकर सिंह के पुत्र अजित सिंह का तिलक आया था जिसमें भाग लेने के लिए किशुनदेव गोड़ अपने घर से गया था कि अचानक देर रात में वह रहस्यमय ढंग से लापता हो गया। बुधवार तक कहीं कुछ पता नहीं चला तो परिजनों ने इसकी सूचना संबंधित थाने को दी।

इस बीच गुरुवार की सुबह गांव के दक्षिण बह्मा स्थान के समीप स्थित बड़े गड्ढे में खुदाई कर दफनाया गया छात्र का शव बरामद होते ही सनसनी फैल गयी। छात्र का केवल सिर दिखाई पड़ रहा था बाकी धड़ जमीन में दफन था। इस दौरान सूचना मिलते ही कृष्णगढ़ थाना प्रभारी राम विलास तथा बड़हरा थाना प्रभारी विजय कुमार सिंह घटनास्थल पर पहुंच गये।

इसके बाद जमीन की खुदाई कर शव को बाहर निकाला गया। घटनास्थल के आसपास कुछ दूर तक खून के भी निशान पाये गये हैं। पुलिस के अनुसार किसी गुप्त स्थान पर हत्या कर साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से शव को जमीन में दफनाया गया है। शव को देखने से प्रतीत हो रहा कि किसी घातक हथियार से सिर पर मारकर हत्या की गयी है।

शव बरामद होते ही ग्रामीण आक्रोशित हो गये तथा शव के साथ सरैयां-बलुआं पथ को जाम कर दिया। पुलिस हत्या की इस घटना को आपसी रंजिश सहित कई ऐंगल से जोड़कर देख रही है।

पटना से मंगाया गया खोजी कुत्ता

आरा : किशुनदेव गोड़ की हत्या मामले में सुराग पाने के लिए गुरुवार की शाम पटना से खोजी कुत्ता मंगाया गया। शव जहां दफनाया गया था वहां खोजी कुत्ते को ले जाया गया। खून के गिरे पड़े निशानों को सुंघाकर कातिलों के बारे में सुराग पाने का प्रयास किया गया। आठ को एसएसबी की बहाली में जाने वाला था

आरा : मारा गया छात्र इसी साल इंटर सांइस में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ था। सेना में बहाली के लिए तैयारी कर रहा था। आठ जून को एसएसबी में बहाली के लिए काल लेटर आया हुआ था और उसे धनबाद जाना था। लेकिन निर्मम तरीके से उसकी हत्या कर दी गयी। जिसके बाद मां-बाप की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।

हत्या की घटना से टूटी परिजनों की उम्मीदें

दीपक/ संतोष,पीपरपांती (आरा) : ‘अब तोहरा बिन कइसे जियब हो बबुआ..।’ करूणाभरा यह विलाप उर्मिला देवी का है। उसका बड़ा पुत्र किशुनदेव गोड़ अब इस दुनिया में नहीं है। पुत्र की हत्या के वियोग में मां का रो-रोकर बुरा हाल था। आसपड़ोस की महिलाएं ढांढस बंधाने में लगी हुई थीं। हत्या की इस घटना को लेकर पीपरपांती में जहां एक तरफ मातम पसरा हुआ था वहीं दूसरी तरह परिजनों का क्रंदन मातमी सन्नाटे को भंग कर रहा था। कृष्णगढ़ थाना के पीपरपांती गांव निवासी सुरेन्द्र गोड़ के कुल तीन पुत्रों में किशुनदेव गोड़ सबसे बड़ा था तथा उससे परिजनों को काफी उम्मीदें थीं। फौज में बहाल होने का सपना उसकी हत्या के साथ ही दफन हो गया।

