Dalits Media Watch-Hindi News Updates 28.05.15

Dalits Media Watch

Hindi News Updates 28.05.15

 

दलित छात्रा का अपहरण कर गैंगरेप – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/city/allahabad/allahabad-crime-news/ganag-rape-in-allahabad-hindi-news/

पानी भरने पर दलित को जिंदा जलाने की कोशिश – अमर उजाला

http://www.amarujala.com/news/states/madhya-pradesh/dalits-condition-in-madhya-pradesh-hindi-news-sy/

दलित परिवारों पर हमला के मामले में आइजी, एसएसपी व डीसी को नोटिस – दैनिक जागरण

http://www.jagran.com/news/state-12416465.html

दलित उत्पीड़न का सिलसिला – दैनिक जागरण

http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-12416504.html?src=HP-EDI-ART

अमर उजाला

दलित छात्रा का अपहरण कर गैंगरेप

http://www.amarujala.com/news/city/allahabad/allahabad-crime-news/ganag-rape-in-allahabad-hindi-news/

01

सरायइनायत इलाके में मंगलवार देर रात दसवीं में पढ़ने वाली दलित लड़की को घर के बाहर से बाइक पर अगवा करने के बाद झाड़ी में उसके साथ तीन युवकों ने बलात्कार किया। रात भर मनमानी करने के बाद भोर में उसे एक भट्ठे के बाहर छोड़कर युवक भाग गए। छात्रा ने घर जाकर बताया तो परिजन उसे लेकर थाने पहुंचे।

छात्रा ने पूरा किस्सा बताया तो पुलिस ने छापेमारी कर एक आरोपी को पकड़ लिया। मगर फिर जाने क्या हुआ कि पुलिस ने इस घटना को दूसरा रूप दे दिया। पुलिस ने नामजद रिपोर्ट लिखी पर उसमें से बलात्कार का आरोप ही हटा दिया।

दलित परिवार की यह 16 साल की छात्रा मंगलवार रात करीब आठ बजे छोटी बहन के साथ घर के बाहर निकली थी तभी आरोप है कि दो युवकों ने उसे खींचकर बाइक पर बैठा लिया। फिर वे छात्रा को बाइक पर लेकर बढ़ गए। छात्रा का कहना है कि रास्ते में एक और युवक साथ हो लिया।

वे तीनों उसे सुनसान स्थान पर झाड़ी में ले गए। वहां उन तीनों ने छात्रा के साथ कुकर्म किया। रात भर मनमानी करने के बाद भोर में छात्रा को कोटवा गांव के एक भट्ठा के बाहर छोड़कर तीनों भाग गए। वहां से छात्रा ने किसी तरह अपने घर पहुंची और परिजनों को आपबीती सुनाई। घटना के बारे में जानकर परिजन सन्न रह गए।

वे बेटी को लेकर सरायइनायत थाने गए और पुलिस को जानकारी दी। छात्रा ने अपहरण और गैंगरेप के बारे में बताया। पुलिस ने छापा मारकर एक आरोपी को पकड़ भी लिया। मगर फिर जाने क्या हुआ कि पुलिस ने छात्रा के पिता से सिर्फ बहला-फुसलाकर भगाने और दलित उत्पीड़न की तहरीर लेकर अजगैयां गांव निवासी सौरभ बटेल और सुनील यादव के खिलाफ केस लिखा।

छात्रा का मेडिकल टेस्ट भी नहीं कराया। इस बारे में पूछने पर सीओ फूलपुर कृष्ण गोपाल सिंह ने कहा कि छात्रा के पिता ने जो तहरीर दी उसी पर रिपोर्ट दर्ज की गई है। मगर छात्रा ने तो थाने में पुलिस के सामने बयान दिया था कि उसे बाइक पर उठाकर ले जाने के बाद ‘गलत काम’ किया गया,इस पर पुलिस ने चुप्पी साध ली है।

अमर उजाला  

पानी भरने पर दलित को जिंदा जलाने की कोशिश

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मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में दबंगों ने एक दलित नौजवान को पानी भरने को लेकर हुए विवाद में जिंदा जलाने की कोशिश की। पीड़ित युवक का एक पैर बुरी तरह झुलस गया है और उसे सागर के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

यह घटना सागर जिले में बीना के गांव बेलई की है। समरत अहिरवार नामक युवक सरकारी नल पर पीने का पानी भरना चाहता था। इस पर गांव के ही रामसहाय रिछारिया नाम के व्यक्ति से उसकी कहासुनी हो गई। समरत अपने दो बर्तनों में पानी भरना चाहता था। लेकिन उसे रोका गया तो उसने आपत्ति की। बात मारपीट तक पहुंच गई। गांव के दूसरे लोगों ने बीच बचाव करा दिया।

लेकिन समरत ने पुलिस को बताया कि वह पछतावे के लिए रिछारिया से माफी मांगने गया तो उस पर जलती चिमनी फेंक दी। जिससे वह झुलस गया। एडिशनल एसपी डीआर तेनिवार ने बताया कि आरोपी फरार है और समरत का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।

दैनिक जागरण

दलित परिवारों पर हमला के मामले में आइजी, एसएसपी व डीसी को नोटिस

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अमृतसर : जिले के घ¨रडा थाना के अंतर्गत गांव अंचितकोट में दलित परिवारों पर हमला के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने आइजी बॉर्डर रेंज, एसएसपी देहाती व डिप्टी कमिश्नर को नोटिस जारी किया है। आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजकुमार वेरका ने पूरे मामले की एक्शन रिपोर्ट के साथ उन्हें 30 मई को अमृतसर सर्किट हाउस में तलब किया है।

आयोग ने बाथरूम में नहा रही महिला को जबरन बाहर निकाल कर नग्नावस्था में मारपीट की धारा न लगाने पर ऐतराज जताते हुए पुलिस प्रशासन को यह धारा भी लगाने के निर्देश दिए हैं। बता दें कि जमीन विवाद को लेकर अंचितकोट में दलित परिवार पर मंगलवार सुबह हमला किया गया था। इसमें सतनाम सिंह, ध्यान सिंह, वरियाम सिंह, जगदीश सिंह, मलकीत सिंह व बलबीर कौर बुरी तरह जख्मी हो गई थी। गुरु नानक देव अस्पताल में उनका उपचार चल रहा है। आयोग के संज्ञान लेने के बाद इस मामले में पुलिस ने गांव के अकाली सरपंच अमरीक सिंह, पंचायत सदस्य गुरमुख सिंह, खासा थाना के मुंशी जोरावर सिंह समेत एक दर्जन से अधिक लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है।

डॉ. वेरका ने बताया कि गांव में दलित परिवारों को 1973 में जमीन अलाट किया गया था। उनके पास इसके दस्तावेज भी हैं। अलबत्ता दबंगों के इशारे पर पुलिस ने 14 दलितों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया था। सभी परिवार सोमवार को ही इसकी शिकायत लेकर उनके समक्ष पेश हुए थे। उनकी गिरफ्तारी पर आयोग ने रोक लगा दी थी। उन्हें घर जाने को कहा गया था। मंगलवार सुबह गांव के सरपंच ने पुलिस के साथ मिलकर दलितों पर हमला किया था

दैनिक जागरण

दलित उत्पीड़न का सिलसिला

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04

वैसे तो दलित-उत्पीड़न की घटनाएं हमारे दैनंदिन जीवन का अंग बन चुकी हैं, फिर भी बीच-बीच में ऐसी कुछ घटनाएं घट जाती हैं कि आमतौर पर निर्लिप्त रहने वाला समाज चिंतित हो उठता है। हाल के दिनों में कई ऐसी ही घटनाएं सामने आई हैं जो चिंता पैदा करने वाली हैं। एक घटना राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास की है जहां हथियारों से लैस सैकड़ों लोग दलितों पर टूट पड़े।

इन लोगों ने एक ही परिवार के चार दलितों की हत्या कर दी। इसमें तीन को ट्रैक्टर से कुचलकर मार डाला, जबकि एक व्यक्ति को गोली से उड़ा दिया गया। दलित परिवार की महिलाओं पर भी क्रूरता की गई और एक महिला की आंख में लकड़ी घोंपकर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया गया, जबकि दूसरी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया गया। जाट बहुल डांगावास में हुई इस वारदात के तीसरे दिन पुलिस एक आरोपी को गिरफ्तार कर सकी। लोग अभी डांगावास की इस घटना को भूले भी नहीं थे कि उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के हरेवा में पांच दलित महिलाओं को चार घंटे तक नग्न घुमाने का शर्मनाक काम किया गया। इसके अलावा कुछ और ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जहां दलित दूल्हों के घोड़ी पर बैठने का विरोध हिंसक ढंग से किया गया। इस तरह की ताजा घटना रतलाम में हुई।

यहां दलित दूल्हे को हमले से बचाने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस तैनात हुई। दूल्हे को हेलमेट भी पहनाया गया ताकि कोई उसे पत्थर न मार सके। जब-जब इस तरह की वारदातें होती हैं, दलितों के साथ-साथ मानवाताबोध संपन्न अन्य लोगों में भी चिंता की लहर दौड़ जाती है। वे घटनास्थल का मुआयना कर असहिष्णु तत्वों के हिंसक कामों की निंदा करने एवं उनके विवेक को झकझोरने का अभियान चलाते हैं, लेकिन नतीजा शून्य निकलता है। एक अंतराल के बाद दलित-द्वेषी भावना का पुन: प्रकटीकरण हो ही जाता है।

दलित उत्पीड़न के खिलाफ हिंदू विवेक को झकझोरने का अभियान इसलिए निष्प्रभावी रहता है, क्योंकि दलितों की सत्ता हिंदू मान्यताओं द्वारा अस्वीकृत है। मानवेत्तर रूप में चिह्नित किया गया दलित समुदाय जब आम लोगों की भांति अपने मानवीय अधिकारों के प्रदर्शन की कोशिश करता है,समर्थ हिंदुओं का एक तबका उन्हें उनकी हैसियत बताने के लिए डांगावास, हरेवा जैसे कांड अंजाम दे देता है।