दैनिक भास्कर

आजादी के बाद पहली बार घोड़ी पर बैठा दलित दूल्हा, गांव में पुलिस पहरा

http://www.bhaskar.com/news/c-10-2139827-NOR.html

05.06.15 2

पाथरेड़ी (कोटपूतली) से आनंद चौधरी. राजधानी जयपुर से कोटपूतली के गांव पाथरेड़ी की दूरी भले ही 100 किमी. है, लेकिन सामाजिक भेदभाव का दर्द मिटाने में यहां 100 साल लग गए। गुरुवार को गांव में पहली बार घोड़ी पर किसी दलित दूल्हे की निकासी निकली, लेकिन पूरी कमान पुलिस के हाथों में थी। बारातियों से ज्यादा खाकी वर्दी पहने लोग नजर आ रहे थे। सादा वर्दी में भी बाराती बनकर पुलिसकर्मी तैनात थे।

हर गली-नुक्कड़ पर पुलिस का पहरा था। यह दृश्य यह बताने के लिए काफी है कि राज्य भले ही तरक्की की रफ्तार पकड़ रहा है, लेकिन उसका सामाजिक ताना-बाना अब भी रूढ़ीवादी सोच में फंसा हुआ है। दलित दूल्हे को देखने के लिए गांव में ऐसी भीड़ जुट गई मानो कोई अनूठी घटना हुई हो।

गांव में सुबह से ही भारी गहमागहमी रही। पूरा गांव भी पुलिस छावनी बना हुआ था। पुलिस-प्रशासन के साथ विधायक, प्रधान, सरपंच और अन्य जनप्रतिनिधि इस समझाइश में लगे रहे कि घोड़ी पर निकासी निकलने दी जाए। आखिर में वे सफल हुए। सभी समाजों की एकराय के बाद दलित दूल्हे को घोड़ी पर बैठाने का फैसला लिया गया। तय था निकासी का रूट, बदलने की मांग की तो पुलिस के हाथ-पांव फूले पुलिस और प्रशासन ने निकासी के लिए पहले ही रूट तय कर दिया। दलित परिवार पर इसी रूट के मुताबिक निकासी निकालने का दवाब था।

लेकिन भौमियाजी के मंदिर से लौटते वक्त दलित परिवारों ने निकासी को एक जाति विशेष के माेहल्ले की तरफ ले जाने की इच्छा जताई। इस मांग पर एकबारगी पुलिस- प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। पुलिस ने पहले तो साफ इनकार कर दिया लेकिन जब बात बढ़ने लगी तो पहरा और सख्त कर निकाली गई।

एक पहल…और बदल गया इतिहास

दूल्हे के बड़े भाई इंद्राज ने अनिल की निकासी घोड़ी पर निकाले जाने के संबंध में पहले गांव में बात की, फिर प्रशासन को सुरक्षा का ज्ञापन दिया। इसमें बताया कि 1993 में भी यहां दलित की बिंदोरी निकालने पर दलित परिवारों को पीटा गया था। प्रशासन ने चार दिन की तैयारी के बाद शांतिपूर्ण तरीके से निकासी निकलवाई।

खौफ : दलितों ने ही किया घोड़ी देने से इनकार

सामाजिक पिछड़ेपन का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि दलित को घोड़ी पर बैठाने की बात सुनकर गांव के दलित परिवार ही सहम गए। गांव में दलित परिवारों के पास चार घोडिय़ां हैं, लेकिन कोई उन्हें देने को तैयार नहीं हुआ। हालांकि, गांव में होने वाली अन्य शादियों में इनकी ही घोड़ियां जाती हैं। आखिर 30 किलोमीटर दूर बंदेड़ी गांव से घोड़ी मंगाई गई।

विरोध : गांव से चले गए 50 लोग

निकासी से पहले 50 लोग गांव से बाहर चले गए। इनमें से 35 वो थे, जिन्हें प्रशासन ने पाबंद किया था। निकासी के वक्त अप्रिय वारदात की आशंका के चलते इन्हें छह माह के लिए पाबंद किया गया था।

पिछड़ेपन की दो कहानियां

23 सितंबर 1993: गांव के रामचंद्र रैगर की बिंदौरी निकाली जा रही थी। न घोड़ी थी, न लंबा-चौड़ा लवाजमा। बिंदौरी जैसे ही एक जाति विशेष के मोहल्ले में पहुंची, सभी लोगों को घेरकर लाठियों से पीटा गया।

जनवरी 2015: गांव के ही कुछ लोग चाहते हैं कि दलितों के लिए अलग से सामुदायिक केंद्र नहीं हो, इसके लिए पाथरेड़ी गांव के बाहर बने दलित समुदाय के सामुदायिक केंद्र को पिछले एक साल में तीन बार तोड़ा जा चुका है।

आई बी एन 7 खबर

संकट में है मालवा की अनूठी कबीर परंपरा

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रात का समय है, ठण्ड चरम पर है, चारो ओर कुहासा है, खेतों से ठंडी हवाएं आ रही है, बिजली नहीं है लेकिन  गांव के दूर एकांत में कंकड़ पर लोग बैठे हैं, बीडी के धुएं और अलाव के बीच लगातार भजन जारी है और सिर्फ  भजन ही नहीं उन पर जमकर बातचीत भी हो रही है कि क्यों हम परलोक की बात करते है, क्यों कबीर साहब ने  आत्मा की बात की या क्यों कहा कि “हिरणा समझ बूझ वन चरना”।

लोगों की भीड़ में वृद्ध, युवा और महिलाएं  बच्चे भी शामिल हैं। यह है मालवा का एक गांव। यह कहानी एक गांव की नहीं कमोबेश हर गांव की है जहां एक समुदाय विशेषकर दलित लोग रोज दिन भर जी तोड़ मेहनत के बाद शाम को अपने काम निपटाकर बैठते है और सत्संग करते है, कोई आडम्बर नहीं, कोई दिखावा नहीं और कोई खर्च नहीं।

ये मेहनतकश लोग कबीर को सिर्फ  गाते ही नहीं वरन अपने जीवन में भी उतारते हैं।

देवास का संगीत से बहुत गहरा नाता है। देवास के मंच पर शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय कलाकार ना होगा जिसने प्रस्तुति ना दी हो, और जब बात आती है लोक शैली के गायन की तो कबीर के नाम की चर्चा स्‍वाभाविक ही होने लगती है। यह सिर्फ कबीर का प्रताप नहीं बल्कि गाने की शैली, यहां की हवा, मौसम, पानी और संस्कारों की एक परम्परा है, जो सदियों से यहां निभाई जा रही है। गांव-गांव में कबीर भजन मंडलियां हैं, इसमे वो लोग है जो  दिनभर मेहनत करते हैं, खेतों में, खलिहानों में और फ़िर रात मे भोजन करके आपस मे बैठकर सत्संग करते हैं।

एक छोटी सी ढोलकी और एक तम्बूरे पर कबीर के भजन गाए जाते हैं। किसी भी दूर गांव मे निकल जाइए यह रात का दृश्य आपको अमूमन आपको हर जगह दिख ही जाएगा। इन्हीं मालवी लोगों ने इस कबीर को ज़िंदा रखा है  और आज तक, तमाम बाजारवाद और दबावों के बावजूद भजन गायकी की इस परम्परा को जीवित रखा है। शाश्वत  रखा है आम लोगों ने जिनका शास्त्रीयता के कृत्रिमपन से कोई लेना-देना नहीं है।

बात बहुत पुरानी तो नहीं पर, पिछली सदी का अंतिम दशक था, जब हम लोग एकलव्य संस्था के माध्यम से देवास जिले में कुछ जन विज्ञान के काम कर रहे थे। शिक्षा, साक्षरता, विज्ञान शिक्षण के नए नवाचारी प्रयोग, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नया गढ़ने की कोशिशें जारी थीं।

एक दो बार हमने घूमते हुए पाया कि मालवा में गांवों में कुछ लोग खास करके दलित समुदाय के लोग कबीर को बहुत तल्लीनता से गाते हैं, और रात भर बैठकर  गाते ही नहीं बल्कि सुनते और गाए हुए भजनों पर चर्चा, जिसे वे सत्संग कहते थे, करते हैं।