हालांकि सदियों से जारी इस उत्पीड़न से आजिज आकर जहां लाखों दलितों ने निज-धर्म का परित्याग किया, वहीं तमाम ने प्लासी और कोरेगांव में शत्रु सेना का साथ देकर देश को गुलाम तक बनवा दिया, लेकिन हिंदू समाज ने इससे कोई सबक नहीं लिया। परिणाम यह है कि दलित उत्पीड़न का सिलसिला आज भी कायम है। आखिर दलित उत्पीड़न की घटनाओं का प्रतिकार कैसे हो? इस मामले में अंबेडकर ने वषरें पहले कहा था कि ‘ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे समर्थ समाज द्वारा हो रहे अन्याय का प्रश्न हैं, एक मनुष्य पर हो रहे अन्याय का प्रश्न नहीं हैं। उन्होंने इसे वर्ग संघर्ष बताया था। उनका मानना था कि किसी भी संघर्ष में जीत उन्हीं की होती है जिनके हाथ में साम‌र्थ्य होती है। जिनमें साम‌र्थ्य नहीं उन्हें अपनी विजय की अपेक्षा रखना फिजूल है।

दलितों को अपने शोषण-उत्पीड़न का प्रतिकार के लिए बल संचित करने का सुझाव देते हुए उन्होंने कहा था कि ‘मानव समाज के पास तीन प्रकार का बल होता है। एक है मनुष्य-बल। दूसरा है धन-बल और तीसरा है मनोबल। मनुष्य बल की दृष्टि से दलित अल्पसंख्यक हैं और वे संगठित भी नहीं हैं। धन-बल की दृष्टि से देखा जाए तो उनके पास थोड़ा-बहुत जन-बल तो है भी, लेकिन धन-बल तो बिल्कुल ही नहीं है।

मानसिक बल की तो उससे भी बुरी हालत है। सैकड़ों साल से अन्याय सहन करते रहने के कारण उनकी प्रतिकार करने की आदत पूरी तरह नष्ट हो गई है। हम भी कुछ कर सकते हैं, इसका विचार ही किसी के मन में नहीं आता। अंबेडकर ने दलित वर्ग को समर्थ हिंदुओं के अत्याचार से बचाने के लिए एकमेव उपाय अपने हाथ में शक्ति इकठ्ठा करना बताया था। उन्होंने दलितों को अपने अत्याचारी वर्ग से निजात दिलाने का जो नुस्खा बताया था वह सार्वदेशिक है।

सारी दुनिया में जो अशक्त रहे उन पर सशक्त वर्ग का अत्याचार होता रहा। जिन मानव समुदायों को शक्ति के स्नोतों से वंचित कर अशक्त मानव समुदाय में तब्दील किया गया उनमें किसी की भी स्थिति दलितों जैसी नहीं रही। मानव जाति के इतिहास में किसी भी वर्ग को शक्तिके प्रमुख स्नोतों से पूरी तरह वंचित नहीं किया गया। अमेरिका में जिन अश्वेतों का दलितों की भांति ही पशुवत इस्तेमाल हुआ उनके लिए पूजा-पाठ कभी निषिद्ध नहीं रहा। शक्ति के प्रमुख स्नोतों में दलितों का धार्मिक क्षेत्र से बहिष्कार उन्हें अस्पृश्यता की खाई में धकेलने के लिए प्रधान कारक बन गया।

तमाम देशों में अशक्त समूहों को साम‌र्थ्यवान बनाकर उन्हें सबल समुदायों के जुल्म से निजात दिलाई गई, लेकिन भारत में वैसा नहीं हुआ। जबकि यहां उसकी जरूरत कहीं ज्यादा रही। सदियों से जारी दलित उत्पीड़न को मध्यकाल में संतों और भारतीय नव जागरण के असंख्य महानायकों ने गहराई से स्पर्श किया, लेकिन उनमें से कोई भी अंबेडकर की भांति दलित अशक्तिकरण के कारणों को संपूर्णता में नहीं समझ पाया और इसीलिए वे प्रभावी लड़ाई नहीं लड़ सके।

गुलाम भारत में जहां तमाम स्वतंत्रता संग्रामी अंग्रेजों के कब्जे में पड़ी आर्थिक और राजनीतिक शक्ति छीनने में व्यस्त थे वहीं अंबेडकर बड़ी मुश्किल हालात में मानव जाति के सबसे अशक्त समूहों को शक्ति से लैस करने व्यस्त थे। उनके प्रयासों से सदियों से बंद पड़े शक्ति के कई स्नोत दलितों के लिए मुक्त हुए, लेकिन सारे नहीं।

अंबेडकर अपने जमाने में भारत के असहाय नेता रहे। यदि वे असहाय नहीं होते तो संविधान में राजनीति के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार सहित तमाम स्नोतों में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करा देते। अगर दलित उत्पीड़न का प्रतिकार करना है तो अंबेडकर के सुझाव अनुसार दलितों को साम‌र्थ्यवान बनाने के मुद्दे को शीर्ष पर लाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

News Monitored by Kuldeep Chandan & Kalpana Bhadra

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