यह थोड़ा मुश्किल  और जटिल कार्य था हम जैसे युवा लोगों के लिए कि दिन भर की मेहनत और फिर इस तरह से गाना बगैर किसी  आयोजन के और खर्चे के और वो भी बगैर चाय पानी के। थोड़ा-थोड़ा जुड़ना शुरू किया, समझना शुरू किया, पता  चला कि कमोबेश हर जगह हर गांव में अपनी एक कबीर भजन मंडली होती है। बस फिर क्या था दोस्ती हुई और  जल्दी ही यह समझ आ गया कि भजन गाने की यह परम्परा सिर्फ वाचिक परम्परा है।

पिछले सैंकड़ों बरसों से यह गाने बजाने की परम्परा मालवा में चली आ रही है। कबीर भजनों की इस परम्परा का पता जब एकलव्य संस्था के लोगो को लगा था, तो सबसे पहला प्रश्न यह था कि इन लोगों में दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद ऊर्जा कहां से आती है कि रातभर बैठकर भजन गाते हैं और खुलकर चर्चा करते हैं।

स्व. नईम जी और दीगर लोगों से सीखा कि कबीर की वाचिक परम्परा मालवा और देश के कई राज्यों में बरसों से जारी है और स्व पंडित कुमार गन्धर्व ने भी इसी मालवे की कबीर की वाचिक परम्परा से प्रभावित होकर बहुत कुछ नया गुना, सुना और बुना था।

बस फिर दोस्ती हुई नारायण देल्म्या जी से जो तराने के पास के गांव बरन्डवा के रहने वाले थे, वे हमारे गुरु बने, फिर प्रहलाद सिंह टिपान्या जी से दोस्ती हुई धीरे-धीरे हमने देवास में एकलव्य संस्था में एक अनौपचारिक “कबीर भजन एवं विचार मंच” की स्थापना की। हमारे साथी स्व. दिनेश शर्मा इस काम  में जी जान से जुट गए और हम लोग भी साथ में थे।

हमारे साथ डॉ. राम नारायण स्याग थे, मार्ग दर्शन के लिए हर माह की दो तारीख को आसपास की मंडलियां आती भजन गाती और सत्संग होता। बहुत वैज्ञानिक धरातल पर  बातचीत होती। शुरू में थोड़ा विवाद हुआ क्योकि जिन पाखंडों और दिखावों का कबीर विरोध करते थे, ये मंडलियां  उन्हीं बातों को करती थी। फिर लम्बी चर्चा होती और धीरे से हम सीखते कि इस वर्ग में चेतना बहुत जरुरी है और यह कबीर के माध्यम से निश्चित ही आ सकती है।

भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद् के सहयोग से हमने एक छोटा सा दस्तावेजीकरण करने का कार्य अपने हाथों में लिया जिसमें हम इस वाचिक परम्परा को लखित रूप में दर्ज कर रहे थे। होता यह था कि दिनेश मैं या  अन्य साथी कबीर मंडलियों के साथ बैठते और जो वो गाते या बोलते थे या उनके पास कोई डायरी होती हम उसमे  से लिख लेते उसे टाइप करा लेते और फिर कबीर के मानकीकृत बीजक में से मिलान करते और फिर मंडलियों से  चर्चा करते कि यह शब्द क्यों बदला गया या अर्थ क्या है आदि आदि।

प्रहलाद जी की पहली भजन के कैसेट डॉ. सुरेश पटेल के साथ हम लोगों ने सतप्रकाशन इंदौर से बनवाई थी और फिर यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसका जिक्र करना ही मुश्किल है। गत वर्ष प्रहलाद जी को पदम् श्री से  विभूषित किया गया है। इस बीच कबीर भजन विचार मंच का काम बहुत आगे बढ़ा। तथाकथित कबीर पंथियों को  इस कार्यक्रम से दिक्कतें भी हुई।

साहित्य, ललित कलाओं और गीत संगीत मालवा की खासियत रही है। शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य गायक पंडित कुमार गन्धर्व ने इस शहर को अपने जीवन में जो स्थान दिया वह तो सभी जानते है। टीबी जैसी बीमारी होने के  बाद जब उनका एक फेफड़ा निकाल दिया गया तो हवा बदलने के लिए वे इस शहर में यहां आये और फिर यही के  होकर रह गए। बीमारी के दौरान जब वे अपना इलाज करवा रहे थे तो अपने आसपास कबीर मंडलियों को इकठ्ठा  कर लेते थे और ध्यान से सुनते थे। कालान्तर में उन्होंने बाकी सब छोड़कर कबीर की ऐसी चदरिया बुनी कि सारी दुनिया देखती रह गई।

इस बीच स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका से प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़ हमसे एक बार आकर मिलीं तो उन्हें यह बहुत अच्छा लगा। और फिर उन्होंने ऐसा काम हाथ में लिया कि पिछले दस वर्षों से वो यही काम कर रही है। इस बीच वे प्रहलाद जी को अमेरिका ले गई। वहां उनके कार्यक्रम कई विश्व विद्यालयों में करवाए हैं। प्रो. लिंडा ने खुद हिन्दी सीखी और गहरा काम किया।

आज वे देश-विदेश में कबीर की वाचिक परम्परा की विशेषज्ञ हैं। मालवा के भजनों और कबीर  की सुवास लिंडा के लिए यह काम बड़ा आश्चर्यजनक था कि कैसे सैकड़ों बरसों से लोग वाचिक परम्परा को निभाते  चले आ रहे है, बस फिर क्या था लिंडा पहुंच गई मालवा और गांव-गांव में घूमकर भजन इकठ्ठे किए।

भजनों का  अंग्रेज़ी अनुवाद किया गया और फिर ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से उनकी किताबें आई। लिंडा यही नहीं रुकी, उन्होंने देश में और अमेरिका में भी मालवी भजनों को पहुंचाया। प्रहलाद सिंह तिपान्या और उनकी मंडली को तीन माह तक अमेरिका के दर्जनों विश्वविद्यालयों में घुमाया और उनके कार्यक्रम आयोजित किए। बेंगलुरु की शबनम वीरमनि ने जब यह सुना तो वे भी दौड़ी चली आईं और चार फिल्में फोर्ड फाउंडेशन के साथ मिलकर बना डाली।

इस तरह से मालवी कबीर के भजनों की प्रसिद्धी देश-विदेश में पहुंची। प्रहलाद सिंह टिपान्या को भारत सरकार ने पदमश्री से समानित किया। मालवा के अंचल में पसरी यह निर्गुणी भजनों की यह वृहद और सशक्त परम्परा, इस बात की, इस परंपरा के जरिए। समाज के निचले तबके से बदलाव की कोशिशें जारी है।

पिछले कई बरसों में यह कबीर भजन एवं विचार मंच का काम छूट गया था, परन्तु आसपास के लोगों में एक बेचैनी थी कि कैसे इस काम को शुरू किया जाए क्योंकि इस कार्य के पहले हिस्से में एकलव्य संस्था ने आर्थिक  सहयोग जुटाया था और भारतीय इतिहास अनुसन्धान एवं शोध परिषद् से अनुदान भी लिया था, परन्तु अब यह  मामला थोड़ा टेढ़ा था। नारायण जी को सबसे ज्यादा दुःख था कि एक अच्छा कम बंद हो गया था।

नारायण जी बताते हैं कि पहले इस तरह के कार्यक्रमों से हमारे दलित समुदाय में चौका आरती करके कबीर गाने वालों की संख्या ज्यादा थी और यह सब ब्राह्मण समाज की नक़ल था, जिसमें समाज के गरीब लोग फंसते थे, और उनका आर्थिक शोषण भी कबीर पंथी करते थे, भजन विचार मंच शुरू होने से इस बुरी प्रथा पर गहरी चोट पड़ी थी, और यह काम नौ दस बरस चलने के बाद बंद हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण था।

अतः हमने तय किया कि हम इसे फिर से शुरू करेंगे सबसे बड़ा संकट वित्त का था क्योंकि मंडलियों को आनेजाने का किराया देना,उनके खाने और एक रात रहने की व्यवस्था करना मुश्किल था। सो हमने दोस्तों के साथ यह काम हाथ में लिए और शबनम वीरमणि, रवि गुलाटी, राम नारायण स्याग, अरविन्द सरदाना, आसिफ शेख, राजेश खिन्दरी, सुरेश मिश्र प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़, आदि  जैसे दोस्तों ने शुरुआती दौर में मदद की और हमने 2 जून 2014 को फिर से कबीर भजन विचार मंच की शुरुआत  की।

इस साल में हमने महिला मंडलियों को ज्यादा आमंत्रित किया और उनसे बात की क्योकि सबसे ज्यादा वे ही आध्यात्मिक शोषण की शिकार होती है। अस्तु ज्यादा मंडलियां महिलाओं की आई और उनसे हमने भजन भी सुनें और चर्चा भी की , कबीर के साथ मीरा,रविदास, गोरखनाथ, आदि जैसे संतों की बातों का सत्संग किया। अब आगे यह है कि हम इस काम को जारी रखना चाहते हैं पर वित्त और जगह की बड़ी समस्या है, यदि देवास नगर निगम हमें कोई जगह माह की हर 2 तारीख को निशुल्क मुहैया करवा दे तो हमें दिक्कत नहीं होगी। हमारा मानना है कि इस समय कबीरदास का लिखा दर्शन और जीवन पद्धति बहुत मौंजू है क्योंकि समाज में स्थितियां विकट होती जा रही है। 70 साल के नारायण जी गत 55 बरसों से कबीर के साधक हैं और भजन गा रहे हैं। उन्होंने कबीर को जिया है और लोगों को जीना सिखाया भी है।

यह जरूरी है कि मालवा की इस जागृत लोक परम्परा को संरक्षित रखा जाए और जो बेहतरीन काम हुआ है, उससे सीख लेकर आगे बढ़ा जाए। स्थानीय प्रशासन और सुशासन के प्रतिनिधि इस काम को आगे बढ़ाकर इसमे एक नई भूमिका अदा कर सकते हैं, साथ ही पंडित कुमार गन्धर्व संगीत कला अकादमी, देवास इसमें महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकती है।

नवभारत टाइम्स

युवक की हत्या, लड़की के परिवारीजन फरार

http://navbharattimes.indiatimes.com/metro/lucknow/other-news/the-killing-of-the-young-man-the-girl-escaped-priwarijn/articleshow/47532699.cms

छावनी थाना क्षेत्र के पखेरवा गांव में बुधवार की सुबह 22 साल के रिंकू यादव की लाश बरामद हुई। युवक के परिवारीजनों ने गांव के ही एक दलित परिवार पर हत्या की आशंका जताई है। एसओ आरके गौतम ने बताया कि मृतक के गले पर चोट के गहरे निशान पाए गए हैं, जिससे आशंका है कि पहले युवक की गला दबाकर हत्या की गई और फिर शव को पेड़ की डाल में फंसाकर लटका दिया गया।

गौतम ने बताया कि मृतक की जेब से एक लड़की की तस्वीर भी बरामद हुई है, जिससे उसका अफेयर बताया जा रहा है। लड़की दलित जाति की है और घटना के बाद से उसका पूरा परिवार फरार हो गया है। वहीं, युवक के पिता भगेलू यादव का आरोप है कि लड़की के परिवारीजनों ने मंगलवार की शाम को ही उनके बेटे को अगवा कर हत्या कर दी। फिलहाल, पुलिस शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज कर मामले की छानबीन में जुट गई है।

नवभारत टाइम्स

दलित प्रफेसर को बैठने के लिए कुर्सी नहीं, मोदी से लगाई गुहार

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/punjab-and-haryana/chandigarh/dalit-professor-of-punjabi-university-asks-pm-modi-for-cahir-and-table/articleshow/47542529.cms

prof Arun Kumar

पंजाबी यूनिवर्सिटी के प्रफेसर अरुण कुमार चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्वीट करके अपने बैठने के लिए कुर्सी की मांग की है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा,’चमार जाति का होने की वजह से मुझे स्टाफ रूम में कुर्सी और टेबल नहीं दी गई है। 21 वीं सदी में भी मैं यह भेदभाव झेल रहा हूं।'<

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